-प्रतिस्पर्धा तेज, जून में आने वाली तेल की खेपों के लिए बोली लगाना शुरू नई दिल्ली,(ईएमएस)। इजराइल-अमेरिका के साथ चल रहे ईरान युद्ध ने भारत और चीन को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां ‘दोस्ती’ नहीं, बल्कि ‘जरूरत’ मायने रखती है। होर्मुज में जारी तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच ठप पड़ी शांति वार्ता ने वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की किल्लत पैदा कर दी है। इसके परिणामस्वरूप अब भारत और चीन के बीच रूसी तेल के हर एक बैरल को लेकर जबरदस्त खींचतान शुरू हो गई है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक होर्मुज के रास्ते में ईरान की घेराबंदी और खाड़ी देशों के तेल इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार हो रहे हमलों ने मिडिल ईस्ट से आने वाले तेल की आपूर्ति पर ब्रेक लगा दिया है। कल तक जो भारत और चीन सऊदी अरब और इराक से बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहे थे, आज वे अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए पूरी तरह रूस की तरफ मुड़ गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि रूसी कच्चे तेल के लिए भारत और चीन के बीच मुकाबला अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक जून में आने वाली तेल की खेपों के लिए दोनों देशों ने अभी से ही बोली लगानी शुरू कर दी है, जिससे प्रतिस्पर्धा और भी तीव्र हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध से पहले के आंकड़ों पर गौर करें तो चीन होर्मुज के रास्ते रोजाना करीब 44.5 लाख बैरल तेल मंगाता था, जो अप्रैल में घटकर मात्र 2.2 लाख बैरल रह गया। वहीं, भारत के लिए भी यह आंकड़ा 28 लाख बैरल से लुढ़ककर 2.4 लाख बैरल पर आ गया है, जो एक बड़ी गिरावट है। तेल भंडार के मामले में भारत की स्थिति चिंताजनक है। चीन के पास करीब तीन से चार महीने का तेल भंडार है, जबकि भारत के पास केवल 30 दिनों का बफर स्टॉक है। भारत सरकार ने अब तक पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाए हैं, जिससे देश में ईंधन की मांग कम नहीं हुई है। इसका सीधा मतलब है कि भारत को किसी भी कीमत पर तेल चाहिए, जो उसकी मोलभाव करने की क्षमता को कमजोर करता है। रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने हाल ही में एक इंटरव्यू में साफ किया कि भारत भारी मात्रा में रूसी तेल खरीद रहा है और रूस इस सहयोग को आगे बढ़ाना चाहता है। उन्होंने अमेरिकी पाबंदियों को ‘अवैध दबाव’ करार दिया। अब हकीकत यह है कि भारत के पास अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस के अलावा कोई ठोस विकल्प नहीं है, खासकर जब वैश्विक बाजार में अन्य स्रोतों से आपूर्ति बाधित हो रही है। इस बीच चीन ने भारत की एक और प्रमुख तेल आपूर्ति स्रोत सऊदी अरब में भी सेंध लगा दी है। युद्ध से पहले भारत सऊदी अरब से अपना तेल आयात बढ़ा रहा था, लेकिन अब वहां भी चीन ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। सऊदी अरब ने चीन की रिफाइनरियों में मोटा पैसा लगा रखा है। अप्रैल में सऊदी अरब ने चीन को 13.5 लाख बैरल तेल भेजा है, जो यह दर्शाता है कि चीन न केवल रूसी तेल के लिए भारत से मुकाबला कर रहा है, बल्कि पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं पर भी अपनी पकड़ बना रहा है, जिससे भारत के लिए चुनौती खड़ी गई है। सिराज/ईएमएस 26 अप्रैल 2026