इन्दौर (ईएमएस) वीणा संवाद केन्द्र द्वारा वीणा स्मारिका के 1183वें अंक का लोकार्पण श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति सभागार में एक भव्य समारोह में किया गया। इस अवसर पर लोक साहित्य विषय पर चर्चा भी आयोजित की गई जिसमें विषय प्रवर्तन करते हुए वीणा के संपादक राकेश शर्मा ने कहा कि अनुभव बाजार में नहीं मिलता, साहित्यकार जबसे हवाई जहाज में यात्रा करने लगा है, वो लोक और माटी से दूर हो गया है, जबकि स्मृति लोक से सशक्त होती है और दीर्घकाल तक रहती भी है। उन्होंने लोक संस्कृति पर कलम चलाने वाले साहित्यकारों में डॉ. श्याम सुंदर दुबे, सत्यप्रिय पाण्डेय, डॉ. विद्या बिन्दु सिंह, रामनारायण उपाध्याय जैसे साहित्यकारों का उल्लेख किया। डॉ. पुष्पेन्द्र दुबे ने स्वतंत्रता पूर्व 1947 के वीणा के अंक में डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी के आलेख का संदर्भ देते हुए कहा कि हमें अपने देश को अपनी आंखों से देखना चाहिए। पूर्वजों ने भी अपने देश को अपनी आंखो से ही देखा था। डॉ. दुबे ने बैलों की शक्ति, गौवंश शक्ति इसका महत्व लोक साहित्य की रूपरेखा के साथ स्पष्ट किया कि लोकानुभूति भी बहुत जरुरी है। उन्होंने इस सन्दर्भ में कई उदाहरण और कविताएं प्रस्तुत की। संचालन और आभार डॉ. अंतरा करवडे ने व्यक्त किया। आनंद पुरोहित/ 07 मई 2026