क्षेत्रीय
16-May-2026


(धार) भोजशाला विवाद में दावा- खंभों पर चूना पोता गया, नक्काशियां छिपाई गईं, ,एएसआई सर्वे में सामने आए सबूत धार (ईएमएस)। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर शुक्रवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए भोजशाला को सरस्वती मंदिर माना है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह स्थल हिंदू आस्था के अनुसार ज्ञान की देवी वाग्देवी यानी मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर है। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने उस पुराने आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को यहां जुमे की नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी। फैसले के बाद भोजशाला परिसर में हिंदू संगठनों और स्थानीय लोगों में खुशी का माहौल है। कई लोगों ने इसे “700 साल के संघर्ष की जीत” बताया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण सर्वे में सामने आए सबूत। इस मामले में ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ की ओर से अदालत में याचिका दाखिल की गई थी। याचिका में दावा किया गया था कि भोजशाला का निर्माण परमार वंश के राजा भोज ने 1034 ईस्वी में कराया था। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यह एक भव्य सरस्वती मंदिर था, जिसे 1305 में अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने क्षतिग्रस्त कर दिया था। लंबे समय से हिंदू पक्ष इस स्थान को मंदिर बताते हुए यहां नियमित पूजा-अर्चना की मांग करता रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, भोजशाला में स्थापित मां वाग्देवी की प्राचीन प्रतिमा आज भी लंदन के एक संग्रहालय में रखी हुई है। माना जाता है कि 11वीं शताब्दी में राजा भोज ने इस प्रतिमा की स्थापना करवाई थी। वर्ष 1875 में खुदाई के दौरान यह मूर्ति मिली थी, जिसके बाद 1880 में एक अंग्रेज अधिकारी इसे अपने साथ लंदन ले गया। अब हिंदू संगठनों की मांग है कि प्रतिमा को भारत वापस लाकर भोजशाला में पुनः स्थापित किया जाए। एक महिला श्रद्धालु ने कहा कि वे वर्षों से इस दिन का इंतजार कर रहे थे और अब जल्द ही मां सरस्वती की पुनः स्थापना होनी चाहिए। भोजशाला से जुड़े स्थानीय लोगों ने यह भी दावा किया कि 25-30 साल पहले तक यहां प्रतिदिन पूजा होती थी, जबकि मुस्लिम समुदाय बाहर नमाज पढ़ता था। उनका आरोप है कि बाद में धीरे-धीरे परिसर के भीतर नमाज की अनुमति दी गई और फिर कब्जे की स्थिति बन गई। कुछ लोगों ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की सरकार पर भी गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि उस दौर में भोजशाला के खंभों और शिलालेखों पर चूना पोत दिया गया था ताकि मंदिर से जुड़े साक्ष्य छिपाए जा सकें। स्थानीय निवासियों के मुताबिक, भोजशाला परिसर के कई खंभों पर बनी आकृतियों और मूर्तियों को सपाट करने की कोशिश की गई थी। लोगों ने दावा किया कि मशीनों के जरिए नक्काशियों को घिसा गया और उन पर चूना पोतकर उन्हें ढंक दिया गया। हालांकि, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किए गए सर्वे के दौरान कई आकृतियां और प्रतीक फिर से सामने आए। लोगों ने बताया कि केमिकल प्रक्रिया के जरिए चूना हटाने पर खंभों और दीवारों पर बनी नक्काशी स्पष्ट दिखाई देने लगी। स्थानीय लोगों ने परिसर में मौजूद कई प्रतीकों को मंदिर होने का प्रमाण बताया। उनका कहना है कि यहां खंभों पर घंटियां, शंख, गणेश प्रतिमा, राम दरबार और अन्य हिंदू धार्मिक आकृतियां बनी हुई हैं। एक व्यक्ति ने दावा किया कि एक स्तंभ पर पहले गणेशजी की प्रतिमा थी, जिसे बाद में खंडित कर दिया गया। लोगों का तर्क है कि मस्जिदों में इस प्रकार की मूर्तियां और नक्काशी नहीं होतीं, इसलिए यह स्थान मूल रूप से मंदिर ही था। भोजशाला परिसर में बने ‘गोमुख’ को भी हिंदू पक्ष महत्वपूर्ण साक्ष्य मान रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, गर्भगृह में मां सरस्वती का स्नान कराया जाता था और उसका जल गोमुख से होकर एक कूप में जाता था। दावा किया जाता है कि इस कूप का पानी बेहद मीठा है और उसे पीने से बुद्धि तेज होती है। एक व्यक्ति ने लोककथा का जिक्र करते हुए बताया कि मां सरस्वती ने राजा भोज को सपने में दर्शन देकर यहां कूप बनवाने को कहा था। इसी के बाद इस स्थान का धार्मिक महत्व और बढ़ गया। हाई कोर्ट के फैसले के बाद अब भोजशाला विवाद एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। हिंदू संगठनों ने फैसले का स्वागत किया है, जबकि मुस्लिम पक्ष की ओर से आगे कानूनी विकल्पों पर विचार किए जाने की संभावना जताई जा रही है। चन्द्रबली सिंह / 16/05/2026