स्ट्रासबर्ग (ईएमएस)। हाल ही में एड्रियाटिक सागर की गहराई में एक ऐसा जहाज मिला है, जो लगभग 2200 साल पुराना है। यह सिर्फ लकड़ी का एक ढांचा भर नहीं, बल्कि उस दौर की उन्नत तकनीक का जीता-जागता प्रमाण है जिसने शोधकर्ताओं को हैरत में डाल दिया है। वैज्ञानिक यह जानकर हैरान हैं कि उस जमाने में भी जहाज बनाने वाले ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल करते थे, जिससे जहाज सालों-साल समंदर की मार झेलने के बाद भी सुरक्षित रहते थे। इस मलबे ने यह साबित कर दिया है कि रोमन काल में चीजें सिर्फ दिखावे के लिए नहीं, बल्कि सदियों तक टिकने के लिए बनाई जाती थीं। यह अद्भुत खोज क्रोएशिया के तट के पास हुई, जहाँ 2016 में महज 4 मीटर पानी के नीचे इलोविक-परजीन 1 नामक इस प्राचीन मलबे को खोजा गया था। वैज्ञानिकों का मानना है कि सदियों से पत्थरों और तलछट के नीचे दबे रहने और ऑक्सीजन की कमी के कारण ही यह जहाज समुद्री जीवों और मौसम की मार से बचा रहा। इसके साथ मिले बड़ी संख्या में एम्फोरा (प्राचीन मिट्टी के बर्तन) उस समय के समृद्ध व्यापारिक संबंधों की कहानी भी बयां करते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ स्ट्रासबर्ग की आर्कियोमेट्रिस्ट आर्मेल शैरी-दुहौत के गहन शोध ने इस जहाज के निर्माण की तकनीक का खुलासा किया है। उन्होंने पाया कि जहाज की लकड़ी को वॉटरप्रूफ बनाने के लिए दो तरह की खास कोटिंग का इस्तेमाल किया गया था। पहली परत चीड़ के पेड़ से निकले तारकोल (पाइन टार्) की थी, जबकि दूसरी परत में पाइन टार् को मधुमक्खी के मोम (बीज़वैक्स) के साथ मिलाया गया था। यह मिश्रण न केवल लकड़ी को पानी से बचाता था, बल्कि उसे लचीला और मजबूत भी बनाए रखता था, जिससे जहाज समंदर की चुनौतियों का सामना कर पाता था। प्राचीन रोमन लेखक प्लिनी द एल्डर ने भी अपनी कृतियों में जोपिसा नामक ऐसे ही एक पदार्थ का उल्लेख किया है, जो इस खोज को ऐतिहासिक पुष्टिकरण देता है। इस शोध का सबसे दिलचस्प पहलू कोटिंग के नमूनों में मिले पराग कणों का विश्लेषण है। वैज्ञानिकों को पाइन, ओक, जैतून और कई जंगली फूलों के पराग मिले हैं, जो एड्रियाटिक और भूमध्यसागरीय क्षेत्रों के विभिन्न हिस्सों में पाए जाते हैं। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि जहाज ने लंबी समुद्री यात्राएँ की थीं और अलग-अलग बंदरगाहों पर इसकी मरम्मत की गई थी। हर बार जब जहाज किसी नए पोर्ट पर रुकता, वहाँ की स्थानीय वनस्पतियों से बने लेप उस पर चढ़ा दिए जाते थे, जिससे उसकी परतें बदलती रहती थीं। सांख्यिकीय विश्लेषण और कोटिंग की कई परतों से यह भी पता चला है कि इस जहाज का निर्माण इटली के ब्रुंडिसियम (आज का ब्रिंडिसि) में हुआ था। शुरुआती वॉटरप्रूफिंग वहीं की गई थी, लेकिन जैसे-जैसे जहाज व्यापारिक यात्राओं पर आगे बढ़ा, इसकी परतों में बदलाव आता गया। वैज्ञानिकों ने कोटिंग की कम से कम 4 से 5 अलग-अलग परतें खोजी हैं, जो यह साबित करती हैं कि रोमन लोग अपने जहाजों के रखरखाव को लेकर कितने गंभीर थे। वे जानते थे कि समुद्र पर राज करने के लिए जहाजों को हर यात्रा के बाद नया जीवन देना कितना आवश्यक है। यह अध्ययन केवल मलबे की बनावट पर केंद्रित नहीं है, बल्कि इसने मॉलिक्यूलर, स्ट्रक्चरल और स्टेटिस्टिकल एनालिसिस जैसी नई इंटरडिसिप्लिनरी अप्रोच का इस्तेमाल किया है, जिससे जहाज के जीवन के विभिन्न चरणों को समझना आसान हो गया है। सुदामा/ईएमएस 03 मई 2026