राष्ट्रीय
15-May-2026


नई दिल्ली (ईएमएस)। भारत में बढ़ते तेल संकट के बीच एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि क्या पेट्रोल और डीजल को वस्तु एवं सेवा कर के दायरे में शामिल किया जाना चाहिए। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और वैश्विक तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल देखा जा रहा है, जिसका सीधा असर भारतीय बाजार और आम नागरिकों की जेब पर पड़ रहा है। नई दिल्ली से सामने आए ताजा आंकड़ों के अनुसार फरवरी 2026 में भारतीय कच्चे तेल की औसत कीमत 69.01 डॉलर प्रति बैरल थी, जो 14 मई 2026 तक बढ़कर 108.36 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई। यानी सिर्फ 77 दिनों में कीमतों में करीब 57.02 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। भारत अपनी कुल जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने का सीधा असर घरेलू ईंधन बाजार पर पड़ रहा है। केंद्र सरकार ने 27 मार्च 2026 को राहत देते हुए पेट्रोल और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर उत्पाद शुल्क कम किया था, ताकि उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। लेकिन दूसरी ओर राज्य सरकारों ने मूल्य वर्धित कर में कोई खास कटौती नहीं की है। कई राज्यों में यह कर 30 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पेट्रोल और डीजल को वस्तु एवं सेवा कर के दायरे में लाया जाता है तो देशभर में ईंधन की कीमतों में एकरूपता आ सकती है और आम लोगों को राहत मिल सकती है। हालांकि राज्य सरकारों के लिए यह फैसला आसान नहीं है, क्योंकि इसी कर से उन्हें हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। ऐसे में सवाल अब भी कायम है—जनता को राहत या राजस्व की मजबूरी? सुबोध/१५-०५-२०२६