मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल ज्ञान अर्जित करना नहीं, बल्कि उस ज्ञान को जीवन में उतारकर स्वयं को एक श्रेष्ठ मनुष्य बनाना है। शिक्षा और संस्कार का संबंध इसी सत्य को प्रकट करता है। शिक्षा व्यक्ति को योग्य बनाती है, जबकि संस्कार उसे महान बनाते हैं। आज के समय में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि शिक्षा का विस्तार तो हुआ है, परन्तु संस्कारों का क्षय भी उसी गति से बढ़ा है। यही कारण है कि समाज में विद्वान व्यक्तियों की कमी नहीं है, पर सुसंस्कृत व्यक्तियों की कमी अवश्य महसूस होती है। इस परिस्थिति में शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। संस्कार और शिक्षा के बीच का अंतर समझना आवश्यक है। शिक्षा एक बाहरी प्रक्रिया है, जो पुस्तकों, विद्यालयों और परीक्षाओं के माध्यम से प्राप्त होती है, जबकि संस्कार आंतरिक प्रक्रिया है, जो परिवार, वातावरण और अनुभवों से विकसित होती है। एक व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकता है, पर यदि उसमें विनम्रता, करुणा, सत्यनिष्ठा और कर्तव्यपरायणता जैसे गुण नहीं हैं, तो उसकी शिक्षा अधूरी मानी जाएगी। दूसरी ओर, एक अशिक्षित व्यक्ति भी अपने श्रेष्ठ संस्कारों के कारण समाज में सम्मानित स्थान प्राप्त कर सकता है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह केवल ज्ञान और कौशल पर केंद्रित हो गई है। विद्यालयों में बच्चों को परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए तैयार किया जाता है, न कि एक अच्छा नागरिक बनने के लिए। नैतिक शिक्षा, मानवता, सहानुभूति और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषय धीरे-धीरे शिक्षा से दूर होते जा रहे हैं। बच्चों पर पुस्तकों का भार इतना अधिक है कि उनके पास जीवन के मूल्यों को समझने का समय ही नहीं बचता। परिणामस्वरूप, वे प्रतिस्पर्धा में तो आगे बढ़ते हैं, पर जीवन के मूल उद्देश्य से भटक जाते हैं। संस्कारों की नींव बचपन में ही रखी जाती है, और इसमें माता-पिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। विशेष रूप से माता का प्रभाव बच्चे के जीवन पर गहरा होता है। बचपन में जो आदतें और विचार बच्चे के मन में स्थापित होते हैं, वही आगे चलकर उसके व्यक्तित्व का आधार बनते हैं। इसलिए यदि प्रारंभिक अवस्था में ही बच्चों को अच्छे संस्कार दिए जाएं, तो वे जीवनभर उनका पालन करते हैं। परन्तु आज की व्यस्त जीवनशैली में माता-पिता बच्चों के साथ पर्याप्त समय नहीं बिता पाते, जिससे संस्कारों का अभाव बढ़ता जा रहा है। विद्यालयों का दायित्व केवल शिक्षा देना नहीं, बल्कि संस्कारों का विकास करना भी है। शिक्षक केवल ज्ञान के प्रदाता नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और प्रेरक भी होते हैं। यदि शिक्षक अपने आचरण से बच्चों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करें, तो बच्चों पर उसका गहरा प्रभाव पड़ता है। दुर्भाग्यवश, आज शिक्षा एक व्यवसाय बनती जा रही है, जहां शिक्षक और छात्र दोनों ही केवल परिणामों पर ध्यान देते हैं, न कि प्रक्रिया पर। इस प्रवृत्ति को बदलना अत्यंत आवश्यक है। सरकार को शिक्षा में सुधार के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले, शिक्षा नीति में नैतिक और मूल्य आधारित शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। विद्यालयों में केवल सैद्धांतिक ज्ञान के बजाय जीवन कौशल, नैतिक शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। पाठ्यक्रम में ऐसे विषय शामिल किए जाएं, जो बच्चों को जीवन के वास्तविक पहलुओं से जोड़ें। दूसरे, शिक्षकों के प्रशिक्षण में सुधार किया जाना चाहिए। शिक्षकों को केवल विषय ज्ञान ही नहीं, बल्कि बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए भी प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। उन्हें यह सिखाया जाए कि वे बच्चों में अच्छे संस्कार कैसे विकसित कर सकते हैं। एक प्रेरणादायक शिक्षक ही एक सशक्त समाज का निर्माण कर सकता है। तीसरे, शिक्षा प्रणाली को परीक्षा-केंद्रित होने से बचाना चाहिए। वर्तमान में बच्चों की योग्यता का आकलन केवल अंकों के आधार पर किया जाता है, जो उचित नहीं है। इसके स्थान पर समग्र मूल्यांकन प्रणाली अपनाई जानी चाहिए, जिसमें बच्चों के व्यवहार, नैतिकता और सामाजिक योगदान को भी महत्व दिया जाए। चौथे, विद्यालयों में सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। खेल, कला, संगीत और सामाजिक सेवा जैसी गतिविधियाँ बच्चों के व्यक्तित्व को संतुलित बनाती हैं और उनमें सहयोग, अनुशासन और संवेदनशीलता जैसे गुण विकसित करती हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल मस्तिष्क का विकास नहीं, बल्कि हृदय का विकास भी होना चाहिए। पांचवें, सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शिक्षा सभी के लिए सुलभ और समान हो। आर्थिक असमानता के कारण कई बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। यदि सभी बच्चों को समान अवसर मिलेंगे, तो समाज में संतुलन और समरसता स्थापित होगी। इसके अतिरिक्त, परिवार और समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। माता-पिता को बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए और उन्हें जीवन के मूल्यों से परिचित कराना चाहिए। समाज को भी ऐसे वातावरण का निर्माण करना चाहिए, जहां अच्छे संस्कारों को प्रोत्साहन मिले। आज के बच्चे ही भविष्य के नागरिक हैं। यदि उनमें अच्छे संस्कार विकसित किए जाएं, तो वे एक सशक्त और नैतिक समाज का निर्माण कर सकते हैं। शिक्षा को केवल रोजगार का माध्यम न बनाकर, जीवन निर्माण का साधन बनाना होगा। इसके लिए सरकार, विद्यालय, शिक्षक और अभिभावक सभी को मिलकर प्रयास करना होगा। अंततः यही कहा जा सकता है कि शिक्षा और संस्कार एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना संस्कार के शिक्षा अधूरी है और बिना शिक्षा के संस्कारों का विकास सीमित हो सकता है। इसलिए आवश्यक है कि शिक्षा को संस्कारों की जननी के रूप में पुनः स्थापित किया जाए। जब शिक्षा में नैतिकता, मानवता और जीवन मूल्यों का समावेश होगा, तभी एक आदर्श समाज का निर्माण संभव होगा। (L 103 जलवन्त टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 09 मई 26