राष्ट्रीय
20-May-2026
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-चावल और अन्य खरीफ फसलों के उत्पादन पर पड़ सकता है असर नई दिल्ली,(ईएमएस)। महंगाई, गर्मी और मौसम की मार झेल रहे लोगों के सामने अब एक और बड़ा खतरा मंडराने लगा है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस साल अल-नीनो का असर भारतीय मानसून को कमजोर कर सकता है, जिससे चावल और अन्य खरीफ फसलों के उत्पादन पर असर पड़ सकता है। खासतौर पर यूपी, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में स्थिति चिंताजनक हो सकती हैं, जहां बड़ी आबादी का मुख्य भोजन चावल है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में सामने आया है कि अल-नीनो वाले सालों में देश के कई जिलों में खरीफ फसलों की पैदावार में भारी गिरावट आई थी। अध्ययन के मुताबिक पिछले अल-नीनो वर्षों के दौरान 77 जिलों में चावल का उत्पादन 10 फीसदी से ज्यादा घट गया था। वहीं मक्का उत्पादन भी 65 जिलों में गंभीर रूप से प्रभावित हुआ। इसके अलावा ज्वार और बाजरा जैसी फसलों की पैदावार में भी कई जिलों में 10 फीसदी से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई। शोधकर्ताओं के मुताबिक अल-नीनो की स्थिति तब बनती है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इसका सीधा असर भारतीय मानसून पर पड़ता है और बारिश कम होती है। मानसून कमजोर होने से खरीफ सीजन की खेती प्रभावित होती है, जिससे धान, मक्का और अन्य फसलों का उत्पादन घट जाता है। यह अध्ययन 2023 में प्रकाशित हुआ था, जिसमें 2002, 2004 और 2009 जैसे प्रमुख अल-नीनो वर्षों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया कि आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा के कई जिलों में धान की पैदावार में उल्लेखनीय कमी आई थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि इस साल भी अल-नीनो का प्रभाव रहा तो खरीफ फसलों के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। इसी बीच उत्तर भारत में भीषण गर्मी ने लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। दिल्ली और आसपास के इलाकों में तापमान 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है, जबकि आने वाले दिनों में इसके 45 डिग्री तक जाने की संभावना है। मौसम विभाग ने कई क्षेत्रों के लिए येलो अलर्ट जारी किया है। ऐसे हालात में यदि मानसून कमजोर रहता है तो खेती और जल संसाधनों दोनों पर दबाव बढ़ सकता है। आईसीएआर के कृषि भौतिकी विभाग से जुड़े वैज्ञानिकों का मानना है कि सरकार को अभी से तैयारी शुरू करनी होगी। सूखा सहन करने वाली फसल किस्मों को बढ़ावा देना, किसानों को मौसम आधारित सलाह उपलब्ध कराना, सिंचाई व्यवस्था मजबूत करना और जिला स्तर पर वैकल्पिक रणनीतियां तैयार करना बेहद जरूरी होगा। वैज्ञानिकों ने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण अल-नीनो जैसी घटनाएं अब ज्यादा देखने को मिल रही हैं, इसलिए पारंपरिक खेती पद्धतियों में बदलाव समय की मांग बन चुका है। किसानों की चिंता इस बात को लेकर भी है कि यदि समय पर पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो धान की बुवाई और उत्पादन दोनों प्रभावित होंगे। सिराज/ईएमएस 20 मई 2026