पीएम मोदी ने हैदराबाद के मंच से देशवासियों के सामने सात अपीलें रखीं, जो केवल राजनीतिक भाषण नहीं था, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के बदलते मिजाज का एक बड़ा संकेत था। मोदी का यह कहना कि एक साल तक सोना खरीदने से बचें, विदेशी यात्राएं टालें और पेट्रोल-डीजल की खपत कम करें, सुनने में तो नागरिकों से किया गया एक साधारण अनुरोध लगता है, लेकिन इसके पीछे छिपे आर्थिक अर्थ बेहद गहरे और गंभीर हैं। वहीं, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का यह कहना कि ये अपीलें सरकार की नाकामियों का सबसे बड़ा कबूलनामा हैं, राहुल का यह कहना कोई छोटी बात नहीं है। क्या वाकई भारत किसी बड़े आर्थिक भंवर की ओर बढ़ रहा है या फिर यह आने वाले किसी वैश्विक तूफान से पहले की महज एक सावधानी है। पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को 120 डॉलर प्रति बैरल के पार हैं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 से 90 प्रतिशत तेल आयात करता है, और जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो उसका सीधा असर हमारी जेब और देश के खजाने पर पड़ता है। अगर आंकड़ों की बात करें, तो मई 2026 की शुरुआत तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार गिरकर 690 अरब डॉलर के स्तर पर आ गया है। यह गिरावट इसलिए चिंता पैदा करती है क्योंकि महज तीन महीने पहले हम 728 अरब डॉलर पर थे। दूसरी ओर, डॉलर के मुकाबले रुपया 95 के करीब पहुंच चुका है, जिसका मतलब है कि हर वह चीज जो हम बाहर से मंगाते हैं, सब कुछ महंगा हो गया है। इसी संदर्भ में राहुल गांधी का यह तर्क वाज़िब है कि 12 साल के लंबे शासन और आत्मनिर्भर भारत के ढोल पीटने के बावजूद, हम आज भी इतने कमजोर क्यों हैं कि एक बाहरी युद्ध की आहट मात्र से हमें अपनी जीवनशैली बदलने की सलाह दी जा रही है? विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने पिछले दशक में बुनियादी ढांचे और विनिर्माण पर उस स्तर पर काम नहीं किया कि हम ऐसे वैश्विक झटकों को मजबूती से सह सकें। जब सरकार जनता से कहती है कि वे सोना न खरीदें या अपनी गाड़ियां कम चलाएं, तो वह असल में अपनी आर्थिक नीतियों की विफलता का बोझ आम आदमी के कंधों पर डाल रही होती है। यह तर्क भी अपनी जगह सही है कि महंगाई को नियंत्रित करना और रुपये को संभालना पूरी तरह सरकार की जिम्मेदारी है, न कि नागरिकों की मजबूरी। एक आम करदाता यह पूछने का हक रखता है कि भारी-भरकम टैक्स देने के बाद भी उसे संकट के समय त्याग करने को क्यों कहा जाता है? हालाँकि नजरअंदाज करना बेमानी होगा। दुनिया के आर्थिक इतिहास को देखें तो समझ आता है कि किसी भी बड़े संकट की घड़ी में केवल सरकारी नीतियां पर्याप्त नहीं होतीं, वहां जन-भागीदारी की भी उतनी ही जरूरत पड़ती है। सरकार का तर्क यहां व्यावहारिक नजर आता है। भारत में सोना और कच्चा तेल दो ऐसी चीजें हैं, जो हमारे कीमती विदेशी मुद्रा यानी डॉलर को सबसे ज्यादा देश से बाहर भेजते हैं। अगर देश समाज एक साल के लिए सोने का मोह त्याग दे और तेल की खपत में थोड़ी भी कमी लाए, तो देश अरबों डॉलर बचा सकता है। यह बचत सीधे तौर पर रुपये को गिरने से रोकेगी। हमने अपने पड़ोसी श्रीलंका और पाकिस्तान को विदेशी मुद्रा की कमी के कारण सड़क पर आते देखा है। ऐसे में मोदी की ये अपीलें एक अर्ली वार्निंग सिस्टम की तरह हैं ताकि भारत को वैसी कंगाली का सामना न करना पड़े, लेकिन हकीकत के धरातल पर देखें तो यह स्थिति नीतिगत कमजोरी और असाधारण वैश्विक संकट का एक मिला-जुला रूप है। परंतु यह कहना कि भारत आर्थिक रूप से डूब रहा है, सरासर गलत होगा लेकिन यह कहना कि सब कुछ पूरी तरह नियंत्रण में है, वह भी सच्चाई से आंखें मूंदने जैसा होगा। सच तो यह है कि देश एक महंगे दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां वैश्विक समीकरण हमारे पक्ष में नहीं हैं। राहुल गांधी की यह आशंका सही है कि अर्थव्यवस्था इस समय भारी दबाव में है, और प्रधानमंत्री की ये अपीलें खुद इस बात की पुष्टि करती हैं कि आने वाले दिन मुश्किल भरे हो सकते हैं। संकट के समय राष्ट्र के तौर पर हाथ मिलाना और एकजुट होना जरूरी है, लेकिन इसके साथ ही सरकार को यह भी जवाब देना होगा कि आखिर कब तक भारत की अर्थव्यवस्था बाहरी दुनिया के रहमोकरम पर रहेगी। सरकार को यह समझना होगा कि जनता को संयम की सलाह देना एक बात है, लेकिन उसे ऐसी वास्तविक आत्मनिर्भरता देना जहां युद्ध की खबरों से किसी आम घर का बजट न बिगड़े, असल चुनौती वही है। दीर्घकालिक समाधान अपीलों में नहीं, बल्कि उन कड़े आर्थिक सुधारों में हैं जो भारत को ऊर्जा और निर्माण के क्षेत्र में वाकई अजेय बना सकें। तब तक के लिए, जनता के पास सावधानी बरतने के अलावा और कोई विकल्प फिलहाल नजर नहीं आता। (लेखक पत्रकार हैं ) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 13 मई /2026