लेख
18-May-2026
...


भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (फॉरेक्स) उछलकर $696.988 अरब (लगभग ₹58.5 लाख करोड़) के स्तर पर पहुंच गया है। हाल ही में, वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप और विदेशी मुद्रा की कमी के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आम जनता से ईंधन बचाने और सोना कम खरीदने की अपील की थी।प्रधानमंत्री की इस आर्थिक देशभक्ति वाली अपील के बाद से सोने के आयात और ईंधन की खपत में कमी दर्ज की गई, जिसने भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा (लगभग $37.8 अरब तक) बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 8 मई को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार में $6.295 अरब का शानदार उछाल आया।इस बढ़ोतरी के साथ देश का कुल विदेशी मुद्रा भंडार $696.988 अरब तक पहुंच गया है। आपको बता दें कि सरकार की सारी कोशिशें है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। सरकार को पता है कि मुसीबत सिर उठाए सामने खड़ी है लेकिन आम जनता का मनोबल और विश्वास भी बना रहे कि सरकार आपदा में ढाल बन कर खड़को है लेकिन जब बात हाथ से निकल रही है तो थोड़ा भार आम जनता को भी डालना मजबूरी है पैट्रोल डीजल के दाम में वृद्धि सोने पर आयात कर बढाना इसी दिशा में कदम है तमाम कोशिशें विदेशी मुद्रा भंडार को बढाने ताकि रूपये की अंतरराष्ट्रीय स्थिरता बने और महंगाई को नियंत्रित किया जा सके दरअसल यह केवल आंकड़ों का विषय नहीं होती, यह सीधे आम आदमी की रसोई, यात्रा, जेब और जीवन की चिंता से जुड़ी होती है। जब पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, रसोई गैस का बोश बढ़ता है, दूध के दाम चढ़ते हैं और रोजमर्रा की चीजों की कीमतें ऊपर जाने लगती हैं, तो इसका असर सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हर घर के बजट को हिला देता है। आज देश एक बार फिर ऐसे ही दौर से गुजरता दिखाई दे रहा है, जहां महंगाई की चौतरफा मार ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित किया है। भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति ज्यादा गंभीर है, क्योंकि हमारी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस, परिवहन, बिजली और उत्पादन लागत पर पड़ता है। जब ईंधन महंगा होता है, तो खेत से मंडी, मंडी से बाजार और बाजार से घर तक हर वस्तु की बुलाई महंगी हो जाती है। यही कारण है कि ईंधन की कीमतों में वृद्धि धीरे-धीरे पूरे बाजार में महंगाई का रूप ले लेती है। मई महीने के शुरुआती दिनों में ही महंगाई के कई संकेत सामने आ गए। कमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम में भारी बढ़ोतरी ने होटल, रेस्टोरेंट, छोटे दुकानदारों और खान-पान से जुड़े कारोबारियों की परेशानी बढ़ा दी है। 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर की कीमतों में करीब एक हजार रुपये तक का इजाफा छोटी दुकानों और मध्यम कारोबारियों के लिए बड़ा झटका है। इसका सीधा असर तैयार भोजन, मिठाई, चाय-नाश्ता और बाहर खाने की कीमतों पर दिख सकता है। भले ही भरेलू रसोई गैस के दाम फिलहाल स्थिर रखे गए हों, लेकिन कमर्शियल गैस की महंगाई आखिरकार आम ग्राहक तक पहुंचती ही है। दूध की कीमतों में बढ़ोतरी भी आम परिवारों के बजट को प्रभावित करने वाली है। दूध ऐसी वस्तु है, जिसका इस्तेमाल लगभग हर घर में होता है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, चाय से लेकर मिठाई तक, दूध का महत्व रोजमर्रा के जीवन में बहुत अधिक है। अमूल और मदर डेयरी जैसी बड़ी कंपनियों द्वारा प्रति लीटर कीमत में वृद्धि का असर शहरों से लेकर कस्बों तक महसूस किया जाएगा। दूध महंगा होने का मतलब केवल दूध का महंगा होना नहीं है, बल्कि दही, पनीर, मिठाई और अन्य डेयरी उत्पादों की कीमतों में भी वृद्धि की आशंका है। पेट्रोल और डीजल के दाम में वृद्धि सबसे व्यापक असर डालती है। पेट्रोल महंगा होने से निजी वाहन चलाने वालों पर बोझ बढ़ता है, जबकि डीजल महंगा होने से माल बुलाई, बस सेवा, कृषि कार्य और उद्योगों की लागत बढ़ती है। डीजल की कीमतें बढ़ने का असर किसानों पर भी पड़ता है, क्योंकि सिंचाई, ट्रैक्टर और कृषि परिवहन में इसका उपयोग होता है। जब किसान की लागत बढ़‌ती है, तो खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी दबाव बनता है। इस तरह ईंधन की महंगाई एक ऐसी श्रृंखला बनाती बनाती है, जिसका अंतिम बोझ उपभोक्ता पर ही आता है। सीएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी भी शहरों के लिए चिंता का विषय है। दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों में ऑटो, टैक्सी और सार्वजनिक परिवहन का बड़ा हिस्सा सीएनजी पर निर्भर है। सीएनजी महंगी होने से यात्रियों को अधिक किराया देना पड़ सकता है। रोजाना काम पर जाने वाले कर्मचारी, विद्यार्थी, छोटे व्यापारी और आम परिवार इससे सीधे प्रभावित होंगे। जिस सार्वजनिक परिवहन को आम आदमी की राहत माना जाता है, यदि वही महंगा हो जाए तो आम जीवन और कठिन हो जाता है। सोने और चांदी जैसी कीमती धातुओं पर आयात शुल्क बढ़ाने का फैसला विदेशी मुद्रा भंडार और चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करने की दृष्टि से समझा जा सकता है। भारत में सोना केवल आभूषण नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक परंपराओं से भी जुड़ा है। शादी-ब्याह और त्योहारों में सोने की खरीदारी आम बात है। लेकिन जब देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, तब गैर-जरूरी आयात कम करना भी आवश्यक हो जाता है। प्रधानमंत्री द्वारा सोने की खरीद टालने और ईंधन बचाने की अपील इसी आर्थिक चिंता को दर्शाती है। हालांकि, ऐसी अपील तभी सफल हो सकती है जब सरकार स्वयं भी खचों में संयम और नीति में स्पष्टता दिखाए। महंगाई का सबसे बड़ा असर मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग पर पड़ता है। घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई, दवा, राशन, बिजली, परिवहन और ईएमआई इन सबके बीच यदि दूध, गैस और ईंधन भी महंगे हो जाएं, तो बजट बिगड़ना स्वाभाविक है। कई परिवारों को गैर-जरूरी खर्च कम करने पड़ते हैं, बचत घटती है और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा कमजोर होती है। थोक महंगाई में वृद्धि एक गंभीर संकेत है। जब थोक स्तर पर कीमतें बढ़‌ती हैं, तो कुछ समय बाद खुदरा बाजार में भी उनका असर दिखने लगता है। यही कारण है कि थोक महंगाई को आने वाली खुदरा महंगाई की चेतावनी माना जाता है। भारतीय रिजर्व बैंक के सामने भी स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। यदि महंगाई नियंत्रण से बाहर जाती है, तो ब्याज दरों में वृद्धि की संभावना बनती है। व्याज दर बढ़ने का अर्थ है कि होम लोन, वाहन लोन और पर्सनल लोन की ईएमआई महंगी हो जाएगी। मध्यम वर्ग पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा है। ऐसे में ईएमआई बढ़ना उसके लिए दोहरी चोट साबित होगा। महंगाई और महंगे कर्ज का मेल अर्थव्यवस्था की मांग को भी कमजोर कर सकता है, क्योंकि लोग खर्च कम करने लगते हैं। सरकार के लिए यह समय केवल कीमतों को नियंत्रित करने का नहीं, बल्कि भरोसा बनाए रखने का भी है। आम लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि सरकार उनकी परेशानी समझ रही है और राहत देने के लिए ठोस कदम उठा रही है। ईंधन पर करों की समीक्षा, जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति व्यवस्था मजबूत करना, जमाखोरी पर कार्रवाई, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना और कमजोर वर्गों को लक्षित सहायता देना इस समय जरूरी है। केवल अपीलों से काम नहीं चलेगा, नीति और राहत दोनों की जरूरत है। इस दौर में नागरिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। ईंधन की बचत, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, अनावश्यक खरीदारी से बचना और घरेलू खचों में अनुशासन समय की मांग है। लेकिन यह भी सच है कि आम आदमी से त्याग की अपील तभी प्रभावी होती है जब व्यवस्था में बैटे लोग भी मितव्ययिता का उदाहरण प्रस्तुत करें। सरकार, उद्योग, व्यापारी और उपभोक्ता सभी को मिलकर इस कठिन समय का सामना करना होगा। महंगाई का यह दौर केवल आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक परीक्षा भी है। कीमतों की आग यदि बेलगाम हुई, तो इसका असर केवल बाजार पर नहीं, बल्कि आम परिवारों की मानसिक शांति और जीवन स्तर पर भी पड़ेगा। इसलिए जरूरी है कि सरकार समय रहते संतुलित कदम उठाए, बाजार पर निगरानी रखे और आम जनता को राहत देने की दिशा में ठोस पहल करे। महंगाई की मार से सबसे अधिक वही वर्ग प्रभावित होता है, जिसकी आवाज अक्सर सबसे धीमी होती है। अब समय है कि उसी आम आदमी की चिंता को आर्थिक नीति के केंद्र में रखा जाए।सरकार के सधे कदम बता रहे हैं कि उसे इसका गौर भी है और चिंता भी है इसलिये नतीजा भी अनुकूल होगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) ईएमएस / 18 मई 26