होर्मुज मार्ग बंद होने से दुनिया झुलस रही है ऊर्जा संकट की आग से मोदी सरकार ने सूझबूझ से जनता पर नहीं आने दी इस संकट की आंच, खुद उठाया बोझ।ऽ भारत में सामान्य रूप से होते रहे सभी कार्य जनता को भी देना होगा धैर्य के साथ देश का साथ वैश्विक युद्ध और होर्मुज संकट का असर आज पूरी दुनिया महसूस कर रही है। युद्ध की लपटें केवल सीमाओं तक सीमित नहीं हैं, उनका असर हर घर की रसोई, हर वाहन के पहिए और हर परिवार के बजट तक पहुंच चुका है। कई देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें इतिहास के उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं, पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लगीं, महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी और सरकारें अपने नागरिकों के गुस्से का सामना करने को मजबूर हो गईं। लेकिन इसी उथल-पुथल के बीच आज युद्ध के लगभग 11 सप्ताह बीतने पर भी भारत में जीवन की सामान्य गति बनी रही, करोड़ों परिवारों के चूल्हे जलते रहे, गाड़ियां चलती रहीं। यह अपने आप नहीं हुआ। इसके पीछे एक ऐसी नीति, ऐसी तैयारी और ऐसी संवेदनशील सोच थी जिसने वैश्विक तूफान के सामने भारत के नागरिकों को ढाल बनकर संरक्षण दिया। जब दुनिया ऊर्जा संकट की आग में झुलस रही थी, तब मोदी सरकार एक संरक्षक की तरह अपने नागरिकों के साथ खड़ी रही। जैसे द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों को बचाया था, वैसे ही इस कठिन समय में सरकार ने बढ़ती वैश्विक कीमतों और आर्थिक दबाव का बड़ा हिस्सा स्वयं अपने ऊपर उठाया, ताकि उसका बोझ सीधे जनता की थाली, रसोई और जेब तक न पहुंचे। यही कारण है कि आज यह संकट केवल आर्थिक प्रबंधन की कहानी नहीं, बल्कि संवेदनशील शासन, दूरदर्शी नेतृत्व और नागरिकों के प्रति उत्तरदायित्व की मिसाल बन चुका है। दुनिया भर में बढ़ती कीमतों का बोझ सीधे जनता पर डाल देना सबसे आसान रास्ता था और कई देशों ने ऐसा ही किया, लेकिन भारत ने यह रास्ता नहीं चुना। मोदी सरकार ने स्वयं भारी आर्थिक दबाव सहा ताकि आम आदमी की रसोई और रोजमर्रा की जिंदगी पर कम से कम असर पड़े। सरकार ने लगभग पेट्रोल पर 24 रुपये प्रति लीटर तथा डीजल पर 30 रुपये प्रति लीटर का भार वहन किया। 28 फरवरी के बाद से वैश्विक स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई। यूरोप और एशिया के कई देशों में पेट्रोल 30 से लेकर 35 प्रतिशत तक महंगा हुआ, जबकि भारत में कोई बदलाव नहीं किया गया। हांगकांग में आज पेट्रोल सबसे महंगा है। वहाँ एक लीटर की कीमत लगभग 295 रुपये पहुंच गई है, जो 28 फरवरी के बाद 25 प्रतिशत बढ़ी है। सिंगापुर में दाम 30 प्रतिशत बढ़कर करीब 240 रुपये प्रति लीटर हो गया है। नीदरलैंड में पेट्रोल 225 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है, जो 28 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। युद्धग्रस्त इजराइल में पेट्रोल 30 प्रतिशत महंगा होकर 185 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गया है। वहीं भारत में अब भी पेट्रोल की कीमत 95 रुपये प्रति लीटर है। प्रतिदिन लगभग 1,000 करोड़ का घाटा उठाना कोई साधारण बात नहीं है। अब तक लगभग 68,000 करोड़ का बोझ सरकार और तेल कंपनियों ने अपने ऊपर लिया है। यह आंकड़ा उस संवेदनशील सोच का प्रमाण है जिसमें मोदी सरकार ने पहले नागरिकों की चिंता की और बाद में अपने खजाने की। सोचिए, यदि यही संकट बिना तैयारी के आया होता तो क्या स्थिति होती? रसोई गैस महंगी होती, परिवहन लागत बढ़ती, महंगाई हर घर तक पहुंचती और मध्यम वर्ग से लेकर गरीब तक का बजट डगमगा जाता। लेकिन साल 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आते ही स्थितियां बदलनी शुरू हुईं। पिछले वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर जो दूरदर्शी तैयारी की गई, वही आज देश की ढाल बनकर खड़ी है। तेल भंडार तैयार किए गए, एथनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाई गई, वैकल्पिक ईंधन नेटवर्क विकसित हुआ और रिफाइनिंग क्षमता का विस्तार शुरू हुआ। वैकल्पिक ईंधन के माध्यम से एलपीजी की मांग को 70 से 75 हजार टन प्रति दिन कम किया गया। यह केवल इसलिए संभव हुआ क्योंकि पीएनजी, मिट्टी का तेल, ईंधन तेल और बायोमास की वैकल्पिक अवसंरचना संकट से पहले से तैयार थी। जापान और दक्षिण कोरिया के बाद भारत ही ऐसा देश है जो 30-दिवसीय एलपीजी भंडार की योजना बना रहा है। इस युद्ध से उत्पन्न संकट से पता चलता है ये हमारी आज की आवश्यकता है। आज भारत के पास 5.33 मिलियन टन का रणनीतिक तेल भंडार है और दूसरे चरण के तहत चंडीखोल, पादुर और बीकानेर में अतिरिक्त भंडारण क्षमता तैयार की जा रही है। यह केवल परियोजनाएं नहीं हैं, बल्कि भविष्य के संकटों से देशवासियों को सुरक्षित रखने की तैयारी है। एथनॉल मिश्रण की नीति ने भी इस कठिन समय में देश को बड़ी राहत दी। 20 प्रतिशत ब्लेंडिंग के कारण भारत विदेशी मुद्रा की भारी बचत कर पा रहा है। संकट के दौरान वैकल्पिक ईंधन व्यवस्था के जरिए एलपीजी की मांग में प्रतिदिन 70 से 75 हजार टन तक कमी लाई गई। ये कदम बताते हैं कि सरकार ने केवल आज के लिए नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए भी सुरक्षा का रास्ता तैयार किया है। युद्ध अब भी जारी है। आने वाले समय में कठिन फैसले लेने पड़ सकते हैं। लेकिन देश को यह नहीं भूलना चाहिए कि जब पूरी दुनिया दबाव में थी, तब भारत सरकार ने अपने नागरिकों को अकेला नहीं छोड़ा। उसने एक अभिभावक की तरह जिम्मेदारी निभाई। सरकारें केवल योजनाओं और घोषणाओं से बड़ी नहीं बनतीं, बल्कि कठिन समय में अपने लोगों के साथ खड़े होने से बड़ी बनती हैं। इस वैश्विक संकट के दौर में भारत ने यही करके दिखाया है। यही कारण है कि आज देश का आम नागरिक सिर्फ राहत महसूस नहीं कर रहा, बल्कि उसके मन में यह भरोसा भी मजबूत हुआ है कि संकट चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, देश उसके साथ खड़ा है। हालांकि यह संकट अभी पूरी तरह टला नहीं है। समय की मांग यह भी है कि देश के नागरिक भी आने वाली चुनौतियों के प्रति सजग, संयमित और तैयार रहें। नागरिकों का कत्र्तव्य है कि ऊर्जा का इस्तेमाल किफायत से करें। वैशिवक संकट के बीच ढाल बनी भारत सरकार का धैर्यपूर्वक साथ दें। (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 11 मई /2026