04-May-2026
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चीन की दबंगई के खिलाफ जापान ने चला बड़ा दांव टोक्यो,(ईएमएस)। जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने देश के दशकों पुराने शांतिवादी संविधान में संशोधन के स्पष्ट संकेत देकर एशिया की भू-राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। 3 मई को जापान के संविधान दिवस के अवसर पर दिए गए एक वीडियो संदेश में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि वर्तमान समय की चुनौतियों को देखते हुए 1947 के संविधान में बदलाव करना अब अपरिहार्य हो गया है। प्रधानमंत्री का यह कदम केवल एक घरेलू कानूनी सुधार नहीं है, बल्कि इसे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य आक्रामकता और विस्तारवादी नीतियों के जवाब के रूप में देखा जा रहा है। ताकाइची का उद्देश्य जापान के आत्मरक्षा बलों को अधिक संवैधानिक वैधता और शक्ति प्रदान करना है। जापान का वर्तमान संविधान द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी देखरेख में लागू हुआ था। इसके अनुच्छेद-9 को शांतिवादी खंड कहा जाता है, जो जापान को युद्ध करने के संप्रभु अधिकार से रोकता है और उसे किसी भी तरह की युद्धक क्षमता रखने की अनुमति नहीं देता। प्रधानमंत्री ताकाइची का तर्क है कि समय की जरूरतों के अनुसार देश की नींव यानी संविधान को अपडेट किया जाना चाहिए। उन्होंने सत्ताधारी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) के भीतर और संसद (डाइट) में चर्चा को तेज करने का आह्वान किया है ताकि अन्य राजनीतिक दलों के सहयोग से एक ठोस प्रस्ताव तैयार किया जा सके। अक्टूबर 2025 में जापान की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने और फरवरी 2026 में दोबारा निर्वाचित होने के बाद ताकाइची ने इस मुद्दे को अपनी प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रखा है। उन्होंने पार्टी के हालिया सम्मेलन में लक्ष्य रखा था कि अगले वर्ष तक संविधान संशोधन का एक औपचारिक प्रस्ताव संसद के सामने होना चाहिए। हालांकि, यह राह इतनी आसान नहीं है। जापान के भीतर एक बड़ा वर्ग इस शांतिवादी विरासत को छोड़ने के खिलाफ है। टोक्यो की सड़कों पर शांति की रक्षा करो और संविधान संशोधन नहीं चाहिए जैसे नारों के साथ लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। आलोचकों को डर है कि इस बदलाव से क्षेत्र में हथियारों की होड़ बढ़ सकती है और जापान का दशकों पुराना शांतिवादी स्वरूप समाप्त हो सकता है। फिलहाल, ताकाइची सरकार जनता को इन सुधारों के महत्व को समझाने और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर समर्थन जुटाने की कोशिश में लगी है। वीरेंद्र/ईएमएस/04मई 2026