ज़रा हटके
28-Apr-2026
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ज्यूरिख (ईएमएस)। ग्रीस का मेथाना ज्वालामुखी पिछले 1 लाख साल से ऊपर से भले ही सतह पर शांत रहा हो, लेकिन इसके सीने के नीचे मैग्मा लगातार उबल रहा था। इसका मतलब है कि जिसे दुनिया खत्म मान चुकी थी, वह अंदर ही अंदर सांस ले रहा था और सक्रिय था। ईटीएच ज्यूरिख के शोधकर्ताओं ने मेथाना के भूगर्भीय इतिहास को खंगाला तो पता चला कि सतह पर चुप्पी के बावजूद, जमीन की गहराइयों में मैग्मा बनने की प्रक्रिया कभी नहीं रुकी थी। इस छिपे हुए सच को जानने के लिए वैज्ञानिकों ने जिरकॉन क्रिस्टल का सहारा लिया। ये सूक्ष्म क्रिस्टल जमीन के नीचे मैग्मा के भंडार में तब बनते हैं जब पिघली हुई चट्टानें ठंडी होती हैं। ईटीएच ज्यूरिख के प्रोफेसर ओलिवियर बाचमैन के अनुसार, ये क्रिस्टल किसी विमान के ब्लैक बॉक्स या फ्लाइट रिकॉर्डर की तरह काम करते हैं। इनमें उस समय की रासायनिक जानकारी और उम्र कैद हो जाती है जब ये बनते हैं। टीम ने पिछले 7 लाख सालों के इतिहास से जुड़े 1,250 से ज्यादा क्रिस्टल की जांच की, जिससे यह साबित हो गया कि ज्वालामुखी सतह को तोड़े बिना भी हजारों सालों तक अंदर ही अंदर सांस ले सकते हैं। यानी, इसकी ऊपरी शांति महज एक भ्रम और धोखा थी। अध्ययन में यह बात साफ हुई है कि मेथाना ज्वालामुखी में मैग्मा बनने की प्रक्रिया लगभग बिना रुके जारी थी। इतिहास में कुछ ऐसे दौर भी आए जब यह मैग्मा बाहर निकला और विस्फोट हुए, लेकिन सबसे ज्यादा हैरान करने वाला वो 1 लाख साल का समय था जब एक भी विस्फोट दर्ज नहीं किया गया। पहले यह माना जाता था कि इस लंबी खामोशी के दौरान ज्वालामुखी सिस्टम बंद हो गया होगा और निष्क्रिय हो गया होगा। लेकिन जिरकॉन क्रिस्टल की ग्रोथ इसी शांत पीरियड के दौरान सबसे ज्यादा देखी गई। इसका सीधा मतलब यह है कि जब दुनिया को लग रहा था कि ज्वालामुखी मर चुका है, तब वह अंदर सबसे ज्यादा सक्रिय था। वहां मैग्मा का भंडार लगातार बढ़ रहा था और स्थितियां काफी हलचल भरी थीं, जो किसी बड़े विस्फोट की तैयारी का संकेत दे रही थीं। अब सवाल यह उठता है कि अगर इतनी भारी मात्रा में मैग्मा बन रहा था, तो वह बाहर क्यों नहीं आया? वैज्ञानिकों ने इसका कारण मैग्मा का बहुत ज्यादा चिपचिपा होना बताया। मेथाना के नीचे मौजूद मैग्मा में पानी की मात्रा उम्मीद से कहीं ज्यादा थी, जिसे सुपरहाइड्रस मैग्मा कहा जाता है। यह पानी टेक्टोनिक प्लेटों के टकराने और समुद्र के नीचे की मिट्टी के पृथ्वी की परत में दबने से पैदा हुआ था। पानी की अधिकता की वजह से जब मैग्मा ऊपर की ओर बढ़ने लगा, तो उसमें तेजी से बुलबुले बनने लगे और क्रिस्टलाइजेशन की प्रक्रिया तेज हो गई। इस वजह से लावा इतना गाढ़ा और भारी हो गया कि उसके लिए ऊपर का रास्ता तय करना मुश्किल हो गया। वह सतह तक पहुंचने के बजाय नीचे ही जमा होता गया और ज्वालामुखी को अंदर से लगातार सक्रिय बनाए रखा। मेथाना की यह कहानी सिर्फ एक ज्वालामुखी तक सीमित नहीं है। रिसर्च टीम के लीड ऑथर रजवान-गेब्रियल पोपा का कहना है कि दुनिया भर में सबडक्शन जोन में मौजूद कई ज्वालामुखी इसी तरह सुपरहाइड्रस यानी बहुत ज्यादा पानी वाले मैग्मा से भरे हो सकते हैं। वैज्ञानिक समुदाय अब तक इस छिपे हुए खतरे को पूरी तरह समझ नहीं पाया था। अगर मेथाना जैसे और भी ज्वालामुखी हैं, तो यह एक बड़ी चेतावनी है। कई ऐसे ज्वालामुखी जिन्हें आज लो-रिस्क या खत्म माना जाता है, वे असल में जमीन के नीचे भारी मात्रा में मैग्मा जमा कर रहे होंगे। यह खोज भविष्य में ज्वालामुखी विस्फोटों की भविष्यवाणी करने के तरीके को बदल सकती है और हमें उन खतरों से आगाह कर सकती है जो अब तक अदृश्य थे। इस रिसर्च का सबसे डरावना पहलू यह है कि एक ज्वालामुखी जो हजारों सालों से शांत है, वह असल में सो रहा है, मरा नहीं है। आमतौर पर ऐसे ज्वालामुखियों की मॉनिटरिंग कम की जाती है और जनता का ध्यान भी उन पर नहीं होता। मेथाना की स्टडी ने साफ कर दिया है कि लंबी खामोशी का मतलब भविष्य में होने वाला एक बड़ा और अप्रत्याशित खतरा भी हो सकता है। यह खामोशी असल में मैग्मा के स्टोरेज का एक फेज है, जो किसी भी समय एक बड़े विस्फोट में बदल सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अब हमें सिर्फ दिखने वाली हलचल पर भरोसा नहीं करना चाहिए। सुदामा/ईएमएस 28 अप्रैल 2026