पीएम नरेंद्र मोदी हर बार कुछ नया करते हैं पहलीबार जब संसद की दहलीज पर शीश नमन किया तो उसकी आवाज़ दूर तक गयी इस बार तो मोदी बंगाल की जीत और शपथ ग्रहण समारोह में उमड़े जन सैलाब को देख इतना आह्लादित हुए कि मंच पर ही साष्टांग दंडवत कर जनता जनार्दन के दिल में गहराई तक हिलोरें चला गए। कुछ भी कहो मोदी के घोर आलोचक भी मोदी के करिश्माई नेता होने से इंकार नहीं कर सकते हैं। आपको बता दें भारतीय राजनीति के इतिहास में साल 2014 एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज है, जिसने न केवल केंद्र की सत्ता बदली, बल्कि राज्यों के राजनीतिक नक्शे को भी पूरी तरह से नई परिभाषा दे दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उन भौगोलिक क्षेत्रों में अपनी पैठ बनाई है, जहां कभी पार्टी का अस्तित्व नगण्य माना जाता था। हाल ही में पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों ने इस सफर को एक नई ऊंचाई दी है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के अभेद्य शासन को समाप्त कर भाजपा ने बंगाल की सत्ता हासिल की है। यह केवल एक राज्य की जीत नहीं है, बल्कि उस लंबी यात्रा का शिखर है, जिसमें भाजपा ने पिछले 12 वर्षों में नौ ऐसे राज्यों में अपना पहला मुख्यमंत्री बनाया है, जहां पहले कभी उसका नेतृत्व नहीं रहा था भाजपा के इस स्वर्णिम काल की नींव 2014 में ही पड़ गई थी। हरियाणा, जिसे पारंपरिक रूप से लाल तिकड़ी और क्षेत्रीय क्षत्रपों का गढ़ माना जाता था, वहां भाजपा ने पहली बार अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।साल 2016 भाजपा के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ, जब पार्टी ने पूर्वोत्तर भारत के प्रवेश द्वार असम में अपनी पहली सरकार बनाई। सर्बानंद सोनोवाल राज्य के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बने। असम की यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसने पूरे पूर्वोत्तर में भाजपा के लिए रास्ते खोल दिए।असम के बाद अरुणाचल प्रदेश में भाजपा ने एक अलग रणनीति के तहत सत्ता हासिल की। 2016 में बड़े राजनीतिक उलटफेर के बीच पेमा खांडू ने कांग्रेस छोड़ी और अंततः अपने सहयोगियों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। इससे राज्य में भाजपा की पहली स्थिर सरकार बनी। इसी तरह 2017 में मणिपुर में भी भाजपा ने क्षेत्रीय दलों जैसे नेशनल पीपुल्स पार्टी और नगा पीपुल्स फ्रंट के साथ मिलकर सरकार बनाई।बिहार की राजनीति में भाजपा हमेशा से एक प्रमुख खिलाड़ी रही है, लेकिन वह लंबे समय तक नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकारों में कनिष्ठ सहयोगी की भूमिका में रही। दो दशकों के इंतजार के बाद 2026 में वह क्षण आया जब नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद भाजपा ने अपना पहला मुख्यमंत्री बनाया। पश्चिम बंगाल की जीत भाजपा की अब तक की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण जीत मानी जा रही है। 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर भाजपा ने उस राज्य में सरकार बनाई है, जो वैचारिक रूप से पार्टी के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण था। परिवर्तनकारी नेता सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत हो चुकी है। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि उस लंबे राजनीतिक संघर्ष की परिणति है, जिसने बंगाल की जनता के भीतर परिवर्तन, सुशासन और विकास की उम्मीद को मजबूत किया। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह क्षण ऐतिहासिक इसलिए भी है, क्योंकि बंगाल को पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री मिला है। आजादी के बाद से यह राज्य कांग्रेस, वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस के शासन का साथी रहा, लेकिन अब राज्य की राजनीति में एक नया रंग, नई दिशा और नया विमर्श सामने आया है। भाजपा की जीत को पार्टी सोनार बांग्ला के संकल्प की शुरुआत के रूप में देख रही है। साथ ही सुवेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना भी अपने आप में बंगाल की राजनीति की असाधारण कहानी है। नगरपालिका के एक पार्षद से शुरू हुआ उनका सफर विधायक, सांसद, मंत्री, विपक्ष के नेता और अब मुख्यमंत्री तक पहुंचा है। यह यात्रा केवल पदों की सीढ़ी चढ़ने की कहानी नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े राजनीतिक संघर्ष, संगठन क्षमता और जनाधार का प्रमाण है। पूर्वी मिदनापुर की गलियों से राज्य सत्ता के केंद्र तक पहुंचना उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को अलग पहचान देता है। नंदीग्राम आंदोलन ने सुवेंदु अधिकारी को बंगाल की राजनीति में निर्णायक चेहरा बनाया। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हुए उस आंदोलन ने न केवल वाम मोर्चा सरक सरकार की जड़ों को हिलाया, बल्कि बंगाल में सत्ता परिवर्तन की पहली बड़ी पृष्ठभूमि भो तैयार की। सुर्वेदु उस आंदोलन में एक ऐसे संगठक के रूप में उभरे, जो जनता की स्थानीय पीड़ा को राजनीतिक शक्ति में बदलना जानते थे। यही कारण है कि उनका नेतृत्व केवल चुनावी रणनीति का परिणाम नहीं माना जा सकता, बल्कि संघर्ष से निकले नेतृत्व की श्रेणी में रखा जा सकता है। 2021 में नंदीग्राम से ममता बनर्जी को हराकर सुवेंदु अधिकारी ने अपनी राजनीतिक पहचान को और मजबूत किया। उस चुनाव में भाजपा भले सत्ता तक नहीं पहुंच सकी थी, लेकिन नंदीग्राम की जीत ने पार्टी को मनोवैज्ञानिक बढ़त दी। विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने तृणमूल सरकार के खिलाफ लगातार आक्रामक भूमिका निभाई और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच एक दृढ़ नेता की छवि बनाई। यही कारण है कि सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए उनका नाम स्वाभाविक रूप से सबसे आगे माना गया। भाजपा विधायक दल में उनके नाम पर सर्वसम्मति भी यह बताती है कि पार्टी अब बंगाल में नेतृत्व को लेकर स्पष्टता चाहती है। लंबे समय तक भाजपा को बंगाल में बाहरी शक्ति के रूप में प्रचारित किया जाता रहा, लेकिन सुर्वेद अधिकारी जैसे स्थानीय और जमीनी नेता के मुख्यमंत्री बनने से भाजपा ने इस धारणा को चुनौती दी है। वे बंगाल की भाषा, मिट्टी, संघर्ष और सामाजिक मनोविज्ञान को समझने वाले नेता हैं। यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है। मिदनापुर से मुख्यमंत्री बनना भी प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। बंगाल की सत्ता लंबे समय तक कोलकाता केंद्रित राजनीतिक अभिजात वर्ग के इर्द-गिर्द घूमती रही। अधिकारी का उभार इस व्यवस्था से बाहर के क्षेत्रीय नेतृत्व की स्वीकृति है। मिदनापुर में जश्न का माहौल केवल राजनीतिक खुशी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति भी है। लोगों को उम्मीद है कि अब राज्य के उपेक्षित क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा में अधिक महत्व मिलेगा। अब सबसे बड़ी चुनौती भाजपा और सुर्वेद सरकार के सामने चुनावी वादों को प्रशासनिक परिणामों में बदलने की है। डबल इंजन सरकार का नारा जनता को तभी सार्थक लगेगा, जब राज्य और केंद्र के बीच बेहतर तालमेल से रोजगार, उद्योग, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर ठोस बदलाव दिखेगा। बंगाल में राजनीतिक हिंसा लंबे समय से गंभीर चिंता का विषय रही है। नई सरकार के लिए पहली कसौटी यही होगी कि वह भयमुक्त राजनीतिक वातावरण बना सके। सबसे पहली चुनौती कानून-व्यवस्था की है। बंगाल में राजनीतिक हिंसा, दलगत टकराव, सिंडिकेट संस्कृति और चुनावी हिंसा लंबे समय से गंभीर मुद्दे रहे हैं। भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार में इन्हीं मुद्दों को प्रमुखता से उठाया था। अब जनता देखेगी कि नई सरकार अपराध और राजनीतिक संरक्षण के कथित गठजोड़ पर कितनी सख्ती दिखाती है। कानून का राज तभी स्थापित होगा जब कार्रवाई निष्पक्ष हो, चाहे आरोपी किसी भी दल, समूह या प्रभावशाली वर्ग से जुड़ा हो। दूसरी बड़ी चुनौती प्रशासनिक सुधार की है। बंगाल में वर्षों से सरकारी व्यवस्था पर राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप लगते रहे हैं। यदि नई सरकार सचमुच सुशासन का दावा करती है, तो उसे थाने, ब्लॉक कार्यालय, पंचायत व्यवस्था, नगर प्रशासन और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता लानी होगी। भाजपा के सामने यह जिम्मेदारी होगी कि वह अपने राजनीतिक विस्तार को सांस्कृतिक संवेदनशीलता के साथ जोड़े। बंगाल में यह क्रांतिकारी परिवर्तन सचमुच सोनार बांग्ला ही नही सोनार भारत की दिशा में मजबूत कदम है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के राजनीतिक परिदृश्य में एक अत्यंत प्रभावशाली और क्रांतिकारी नेता के रूप में उभरे हैं, जिन्होंने 12 वर्षों से अधिक के अपने कार्यकाल में बुनियादी ढांचे, डिजिटल क्रांति और प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से देश में अभूतपूर्व प्रगति की है। प्रधान सेवक के रूप में, उन्होंने सीमा सुरक्षा, वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर बड़े फैसले लेने और विकसित भारत के निर्माण में अपनी एक अलग पहचान बनाई है वहीं भाजपा को सत्ता के चरम शिखर पर पहुंचाने के संकल्प को पूरा करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। आज समूचे देश में भगवा राजनीति छा चुकी है यह एक नए भविष्य का सूत्रपात करेगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) ईएमएस / 10 मई 26