लेख
07-May-2026
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के साथ ही नौ मई को भाजपा सरकार की ताजपोशी की तैयारी शुरू कर दी गई है। इस चुनाव ने राज्य को राजनीति में एक नया इतिहास रच दिया है, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है। राज्य में यह सत्ता बदलने का संकेत नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति में एक बड़े वैचारिक और सामाजिक बदलाव की आहट भी हैं।जितना बडलंबे समय तक ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस को बंगाल की राजनीति का सबसे मजबूत केंद्र माना जाता था। 2011 में वाम शासन को समाप्त कर सत्ता में आई ममता बनर्जी ने बंगाल की राजनीति को अपनी शैली, अपनी भाषा और अपने संगठन के बल पर चलाया। लेकिन इस बार के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि कोई भी राजनीतिक किला स्थायी नहीं होता। मतदाता जब बदलाव का मन बना लेता है, तो सबसे मजबूत शासन भी कमजोर पड़ सकता है। मतगणना के बाद अनुसार भाजपा ने 206 सीटों पर जीत हासिल की है, जबकि तृणमूल कांग्रेस काफी पीछे रह कर सिर्फ 81 सीट पर जीत हासिल कर सकी है । बंगाल का राजनीतिक इतिहास संघर्ष, विचारधारा और जनभावना से भरा रहा है। कभी वामपंथी राजनीति का मजबूत किला रहे इस राज्य में बाद के वर्षों में तृणमूल कांग्रेस ने अपनी मजबूत पकड़ बनाई। ममता बनर्जी ने लंबे समय तक खुद को बंगाल की जनता की आवाज के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि जनता समय-समय पर सत्ता को परखती है और आवश्यकता पड़ने पर बदलाव का निर्णय भी करती है। इस चुनाव में सामने आए रक्षान बताते हैं कि जनता ने विकास, रोजगार, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही के मुद्दों पर गंभीरता से मतदान किया है। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह परिणाम अभूतपूर्व है, क्योंकि जिस राज्य में कभी पार्टी की उपस्थिति सीमित मानी जाती थी, वहां बहुमत की दहलीज तक पहुंचना संगठनात्मक विस्तार, बूथ स्तर की तैयारी और राजनीतिक रणनीति की सफलता को दर्शाता है। भाजपा ने पिछले वर्षों में बंगाल के ग्रामीण इलाकों, सीमावर्ती क्षेत्रों, चाय बागान क्षेत्रों, मतुआ समाज, आदिवासी इलाकों और शहरी मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश की। इस चुनाव में उस मेहनत का असर रुझानों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। तृणमूल कांग्रेस के लिए यह परिणाम आत्ममंथन का विषय है। हकिकत यह कि किसी भी राजनीतिक दल के लिए लंबे समय तक सत्ता में बने रहना एक बड़ी चुनौती होता है। समय के साथ सत्ता के प्रति जनता की अपेक्षाएं बढ़‌ती हैं। यदि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, महिला सुरक्षा और प्रशासनिक निष्पक्षता जैसे मुद्दों पर लोगों को अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते, तो असंतोष धीरे-धीरे जनादेश में बदल जाता है। बंगाल में भी एंटी-इंकंवेंसी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई प्रतीत होती है। तृणमूल के कई मजबूत नेताओं की हार या पिछड़ना इस बात का संकेत है कि जनता ने केवल पार्टी के नाम पर नहीं, बल्कि स्थानीय प्रदर्शन और जनसंपर्क के आधार पर भी मतदान किया है। इस बदलाव की पहली बड़ी वजह मतदाता सूची की पुनर्समीक्षा रही। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के बाद राज्य की मतदाता सूची से करीब 91 लाख नाम हटाए गए है। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24 परगना जैसे जिलों में बड़ी संख्या में नाम हटे, जिन्हें तृणमूल कांग्रेस के मजबूत इलाकों में गिना जाता रहा है। चुनाव आयोग की दृष्टि से यह प्रक्रिया मतदाता सूची को शुद्ध करने के लिए थी, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इसका असर बहुत गहरा दिखाई दिया। टीएमसी का पारंपरिक सामाजिक समीकरण कमजोर पड़ा और भाजपा को इसका लाभ मिला। दूसरी अहम वजह बंगाली अस्मिता की लड़ाई रही। ममता बनर्जी लंबे समय से भाजपा को बाहरी बताकर बंगाल की की संस्कृति, भाषा और खानपान से जोड़कर राजनीति करती रही हैं। लेकिन भाजपा ने इस बार इस प्रतीक को अपने खिलाफ हथियार बनने नहीं दिया। उसने यह संदेश देने की कोशिश की कि उसका हिंदुत्व बंगाल की संस्कृति से टकराता नहीं, बल्कि बंगाल की शाक्त परंपरा, मां काली की उपासना और स्थानीय जीवनशैली के साथ चल सकता है। यही वह मोड़ था जहां ममता बनर्जी का सांस्कृतिक एकाधिकार कमजोर पड़ा। तीसरी वजह पहचान और ध्रुवीकरण की राजनीति रही। बंगाल में पहले भी धार्मिक पहचान चुनावी विमर्श का हिस्सा रही है, लेकिन इस बार भाजपा ने इसे अधिक आक्रामक ढंग से उठाया। तृणमूल कांग्रेस पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए भाजपा ने हिंदू मतदाताओं को एक साझा राजनीतिक मंच पर लाने की कोशिश की। काली बनाम काबा जैसे नारों ने चुनावी बहस को भावनात्मक और धार्मिक पहचान की दिशा में मोड़ दिया। यह राजनीति विवादास्पद हो सकती है, लेकिन चुनावी दृष्टि से इसका असर साफ दिखा। जिन इलाकों में हिंदू मतों का बिखराव था, वहां भाजपा ने उन्हें अपने पक्ष में संगठित करने में सफलता पई। चौथी वजह युवा मतदाताओं की आकांक्षा रही। बंगाल का एक बड़ा युवा वर्ग पिछले पंद्रह वर्षों से तृणमूल शासन के वातावरण में बड़ा हुआ। इस पीढ़ी के सामने सवाल केवल नकद सहायता योजनाओं या स्थानीय लाभों का नहीं था, बल्कि रोजगार, उद्योग, निवेश और बेहतर भविष्य का था। भाजपा ने सोनार बांग्ला और डबल इंजन सरकार के नारे के जरिए इसी आकांक्षा को छुआ। यह संदेश दिया गया कि केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने से निवेश, आधारभूत ढांचा और रोजगार की संभावनाएं बढ़ेंगी। मतुआ समुदाय के बीच नागरिकता के मुद्दे को उठाकर भाजपा ने एक और महत्वपूर्ण सामाजिक आधार को अपने पक्ष में मजबूत किया। पांचवीं वजह कांग्रेस और वाम दलों की राजनीतिक अनुपस्थिति रही। बंगाल की राजनीति कभी वामपंथ का गढ़ थी। कांग्रेस भी लंबे समय तक राज्य में प्रभावशाली रही। लेकिन इस चुनाव में मुकाबला लगभग सीधे भाजपा और टीएमसी के बीच सिमट गया। जब तीसरी ताकत कमजोर हो जाती है, तो सत्ता विरोधी वोट सीधे सबसे मजबूत विपक्षी दल को मिलते हैं। भाजपा को यही लाभ मिला। 2021 में जिन सीटों पर भाजपा मामुली अंतर से हार गई थी, इस बार वोट स्विंग ने उन सीटों को उसके पक्ष में मोड़ दिया। हालांकि इस जनादेश को केवल भाजपा की जीत और तृणमूल की हार के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह बंगाल के मतदाता का संदेश भी है कि कल्याणकारी योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन वे शासन की कमियों, रोजगार की कमी, भ्रष्टाचार के आरोपों और संगठनात्मक अहंकार की भरपाई हमेशा नहीं कर सकीं। ममता बनर्जी ने बंगाल को वाम शासन से बाहर निकालकर नई दिशा दी थी, लेकिन लंबी सत्ता अपने साथ थकान भी लाती है। सत्ता जब संगठन से बड़ी हो जाती है, तो जनता विकल्प तलाशने लगती है। भाजपा के लिए यह जीत जितनी बड़ी है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी है। बंगाल केवल एक चुनावी राज्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, बौद्धिक और राजनीतिक चेतना की भूमि है। यहां शासन करना केवल बहुमत से संभव नहीं होगा। भाजपा को यह साबित करना होगा कि वह बंगाल की भाषा, संस्कृति, विविधता और सामाजिक संतुलन का सम्मान करते हुए विकास का मौडल दे सकती है। यदि वह केवल ध्रुवीकरण तक सीमित रही, तो यह जनादेश जल्द ही चुनौती में बदल सकता है। बंगाल का यह चुनाव बताता है कि लोकतंत्र में कोई भी सत्ता स्थायी नहीं होती। जनता चुप रहती है, देखती है, परखती है और समय आने पर फैसला सुनाती है। 2026 के इसी फैसले की गूंज हैं। यह बदलाव केवल सरकार बदलने का नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति के नए अध्याय की शुरुआत के लिए है राज्य में संदेश खाली और आरजीकर कालेज की बर्बरतापूर्ण अपराधिक वारदातों के बाद महिलाओं में असुरक्षा की भावना घर कर गई थी वही पिछले एक दशक में तीन सौ से अधिक भाजपा व हिन्दू संगठन के कार्यकर्ता हिंसा का शिकार बने राज्य में कानून व्यवस्था का लगातार पतन अराजकता का माहौल आम जनमानस को सरकार के खिलाफ उद्वेलित कर रहा था जिस का भाजपा के चाणक्य अमित शाह और पीएम नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व ने कुशलता भरी संगठित नीति बद्ध तैयारी से भाजपा जीत का रास्ता तैयार हुआ अब चुनाव परिणाम के बाद जिस तरह लगातार हिंसा की वारदातों की झड़ी लगी है और तीन लोगों की जान जा चुकी है यह चिंता जनक है ।बंगाल की सत्ता में आने पर भाजपा की जिम्मेदारी है कि उसे अपने कार्यकर्ताओं को टीएमसी सरीखा बनने से बचाना है और इस विशाल जनमत का सम्मान करते हुए प्रदेश के विकास और भविष्य की दिशा में काम करना है ताकि बंगाल के लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतर सकें। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं पिछले 38 वर्ष से लेखन और पत्रकारिता से जुड़े हैं) ईएमएस / 07 मई 26