-जंग के बाद दुनिया का पहला देश जो ये जोखिम उठा रहा नई दिल्ली (ईएमएस)। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में पैदा हुई अस्थिरता ने वैश्विक तेल बाजार में भूचाल ला दिया है। कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, इससे भारत सहित दुनिया भर के देशों में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की आपूर्ति व दामों पर गहरा असर पड़ा है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने दुनिया भर के घरेलू बाजारों को प्रभावित कर दिया है, यहां तक कि अमेरिका में भी पेट्रोल-डीजल के दाम में 50 प्रतिशत तक की वृद्धि कर चुका है। भारत में भी ईंधन की कीमतें बढ़ी हैं और एलपीजी की आपूर्ति भी बुरी तरह से प्रभावित हुई है। इसी गंभीर संकट के बीच भारत ने एक बड़ा और साहसिक कदम उठाने का फैसला किया है। वह अपने तेल टैंकरों को होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते फारस की खाड़ी में भेजेगा, अमेरिकी और ईरानी धमकियों की परवाह नहीं करेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी कंपनी शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एससीआई) के टैंकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से फारस की खाड़ी में जाने के लिए तैयार खड़े हैं। उन्हें बस भारतीय नौसेना और देश की तेल रिफाइनरियों से अंतिम मंजूरी मिलने का इंतजार है। एक बेहद विश्वसनीय सूत्र के हवाले से इसकी जानकारी सामने आई है। ये टैंकर मध्य-पूर्व के प्रमुख तेल उत्पादक देशों से कच्चे तेल की खेप लाने के लिए निकलने वाले है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जंग भड़कने के बाद ऐसा पहली बार होगा कि कोई देश इस विवादास्पद समुद्री मार्ग का उपयोग करेगा। पूरी योजना को अंतिम रूप दिया जा चुका है और जैसे ही केंद्र सरकार की हरी झंडी मिलती है, भारतीय जहाज होर्मुज की ओर रवाना हो जाएंगे। हालांकि, जहाजों की संख्या और उनके रवाना होने के समय के बारे में अभी कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी गई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे व्यस्त तेल मार्गों में से एक है, जिससे वैश्विक तेल का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। पिछले करीब तीन महीनों से यह मार्ग बाधित है, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा गया है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस मार्ग पर अत्यधिक निर्भर है। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि भारत की इस योजना को अमेरिका या ईरान, या दोनों की ओर से मंजूरी मिली है या नहीं। चूंकि ये दोनों देश इस क्षेत्र में आमने-सामने हैं, इसलिए उनकी सहमति के बिना होर्मुज में प्रवेश करना खतरनाक साबित हो सकता है। हालांकि, हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में भारत के विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से मुलाकात की थी, जिससे कूटनीतिक हल निकालने के प्रयासों का संकेत मिलता है। भारत अपने पारंपरिक मध्य-पूर्वी आपूर्तिकर्ताओं से तेल आयात जारी रखना चाहता है, क्योंकि वैकल्पिक स्रोतों से तेल मंगाने में न केवल अधिक समय लगता है, बल्कि लंबी दूरी के कारण वह महंगा पड़ता है। इस बीच, भारतीय नौसेना ने इलाके में अपने युद्धपोतों की संख्या दोगुनी कर दी है, ताकि स्थिति पर पैनी नज़र रखी जा सके और भारतीय ध्वज वाले टैंकरों को सुरक्षा प्रदान की जा सके। हालांकि, इस पूरी योजना पर भारत के पोर्ट, शिपिंग और जलमार्ग मंत्रालय तथा भारतीय नौसेना ने कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है। आशीष दुबे / 20 मई 2026