उल्हासनगर, (ईएमएस)। इसे विडंबना ही कहेंगे कि उल्हासनगर में करोड़ों रुपये खर्च कर लागू की गई पानी वितरण योजनाओं के बावजूद नागरिकों को आज भी पानी की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है। केंद्र और राज्य सरकार की अमृत योजना के तहत दो चरणों में 425 करोड़ और 116 करोड़ रुपये की जलापूर्ति परियोजनाएं चलाई गईं, लेकिन इसके बाद भी शहर के कई इलाकों में पानी की कमी बनी हुई है। हालत यह है कि पानी की पाइपलाइन से होने वाला रिसाव अब भी 30 प्रतिशत से अधिक बताया जा रहा है। महानगरपालिका का कहना है कि शहर का भौगोलिक ढांचा ऊंचे और निचले क्षेत्रों में बंटा होने के कारण पानी सप्लाई में दिक्कत आती है। वहीं पुरानी जलवाहिनियों की वजह से बड़े पैमाने पर पानी लीकेज हो रहा है। इस समस्या को दूर करने के लिए पहले चरण में नई पाइपलाइन बिछाने, ऊंचे जलकुंभ बनाने और पानी मीटर लगाने जैसी योजनाएं शुरू की गई थीं। दूसरे चरण में अधूरे कार्यों को पूरा किया जाना था। इन योजनाओं के पूरा होने के बाद उम्मीद थी कि शहरवासियों को नियमित और पर्याप्त पानी मिलेगा, लेकिन जमीनी स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है। शहर के पूर्वी हिस्सों में लोगों को एक दिन छोड़कर पानी मिल रहा है, जबकि पश्चिमी इलाके भी अनियमित जलापूर्ति से परेशान हैं। स्थिति को संभालने के लिए मनपा को पानी संकट वाले इलाकों में टैंकरों और अन्य वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर लाखों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। समस्या का एक बड़ा कारण यह भी है कि महानगरपालिका के पास अपना स्वतंत्र जलस्रोत नहीं है। शहर पूरी तरह एमआयडीसी की जलापूर्ति पर निर्भर है। अधिकारियों के अनुसार एमआयडीसी से मिलने वाला पानी शहर की जरूरत के मुकाबले कम है, जिसके कारण पानी संकट और गहरा गया है। करीब 550 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद नागरिकों को नियमित पानी न मिल पाने से लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। नागरिकों ने प्रशासन से जल्द स्थायी समाधान निकालने की मांग की है। संतोष झा- ११ मई/२०२६/ईएमएस