नई दिल्ली,(ईएमएस)। ईरान युद्ध और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने दुनिया को फिर बड़े ऊर्जा संकट की ओर धकेल दिया है। तेल आपूर्ति मार्गों में बाधा आने से कई देशों में पेट्रोल, डीजल और गैस की उपलब्धता गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। इसके बाद फ्यूल राशनिंग यानी ईंधन पर कोटा सिस्टम लागू होने की आशंका बढ़ गई है, जहां सरकारें नागरिकों के लिए पेट्रोल-डीजल खरीदने की एक तय सीमा निर्धारित करती हैं। इसके तहत क्यूआर कोड, कूपन या ऑड-ईवन जैसे नियमों से सीमित ईंधन का समान वितरण सुनिश्चित होता है। दुनिया के कई देशों में यह व्यवस्था पहले ही लागू हो चुकी है। श्रीलंका में नेशनल फ्यूल पास सिस्टम के जरिए कारों के लिए साप्ताहिक 15-25 लीटर और बाइक के लिए 5 लीटर तक की सीमा तय है। पाकिस्तान में स्थिति और गंभीर है, जहां एक बार में सिर्फ पांच लीटर तक ईंधन देने की व्यवस्था है और सरकारी कर्मचारियों के लिए चार दिन कार्य सप्ताह भी लागू है। बांग्लादेश ने ऊर्जा बचाने के लिए स्कूलों को ऑनलाइन मोड में शिफ्ट किया है और बिजली कटौती बढ़ा दी है, वहीं म्यांमार में ऑड-ईवन नियम के तहत पेट्रोल वितरण हो रहा है। वहीं यूरोप के विकसित देश भी इस संकट से अछूते नहीं हैं। फ्रांस के कुछ इलाकों में क्यूआर कोड के आधार पर हफ्ते में 15-20 लीटर तक सीमित मात्रा में पेट्रोल मिल रहा है, जबकि जर्मनी में कुछ पेट्रोल पंपों पर एक बार में केवल 10 लीटर तक ही तेल दिया जा रहा है। स्लोवेनिया में निजी चालकों के लिए साप्ताहिक 50 लीटर का कोटा तय है, जबकि केन्या ने घरेलू आपूर्ति बचाने के लिए तेल के निर्यात पर ही प्रतिबंध लगा दिया है। भारत में अभी तक केंद्र सरकार की ओर से कोई आधिकारिक राशनिंग लागू नहीं हुई है। हालांकि, कई शहरों में पेट्रोल पंप संचालकों ने अपने स्तर पर बिक्री सीमित करनी शुरू कर दी है, जिससे बाइक चालकों को सीमित राशि तक और कार चालकों को पूरी टंकी भराने में परेशानी आ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय हालात और बिगड़ते हैं, तब भारत में भी क्यूआर कोड आधारित खरीद या सीमित ईंधन वितरण जैसी व्यवस्थाएं लागू की जा सकती हैं। फिलहाल, सरकार और विशेषज्ञ दोनों ही लोगों से ईंधन की बचत, सार्वजनिक परिवहन के उपयोग और गैरजरूरी यात्राओं से बचने की अपील कर रहे हैं। आशीष दुबे / 13 मई 2026