जंग के बीच कीमत 126 डॉलर प्रति बैरल पहुंची; तेहरान/वॉशिंगटन(ईएमएस)। होर्मुज पर जारी नाकेबंदी के बीच गुरुवार को कच्चे तेल की कीमतें पिछले चार साल का रिकॉर्ड तोड़ते हुए 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं. तेल की कीमतों पर ईरान की तरफ से प्रतिक्रिया आई और उसने कहा कि अमेरिकी नाकाबंदी का उसके तेल उत्पादन पर तो कोई असर नहीं हुआ, उलटे तेल की कीमतें बढ़ गईं. ईरान ने कहा कि तेल की कीमतें 140 डॉलर प्रति बैरल तक जाएंगी. इस बीच तेल की बढ़ती कीमतों से परेशान अमेरिका ने दुनिया के देशों को एक गुप्त संदेश भेजा है कि वो होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बहाल करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाएं. अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमलों से 28 फरवरी को शुरू हुए युद्ध के दो महीने बाद भी दुनिया का अहम समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट बंद है, जिससे दुनिया की 20 प्रतिशत तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो रही है. इससे वैश्विक ऊर्जा कीमतों में उछाल आया है और आर्थिक मंदी के खतरे बढ़ गए हैं. मिडिल ईस्ट में जंग के बीच कच्चे तेल की कीमत 126 डॉलर प्रति बैरल के पार कर गई है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 126.31 डॉलर प्रति बैरल तक चली गई, जो मार्च 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। फिलहाल यह 125 डॉलर प्रति बैरल के आस-पास ट्रेंड कर रहा है। गुरुवार को ब्रेंट क्रूड (कच्चे तेल) की कीमत तेजी से बढक़र करीब 124 डॉलर प्रति बैरल को छूने लगी है। बुधवार के मुकाबले यह करीब 6 प्रतिशत बढक़र 123.93 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया है, जो मार्च 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। पिछले हफ्ते तेल की कीमत करीब 100 डॉलर के पास था। तेल की कीमत इतिहास में सबसे ज्यादा 2008 में पहुंची थी। उस समय अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड करीब 147 डॉलर प्रति बैरल तक चला गया था। यह अब तक का रिकॉर्ड हाई माना जाता है। एक्सपट्र्स का मानना है कि कीमतें अभी और बढ़ सकती हैं। युद्ध से पहले ही अंदाजा लगाया जा रहा था कि अगर होर्मुज लंबे समय तक बंद रहता है, तो तेल की कीमत 150 से 200 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती है। तेल की कीमतें 4 साल में सबसे ज्यादा राष्ट्रपति ट्रम्प का कहना है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका की नौसैनिक नाकाबंदी महीनों तक चल सकती है, जिसके चलते तेल की कीमतें चार साल से भी ज्यादा समय के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। ब्रेंट क्रूड ऑयल के वायदा भाव 8 प्रतिशत उछलकर 120 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए, जो जून 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। बाजारों ने इस बात को मान लिया है कि ईरान के साथ चल रहे विवाद का जल्द कोई हल निकलने या होर्मुज के फिर से खुलने की संभावनाएं बहुत कम हैं। तेल कंपनियों के अधिकारियों के साथ एक बैठक में ट्रम्प ने यह तर्क दिया कि ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी, बमबारी करने से कहीं ज्यादा असरदार है। जंग में अमेरिका के 25 अरब डालर खर्च अमेरिका ईरान युद्ध पर पिछले 2 महीने में अब तक 25 अरब डॉलर (2.37 लाख करोड़ रुपए) खर्च कर चुका है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के सीनियर अधिकारी जूल्स डब्ल्यू हस्र्ट ने बुधवार को इसकी जानकारी संसद की आम्र्ड सर्विसेज कमेटी की सुनवाई में दी। हस्र्ट के मुताबिक कुल खर्च का बड़ा हिस्सा हथियारों, मिसाइलों और गोला-बारूद पर हुआ है। अमेरिका ने 42 कॉमर्शियल जहाजों को वापस लौटाया अमेरिका की सेना के सेंट्रल कमांड ने कहा है कि ईरान के खिलाफ लगाई गई नौसैनिक नाकेबंदी काफी असरदार साबित हो रही है। उन्होंने बताया कि अमेरिकी सेना ने 42 ऐसे कॉमर्शियल जहाजों को रास्ता बदलने पर मजबूर किया है, जो ईरान के बंदरगाहों में आने या वहां से जाने की कोशिश कर रहे थे। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) के बयान के मुताबिक, इस समय 41 तेल टैंकर ऐसे हैं जिनमें करीब 6.9 करोड़ बैरल तेल भरा है, लेकिन ईरान उसे बेच नहीं पा रहा है। कूपर ने कहा कि इससे ईरान को करीब 6 अरब डॉलर से ज्यादा का आर्थिक नुकसान हो रहा है, क्योंकि उसकी सरकार इस तेल से कोई कमाई नहीं कर पा रही। अमेरिका ने ईरान की 45 करोड़ डॉलर की क्रिप्टोकरेंसी जब्त की अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि अमेरिका ने ईरान की करीब 45 करोड़ डॉलर की क्रिप्टोकरेंसी जब्त कर ली है। इससे पहले अमेरिका ने पहले करीब 350 मिलियन डॉलर की क्रिप्टो एसेट्स जब्त की थीं और हाल ही में 100 मिलियन डॉलर और हासिल किए, जिससे कुल रकम लगभग आधा अरब डॉलर के करीब पहुंच गई है। बेसेंट के मुताबिक, इस पूरी कार्रवाई को ऑपरेशन इकोनॉमिक फ्यूरी के तहत चलाया जा रहा है, जिसका मकसद ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। उन्होंने दावा किया कि इससे तेहरान की सरकार पर संकट की स्थिति बन गई है। दुनिया का सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट अब अमेरिका लौट रहा दुनिया का सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस जेराल्ड आर फोर्ड अब 300 दिनों से ज्यादा की रिकॉर्ड तैनाती के बाद वापस अमेरिका लौटने वाला है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक यह जहाज आने वाले दिनों में मिडिल ईस्ट से निकलेगा और 15 मई तक वर्जीनिया स्थित अपने होम पोर्ट पहुंच जाएगा। इस जहाज की तैनाती बेहद खास रही क्योंकि इसने ईरान के खिलाफ युद्ध में हिस्सा लिया और वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो को पकडऩे वाले सैन्य ऑपरेशन में भी शामिल रहा। यह तैनाती जून में शुरू हुई थी, जब जहाज वर्जीनिया के नेवल स्टेशन नॉरफॉक से रवाना हुआ था, और करीब 10 महीने तक लगातार अलग-अलग इलाकों में एक्टिव रहा। शुरुआत में यह जहाज भूमध्य सागर पहुंचा, फिर अक्टूबर में इसे कैरेबियन सागर की ओर भेजा गया। यहीं इसने मादुरो को पकडऩे वाले ऑपरेशन में हिस्सा लिया। इसके बाद जब ईरान के साथ तनाव बढ़ा, तो इसे मिडिल ईस्ट की ओर भेजा गया। शुरुआती दिनों में इसने भूमध्य सागर से ऑपरेशन किए, फिर स्वेज नहर पार कर मार्च की शुरुआत में लाल सागर पहुंचा। हालांकि इसी दौरान जहाज के एक लॉन्ड्री हिस्से में आग लग गई, जिसके कारण इसे वापस भूमध्य सागर लौटकर मरम्मत करानी पड़ी। इस घटना से जहाज पर मौजूद सैकड़ों सैनिकों को रहने की जगह तक की दिक्कत हो गई थी। विनोद उपाध्याय / 30 अप्रैल, 2026