राज्य
08-May-2026
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:: विशेषज्ञों का मत : रील के शोर में खो रही खबरों की गंभीरता, सूचना और मनोरंजन के बीच धुंधली होती लकीर :: भोपाल (ईएमएस)। वर्तमान डिजिटल युग में सूचनाओं का विस्फोट तो हुआ है, लेकिन पत्रकारिता के मूलभूत आदर्शों और विश्वसनीयता पर संकट के बादल भी मंडरा रहे हैं। प्रणाम! उदंत मार्तंड के उपलक्ष्य में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श के दौरान देश के ख्यातिनाम पत्रकारों ने दो टूक शब्दों में कहा कि डिजिटल माध्यमों ने खबरों को लोकतांत्रिक जरूर बनाया है, पर इस तेज रफ्तार ने खबरों की गहराई और तथ्यों की शुचिता को काफी पीछे छोड़ दिया है। विमर्श के दौरान वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण दुबे, बृजेश राजपूत, सलमान रावी, दीप्ति चौरसिया, सुधीर दीक्षित और अनुराग द्वारी ने डिजिटल समय में टीवी पत्रकारिता विषय पर अपने अनुभव साझा करते हुए इस बात पर गहरी चिंता जताई कि आज मोबाइल स्क्रीन ने टेलीविजन की जगह ले ली है, जिससे दर्शकों को थामे रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है। इस अंधी होड़ में पत्रकारिता अब केवल सूचना का माध्यम न रहकर एक ऐसी जटिल प्रतिस्पर्धा बन गई है, जिसमें हर हाथ में मोबाइल लिए व्यक्ति सक्रिय तो है, लेकिन उत्तरदायित्व का अभाव स्पष्ट दिखता है। सत्र में सबसे प्रखर प्रहार उस बढ़ती प्रवृत्ति पर किया गया, जहाँ पत्रकारिता की बुनियादी समझ और औपचारिक प्रशिक्षण के बिना लोग गंभीर सामाजिक विषयों को महज रील और मनोरंजन का साधन मान रहे हैं। वक्ताओं ने दो टूक कहा कि पत्रकारिता कोई शौकिया गतिविधि नहीं बल्कि एक गंभीर सामाजिक उत्तरदायित्व है। प्रशिक्षण के इसी अभाव के कारण आज खबरें निरंतर स्क्रिप्टेड होती जा रही हैं और आम आदमी के मौलिक सरोकार मीडिया विमर्श के केंद्र से धीरे-धीरे हाशिए पर धकेले जा रहे हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में संवाद के घटते स्तर और बढ़ते वैचारिक ध्रुवीकरण पर भी गहरा मंथन हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल माध्यम ऊपरी तौर पर लोगों को जोड़ते हुए दिखते हैं, लेकिन वास्तविकता में ये लोगों को उनकी अपनी पसंद और संकीर्ण सोच के दायरे में कैद कर समाज को अलग-थलग कर रहे हैं। विमर्श का मूल सार यही रहा कि माध्यम चाहे तकनीक के साथ कितना भी बदल जाए, लेकिन पत्रकारिता की आत्मा हमेशा उसकी सत्यता, विश्वसनीयता और संवेदनशीलता में ही रची-बसी रहती है। डिजिटल दौर में गति भले ही प्राथमिकता बन गई हो, लेकिन तथ्यों की गहराई से समझौता करना आत्मघाती सिद्ध हो सकता है। विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा और पत्रकार संयुक्ता बनर्जी द्वारा संचालित इस सत्र में भावी पत्रकारों को यह विशेष सीख दी गई कि तकनीक के इस संक्रमण काल में भी एक पत्रकार की सबसे बड़ी पूँजी उसकी साख ही है। अंततः निष्कर्ष यही निकला कि मीडिया संस्थानों को यदि अपनी प्रासंगिकता बचाए रखनी है, तो उन्हें लोकहित और सामाजिक सच्चाई को अपनी प्राथमिकता में शीर्ष पर रखना ही होगा। प्रकाश/08 मई 2026