हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में, विशेषकर मोदी युग के आगमन के बाद, अब राजनीति चुनाव-दर-चुनाव चलने लगी है। इस सप्ताह घोषित पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों की चर्चा अभी पूरी तरह थमी भी नहीं है कि अगले वर्ष सात राज्यों में होने वाले चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव की बातें शुरू हो चुकी हैं। लेकिन हालिया चुनाव हों या अगले वर्ष के चुनाव, एक प्रश्न हर ओर पूछा जा रहा है—2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद से विधानसभा चुनावों में विपक्षी दलों का इतना निराशाजनक प्रदर्शन क्यों हो रहा है? चुनावों की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं और पश्चिम बंगाल में तो पूरा चुनाव अभियान ही निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के मुद्दे पर केंद्रित रहा। इसमें बहुत कम संदेह है कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह शासन के दौरान न्यायपालिका, मीडिया तथा निर्वाचन आयोग और राज्यपाल कार्यालय जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर भारी दबाव रहा है, जिससे उनकी स्वतंत्र कार्यक्षमता प्रभावित हुई है। फिर भी चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर टिप्पणी करना कठिन है, लेकिन विपक्ष की खराब स्थिति का पूरा दोष केवल चुनावी धांधली या हेरफेर पर डाल देना उचित नहीं होगा। इसके पीछे कई अन्य कारण भी हैं। विपक्ष द्वारा इस स्थिति की लगातार आलोचना कुछ हद तक उचित अवश्य है, लेकिन केवल इतना भर किसी मजबूत और गहरे जमे हुए भाजपा शासन को सत्ता से हटाने के लिए आवश्यक जनसमर्थन जुटाने के लिए पर्याप्त नहीं है। यही कारण है कि पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि जब ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में पूरी ताकत लगाने के बावजूद भाजपा को रोक नहीं सकीं, तो अन्य राज्यों में विपक्ष भाजपा के रथ को कैसे रोकेगा? हार से अधिक, सीटों के अंतर ने इन आशंकाओं को और मजबूत किया है। यद्यपि विपक्षी नेता खुलकर यह बात न कहें, लेकिन उनमें से अनेक स्वयं भी निकट भविष्य में भाजपा को सत्ता से हटाने की अपनी क्षमता को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। दरअसल, विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी आत्मविश्वास की कमी है। अनेक विपक्षी नेताओं में पराजयवादी सोच और नियतिवादी मानसिकता विकसित हो चुकी है। सत्ता के लंबे सुख ने उनमें संघर्ष की भावना को कमजोर कर दिया है। गैर-कांग्रेसी विपक्षी नेता यह समझने में असफल रहे हैं कि जोड़-तोड़ और समझौतों के सहारे सत्ता में बने रहने का दौर समाप्त हो चुका है। भाजपा व्यवस्थित ढंग से ऐसे दलों का इस्तेमाल करती रही है और बाद में उन्हें राजनीतिक हाशिये पर धकेल देती है। मायावती की बसपा, नवीन पटनायक की बीजद, एकनाथ शिंदे की शिवसेना और नीतीश कुमार की जदयू इसके उदाहरण हैं। आत्मविश्वास और संघर्षशीलता की कमी के अलावा विपक्ष में दो और गंभीर कमजोरियाँ हैं। पहली, बदलती राजनीतिक वास्तविकताओं का तार्किक और निष्पक्ष आकलन करने तथा आवश्यक सुधार करने की क्षमता का अभाव; और दूसरी, विपरीत परिस्थितियों में भी वैचारिक प्रतिबद्धता की कमी। यही दोनों कारक भाजपा-आरएसएस शासन को चुनौती देने की विपक्ष की क्षमता के सबसे बड़े अवरोध हैं। काफी प्रयासों और बड़े प्रचार के बाद बना विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ भाजपा के सामने प्रभावी चुनौती क्यों नहीं बन पाया, यह गंभीर आत्ममंथन का विषय है। यह और भी आश्चर्यजनक है कि मोदी सरकार की अनेक मोर्चों पर विफलताओं के बावजूद विपक्ष ऐसा कोई मजबूत नैरेटिव तैयार नहीं कर सका, जो भाजपा शासन को प्रभावी ढंग से चुनौती दे सके। स्पष्ट है कि विपक्ष को अपनी स्थिति और संभावनाओं का आकलन करने के लिए गंभीर SWOT विश्लेषण की आवश्यकता है। उसे गहन आत्मविश्लेषण करना होगा कि आखिर उससे गलती कहाँ हो रही है। विपक्ष को दो मूलभूत बातें सीखनी होंगी। पहली, जब मुकाबला आरएसएस-भाजपा जैसे शक्तिशाली और संगठित प्रतिद्वंद्वी से हो, तब केवल चुनावी लाभ के लिए एकत्रित स्वार्थी दलों का ढीला-ढाला गठबंधन सफल नहीं हो सकता। दूसरी, राजनीतिक विचारधारा में विश्वास सुविधा का नहीं बल्कि दृढ़ आस्था का विषय होता है। विपक्षी गठबंधन का दावा भाजपा-आरएसएस की सांप्रदायिक और विभाजनकारी राजनीति का विरोध करना है, जो हिंदुत्व की उस राजनीति का समर्थन करता है जिसे उदार और समावेशी हिंदू आस्था का तालिबानी संस्करण कहा जा सकता है। लेकिन विडंबना यह है कि इस गठबंधन में शामिल अनेक नेताओं के भाजपा और उसकी अल्पसंख्यक-विरोधी राजनीति से पुराने और घनिष्ठ संबंध रहे हैं। एक समय तो इंडिया गठबंधन की कमान लगभग नीतीश कुमार को सौंपे जाने की स्थिति बन गई थी, जो मोदी की भाजपा के सहारे राजनीति कर रहे थे और लालू यादव के साथ मिलकर सत्ता में आए थे। बाद में बिहार में जो कुछ हुआ, वह किसी से छिपा नहीं है। यह भी किसी से छिपा नहीं कि अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन आरएसएस के गुप्त समर्थन से चलाया गया था। अरविंद केजरीवाल, जिन्हें छात्र जीवन में एबीवीपी से जुड़ा माना जाता है, ने अपने संगठन से प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव जैसे सभी आरएसएस-विरोधी तत्वों को बाहर कर दिया। यह भी सर्वविदित है कि आम आदमी पार्टी ने गोवा, गुजरात, हरियाणा और पंजाब में कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं को नुकसान पहुँचाया, जिससे भाजपा को लाभ मिला। बाद में जब केजरीवाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ बढ़ीं, तब उनका मोदी से टकराव हुआ और वे भाजपा-विरोधी बन गए। अब ममता बनर्जी की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर भी नजर डालें, जिन्हें मोदी सरकार की सबसे दृढ़ विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उन्होंने 1997 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई और पश्चिम बंगाल में भाजपा के प्रवेश को आसान बनाया। 1999 में वे भाजपा-नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल हुईं और रेल मंत्री बनीं। 2001 में बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में ममता ने भाजपा को अपना “स्वाभाविक सहयोगी” बताया था। 2003 में वे पुनः एनडीए सरकार में शामिल हुईं और आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य ने उन्हें “बंगाल की दुर्गा” कहा। भाजपा नेताओं ने भी बार-बार यही भावना व्यक्त की। यहाँ तक कि जुलाई 2022 में तृणमूल कांग्रेस ने उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा का समर्थन करने से इनकार कर दिया। वास्तव में इंडिया गठबंधन में रहते हुए भी उन्होंने उसे कमजोर करने का काम किया। “खरगोश के साथ दौड़ना और शिकारी कुत्तों के साथ शिकार करना” एक पुरानी कहावत है। ऐसे नेताओं और दलों के रहते यह आश्चर्य की बात नहीं कि विपक्ष सत्ता में बैठे एक संगठित, संसाधन-संपन्न और निर्लज्ज राजनीतिक दल की चुनाव-दर-चुनाव बढ़ती ताकत को रोक पाने में विफल हो रहा है। (वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया गुरु प्रो. प्रदीप माथुर मेडियामैप न्यूज़ नेटवर्क के प्रधान संपादक तथा सामाजिक संस्था एमबीकेएम फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं।) ईएमएस / 07 मई 26