लेख
11-May-2026
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- एनआरआई के लिए डॉलर बांड भारत का विदेशी मुद्रा भंडार पिछले ढाई महीनों में तेजी से घटकर लगभग 550 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। यह स्थिति केंद्र सरकार और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के लिए चिंता का विषय है। विदेशी मुद्रा भंडार देश की आर्थिक मजबूती का महत्वपूर्ण आधार है। इसी के सहारे आयात, अंतर्राष्ट्रीय भुगतान और मुद्रा विनिमय दर को स्थिर रखने में होता है। इसका असर आयात और निर्यात दोनों पर पड़ता है। अमेरिका और ईरान के बीच जब युद्ध चल रहा है, ऐसी स्थिति में वैश्विक बाजार में अस्थिरता, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और डॉलर की मजबूती के कारण भारत पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट भारत की अर्थ व्यवस्था के लिए गंभीर संकट का संकेत है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 85 फ़ीसद हिस्से का आयात करता है। खाद भी बड़े पैमाने पर भारत को आयात करनी होती है। पेट्रोलियम, खाद और गैस के आयात में भारी मात्रा में डॉलर की जरूरत होती है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार कमी सरकार और रिजर्व बैंक को वैकल्पिक उपायों पर विचार करने पर मजबूर कर रहे हैं। इसी क्रम में डॉलर बॉन्ड जारी करने की योजना सामने आई है। विदेशों में बसे भारतीयों (एनआरआई) को बांड बेचकर सरकार डॉलर का भंडार बढ़ाना चाहती है। यह योजना सरकार और रिजर्व बैंक के लिए अल्पकालिक राहत देने वाली होगी। एनआरआई निवेशकों से डॉलर प्राप्त कर सरकार विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत करने का प्रयास करेगी। इससे तत्काल डॉलर की उपलब्धता बढ़ सकती है। रुपये पर पड़ रहा दबाव कुछ कम हो सकता है। भारत वित्तीय स्थिति को तत्काल नियंत्रित करने में सफल हो सकता है। लेकिन आगे चलकर अर्थव्यवस्था में दोहरा दबाव भी पड़ सकता है। इस योजना के साथ कई जोखिम भी हैं। सबसे बड़ा खतरा विनिमय दर का है। पिछले कुछ वर्षों में डॉलर, लगातार रुपये के मुकाबले मजबूत हुआ है। भविष्य में रुपये की कमजोरी जारी रहती है, तो सरकार को बॉन्ड का भुगतान मांग के अनुसार करने पर ज्यादा डॉलर भुगतान करना पड़ेगें। इसमें सरकार को केवल ब्याज ही नहीं, बल्कि विनिमय दर मे भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। यह स्थिति भविष्य में वित्तीय दबाव को और बढ़ा सकती है। विदेशी मुद्रा संकट से निपटने के लिए केवल उधारी आधारित समाधान लंबे समय तक प्रभावी नहीं हो सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है, भारत को निर्यात बढ़ाने और आयात पर निर्भरता घटाने, घरेलू उत्पादन को मजबूत करने की दिशा में ज्यादा ध्यान देना होगा। ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार, निर्यात बढ़ाने और वैश्विक निवेश आकर्षित करने की दिशा में दीर्घकालीन ठोस कदम उठाने जरूरी हैं। सरकार और रिजर्व बैंक को समझना होगा, विदेशी मुद्रा भंडार केवल आंकड़ों का खेल नहीं है। यह देश के आयात-निर्यात भुगतान के संतुलन तथा आर्थिक विश्वसनीयता का प्रतीक है। यदि विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घट रहा है तो उसे संभालने के लिए बार-बार बाहरी संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। यह दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इसलिए डॉलर बॉन्ड तत्काल मलहम का काम कर सकता है। यह स्थायी समाधान नहीं है। भारत को अपनी आर्थिक नीतियों को बेहतर एवं मजबूत बनाना होगा। विदेशी मुद्रा भंडार आयात-निर्यात भुगतान संतुलन एवं वैश्विक अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा का भंडार होना ही चाहिए। पिछले कुछ महीनों से जिस तरह से देश को अर्थ संकट का सामना कर रहा है, विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घट रहा है। विदेशी निवेशक भारत से भाग रहे हैं। निर्यात की तुलना में आयात लगातार बढ़ रहा है। भारत सरकार के ऊपर देसी और विदेशी कर्ज बढ़ता जा रहा है। रुपए के मुकाबले डॉलर की कीमत तेजी से बढ़ रही है। इस दिशा में गंभीरता के साथ सरकार के अर्थ विशेषज्ञों और रिजर्व बैंक को जवाबदेही के साथ जिम्मेदारी का निर्वाह करना होगा, अन्यथा स्थिति कभी भी भयावह हो सकती है। ईएमएस / 11 मई 26