नई दिल्ली (ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा है कि केवल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज होने मात्र से अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) को स्वचालित या यांत्रिक रूप से खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि निचली अदालतों को हर मामले में तथ्यों, एफआईआर में लगाए गए आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों की गहन जांच करनी चाहिए, उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि एससी/एसटी एक्ट की धारा 18 का प्रयोग किसी भी मामले में बिना सोच-विचार के “मैकेनिकल तरीके” से नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रावधान का लागू होना पूरी तरह संबंधित मामले की परिस्थितियों और आरोपों की प्रकृति पर निर्भर करता है। अदालत ने यह भी कहा कि धारा 18 अदालतों की न्यायिक जांच की शक्ति को पूरी तरह समाप्त नहीं करती। मामला गुजरात से जुड़ा है, जहां एक व्यक्ति के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 और एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोप था कि आरोपी ने शादी का वादा कर महिला से संबंध बनाए और बाद में विवाह से इनकार कर दिया। शिकायतकर्ता महिला अनुसूचित जाति समुदाय से है। एफआईआर में यह भी उल्लेख किया गया कि आरोपी को महिला की जाति की जानकारी थी और उसने कथित रूप से उसकी जाति को लेकर टिप्पणियां भी की थीं। गुजरात हाईकोर्ट ने मार्च 2026 में अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया था, यह कहते हुए कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह देखना जरूरी है कि क्या प्रथम दृष्टया एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध बनता भी है या नहीं। यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां एससी/एसटी एक्ट के आरोप अन्य आपराधिक धाराओं के साथ लगाए जाते हैं, विशेषकर व्यक्तिगत संबंधों या विवाह विवादों से जुड़े मामलों में, ताकि न्यायिक प्रक्रिया संतुलित और तथ्यों पर आधारित बनी रहे। चन्द्रबली सिंह / ईएमएस / 11/05/ 2026