जनता को सब्ज़ बाग़ दिखाने में पूरी महारत रखने वाले सत्ताधारी नेताओं से यदि देश के हालात के बारे में बात कीजिये तो अपनी लच्छेदार बातों से यह साबित कर देंगे कि देश में चारों तरफ़ बाग़ों में बहार है,जनता ख़ुशहाल है, क़ानून व्यवस्था पूरी तरह चाक चौबंद है,देश भ्रष्टाचार मुक्त हो चुका है,देश में विकास की गंगोत्री बह रही है। और यदि किसी ने सरकार की आलोचना करने की कोशिश की तो चुनाव में बार बार मिलने वाली विजय का हवाला देते हुये उल्टे उसी से यह पूछ लिया जाता है कि यदि जनता संतुष्ट नहीं तो बार बार विभिन्न राज्यों में जनादेश व जनसमर्थन सत्ता के पक्ष में क्यों ? आप चीख़ते चिल्लाते रहिये कि चुनाव परिणाम को सत्ता के पक्ष में प्रभावित करने में मुख्य चुनाव आयुक्त,चुनाव आयोग,एस आई आर,इनकम टैक्स, सी बी आई,ई डी,बी एस एफ़,सी आर पी, गोदी मीडिया आदि संस्थाओं की भूमिका रही है। परन्तु आपकी शिकायत सुन कौन रहा है ? याद कीजिये 2013 में, जब डॉलर के मुक़ाबले रुपया 60 के स्तर पर पहुंचा था उस समय नरेंद्र मोदी ने केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा था कि रुपये की गिरती क़ीमत से सरकार की प्रतिष्ठा गिर रही है। तब मोदी ने रुपये की कमज़ोरी को यूपीए सरकार की दिशाहीन नीतियों और आर्थिक संकट का संकेत बताया था। कमज़ोर रुपया = कमज़ोर सरकार का कथन प्रचारित किया गया था । मोदी ने उस समय यह भी कहा था कि गिरते रुपये के कारण देश के व्यापारी बोझ नहीं सह पाएंगे और विश्व व्यापार में भारत पीछे रह जाएगा। परन्तु आज तो मोदी शासन काल में डॉलर के मुक़ाबले वही रुपया 95.18 तक पहुँच चुका है। परन्तु शायद आज न तो यह स्थिति सरकार की दिशाहीन नीतियों की वजह से है न ही यह आर्थिक संकट का संकेत है। न ही यह कमज़ोर सरकार का लक्षण है न ही रुपये की गिरती क़ीमत से सरकार की प्रतिष्ठा गिर रही है। बजाये इसके अक्टूबर 2022 में जब रुपया 1 डॉलर के मुक़ाबले 82 पर पहुंचा था उस समय अमेरिका की अपनी यात्रा के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह तर्क ज़रूर दिया था कि भारतीय रुपया गिर नहीं रहा है, बल्कि अमेरिकी डॉलर तेज़ी से मज़बूत हो रहा है। क्या यह तर्क 2014 से पहले यू पी ए सरकार के समय लागू नहीं हो सकता था ? परन्तु शायद उस समय के सत्ताधारियों और आज के विपक्ष में न तो इस तरह के कुतर्क रुपी तर्क देने की सलाहियत थी न ही मीडिया मैनेज कर इस विषय को हंगामा बनाने से रोकने की कला। इसलिए 1 डॉलर के 100 रूपये के आंकड़े को छूने के क़रीब होने बावजूद आज यह चर्चा का विषय ही नहीं है ? इसी तरह 2004-2014 के बीच जब देश में कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार थी। उस दौरान पेट्रोल, डीज़ल और रसोई गैस के दाम बढ़ने पर भाजपा ने देश भर में ज़ोरदार विरोध प्रदर्शन किए थे। यहाँ तक कि कुछ जगहों पर इनके अर्धनग्न होकर प्रदर्शन करने की तस्वीरें भी सामने आई थीं। 2010 से 2014 के बीच भाजपाई यह प्रदर्शन उस दौर में कर रहे थे जबकि पेट्रोल की क़ीमतें 61रूपये से लेकर 70 रूपये प्रति लीटर के क़रीब थीं। और घरेलू रसोई गैस की क़ीमत 414 के क़रीब थीं। उस समय कई भाजपा नेता सिलेंडर की क़ीमतों में वृद्धि के विरोध में सड़कों पर चूल्हे जलाकर प्रदर्शन किया करते थे। परन्तु आज पेट्रोल व डीज़ल कहीं 100 रूपये के क़रीब तो कहीं 100 रूपये पार कर चुका है। गैस का मूल्य भी 1000 प्रति सिलिंडर के क़रीब हो गया है। परन्तु न तो विपक्ष का हंगामा न हंगामे में शोर या उसका असर न ही ऐसी ख़बरों को मीडिया में कोई स्थान। आजकल तो वैसे भी ईरान इस्राईल युद्ध के चलते देश में अनेक जगहों पर गैस सिलिंडर लेने के लिये लोग लंबी लंबी क़तारों में खड़े हुये हैं। गैस की धड़ल्ले से ब्लैक मेलिंग हो रही है। परन्तु जनता के हितों से मुख्य रूप से जुड़े ऐसे सवालों पर तो कोई चर्चा नहीं हाँ इस विषय पर सरकार का यह स्टैंड मीडिया ज़रूर प्रचारित कर देता है कि सब कुछ ठीक ठाक है । इसी तरह भाजपा की केंद्र सरकार ने देश में एक नया वोट बैंक तैयार किया है लाभार्थी वोट बैंक। प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना के तहत देशभर में लगभग 80 करोड़ से अधिक लाभार्थियों अर्थात देश की लगभग 57% आबादी को मुफ़्त राशन दिया जा रहा है । इस योजना के अंतर्गत पात्र व्यक्तियों को हर महीने प्रति सदस्य 5 किलोग्राम मुफ़्त गेहूं या चावल उपलब्ध कराया जा रहा है। आलोचक इस योजना को सरकार की नाकामी बता रहे हैं। इनका कहना है कि इस योजना का मतलब है कि देश की 57% आबादी इतने पैसे भी नहीं कमा पा रही कि वह अपने व परिवार के लिये 5 किलो राशन तक ख़रीद सके। जबकि कुछ आलोचक कहते हैं कि ऐसी योजनायें लोगों को निठल्ला बनाती हैं। कोई कुछ भी कहता रहे परन्तु सरकार ऐसी योजनाओं को चलाकर अपनी पीठ थपथपाती है और इसके बदले इन्हीं लाभार्थियों से वोट की उम्मीद लगाये रहती है। और धन्य है देश की वह जनता भी जो आत्मनिर्भर होने या सरकार से रोज़गार के अवसर मांगने के बजाये इसी 5 किलो मुफ़्त राशन को ही अपना भाग्य समझकर फूले नहीं समाती। यह सफल अन्दाज़-ए-सियासत की ही एक बानगी कही जाएगी कि आज जी एस टी व नोटबंदी से परेशान लोग व व्यवसायी इस विषय पर चर्चा बंद कर चुके हैं। लॉक डाउन के दौर में हज़ारों किलोमीटर पैदल चलने वाले लोग अपना दुःख भूलने को मजबूर हो चुके हैं। मंहगाई,बेरोज़गारी,स्वास्थ्य,शिक्षा व नारी स्मिता तो जैसे कोई मुद्दा ही नहीं। वास्तव में देश की राजनीति अब उस दौर में प्रवेश कर चुकी है जहाँ जनता के मुद्दे क्या हैं और क्या होंगे यह भी अब जनता नहीं बल्कि राजनैतिक दलों के नेता तय करते हैं। इसलिये जनता की आधारभूत ज़रूरतें और लोकहितकारी बातें छोड़िये और पाकिस्तान,हिन्दू मुस्लिम,मंदिर मस्जिद,घुसपैठिया,लव जिहाद,जाति धर्म,धर्म विशेष की कथित रूप से बढ़ती जनसंख्या जैसे सत्ता द्वारा निर्धारित विषयों को ही वर्तमान राजनीति की सबसे बड़ी ज़रुरत स्वीकार कीजिये। शायद इन्हीं हालात के मद्देनज़र मशहूर शायर बशीर बद्र साहब को कहना पड़ा कि किताबें, रिसाले न अख़बार पढ़ना। मगर दिल को हर रात इक बार पढ़ना।। सियासत की अपनी अलग इक ज़ुबाँ है। लिखा हो जो इक़रार, इनकार पढ़ना। ईएमएस / 06 मई 26