राज्य
07-May-2026
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- पांच बाघों की मौत पर उठे सवाल, कान्हा नेशनल पार्क में ‘डबल फेल’, वायरस का वार-सिस्टम की हार कैनाइन डिस्टेंपर से गई बाघों की जान, फिर भी केटीआर प्रबंधन बना रहा लापरवाह बाघों की मौत के लिए वायरस से ज्यादा जिम्मेदार कौन? बालाघाट (ईएमएस). मध्य प्रदेश के गौरव कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघिन टी-141 और उसके चार शावकों की मौत ने वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जहां एक ओर मौत का कारण घातक वायरस बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इस पूरे घटनाक्रम ने प्रबंधन की लापरवाही और तैयारी की कमी को भी उजागर कर दिया है। जांच में सामने आया कि बाघों की मौत कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) से हुई। यह वायरस कुत्तों से वन्यजीवों में फैलता है और तेजी से उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को खत्म कर देता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब यह वायरस पहले भी देश में तबाही मचा चुका है, तो समय रहते सतर्कता क्यों नहीं बरती गई? बावजूद इसके प्रबंधन केवल कागजी कार्यवाही में ही व्यस्त रहे। मैदानी स्तर पर किसी ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया, जिसके कारण असमय ही बाघों की मौत हो गई। इस हादसे से सबक नहीं लेने पर भविष्य में भी इसी तरह की त्रासदी होने की संभावनाओं को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। क्या समय पर नहीं हुई निगरानी? सूत्रों के मुताबिक, बाघिन और शावकों की तबीयत बिगडऩे के संकेत पहले से मिल रहे थे। इसके बावजूद शुरुआती स्तर पर पर्याप्त मेडिकल निगरानी और त्वरित कार्रवाई नहीं हो पाई। यदि समय रहते संक्रमण की पहचान और आइसोलेशन किया जाता, तो शायद इन बाघों की जान बचाई जा सकती थी। कुत्तों की आवाजाही पर नियंत्रण नहीं विशेषज्ञों का मानना है कि यह वायरस आमतौर पर पालतू और आवारा कुत्तों के जरिए फैलता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जंगल के बफर जोन में कुत्तों की अनियंत्रित आवाजाही पर पहले से रोक क्यों नहीं लगाई गई? हालांकि, जबलपुर की नानाजी देशमुख वेटरनरी साइंस यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के बाद ही टीकाकरण अभियान तेज किया गया, जो पहले ही शुरू होना चाहिए था। घटना के बाद जागा प्रबंधन घटना के बाद प्रबंधन ने तेजी दिखाते हुए प्रभावित क्षेत्र को सील कर नो-गो जोन घोषित किया गया। 40 ट्रैप कैमरों से निगरानी शुरू की गई। आसपास के गांवों में कुत्तों का टीकाकरण अभियान चलाया गया, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कदम पहले नहीं उठाए जा सकते थे? गिर जैसी त्रासदी से भी नहीं ली सीख साल 2018 में गिर नेशनल पार्क में इसी वायरस से कई शेरों की मौत हो चुकी है। इसके बावजूद यदि समय रहते रोकथाम के ठोस इंतजाम नहीं किए गए, तो यह लापरवाही ही मानी जाएगी। केटीआर प्रबंधन की लापरवाही के चलते ही कान्हा में पांच बाघों की मौत हो चुकी है। बावजूद इसके अभी तक इसके लिए किसी की जवाबदेही तय नहीं की गई है। पूरे प्रदेश में अलर्ट, लेकिन भरोसा डगमगाया इस घटना के बाद पेंच टाइगर रिजर्व, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व और पन्ना टाइगर रिजर्व में अलर्ट जारी कर दिया गया है। लेकिन कान्हा जैसी संवेदनशील और प्रतिष्ठित रिजर्व में हुई यह घटना प्रबंधन की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अन्य टाइगर रिजर्व में सीडीवी को लेकर संवेदनशीलता बरती जा रही है लेकिन कान्हा में यह कहीं भी नजर नहीं आई। ‘अदृश्य दुश्मन’ के साथ ‘अदृश्य चूक’ यह घटना केवल एक वायरस का प्रकोप नहीं, बल्कि सिस्टम की कमजोरियों को भी उजागर करती है। अगर समय रहते सतर्कता, निगरानी और रोकथाम के उपाय मजबूत होते, तो शायद ‘जंगल के राजा’ को इस तरह असमय मौत का शिकार नहीं होना पड़ता। कान्हा की यह त्रासदी अब चेतावनी है—वायरस से लड़ाई के साथ-साथ सिस्टम को भी मजबूत करना होगा। भानेश साकुरे / 07 मई 2026