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10-May-2026


- स्वास्थ्य बीमा होने के बावजूद लोग मेडिकल खर्च का 47 फीसदी तक जेब से चुका रहे नई दिल्ली (ईएमएस)। हाल के वर्षों में स्वास्थ्य बीमा लेने वालों की संख्या बढ़ने के बावजूद, परिवारों पर मेडिकल खर्च का बोझ कम नहीं हो पा रहा है। अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में बीमा भले ही कुछ राहत दे लेकिन कई ऐसे खर्च होते हैं जो इसकी पॉलिसी के दायरे से बाहर रह जाते हैं। स्टेवेल हेल्थ के को-फाउंडर का मानना है कि इस अंतर को पाटने और भविष्य की स्वास्थ्य जरूरतों के लिए एक समर्पित हेल्थ कॉर्पस बनाना बेहद आवश्यक है। हेल्थ कॉर्पस स्वास्थ्य संबंधी विशिष्ट खर्चों के लिए बनाया गया एक अलग फंड है, जो इमरजेंसी फंड से भिन्न होता है। उनके अनुसार इसे व्यक्ति की उम्र, आश्रितों और बीमा कवरेज की कमी को ध्यान में रखकर तैयार करना चाहिए। भारत में कुल स्वास्थ्य खर्च का लगभग 39 से 47 प्रतिशत हिस्सा लोगों को अपनी जेब से देना पड़ता है, जो दुनिया में सबसे अधिक है। बीमा होने के बावजूद अस्पताल के अतिरिक्त सामान, कमरे की सीमा से अधिक खर्च, को-पेमेंट और कुछ आधुनिक उपचारों की लागत अक्सर कवर नहीं होती। इसके अलावा कई पॉलिसियों में पहले से मौजूद बीमारियों के लिए वेटिंग पीरियड होता है और मानसिक स्वास्थ्य व रोबोटिक सर्जरी जैसे इलाज सीमित कवरेज के साथ आते हैं। चिकित्सा खर्चों में 10 से 14 फीसदी वार्षिक वृद्धि हो रही है, जिससे 5-7 साल में इलाज का खर्च दोगुना हो जाता है। उनका कहना है ‎कि इसके अभाव में परिवारों को इक्विटी, रिटायरमेंट या पीएफ जैसी लंबी अवधि की बचतों को तोड़ना पड़ता है, जिससे संपत्ति के विकास और भविष्य के रिटर्न पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह मेडिकल इमरजेंसी में निवेश से पैसे निकालने की मजबूरी को कम कर, लंबी अवधि के निवेश को सुरक्षित रखता है। सतीश मोरे/10मई ---