वॉशिंगटन (ईएमएस)। क्या आप जानते है, ऐतिहासिक और अनमोल किताब गूटेनबर्ग बाइबिल को दुनिया की सबसे महंगी किताब माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार इस पुस्तक ने पूरी दुनिया में ज्ञान के प्रसार का तरीका बदल दिया और आधुनिक प्रिंटिंग युग की नींव रखी। यह किताब करीब वर्ष 1455 में जर्मनी के प्रसिद्ध मुद्रक योहानेस गूटेनबर्ग द्वारा छापी गई थी। यही वजह है कि आज इसे मानव इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण किताबों में गिना जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक एक पूरी गूटेनबर्ग बाइबिल की अनुमानित कीमत आज 25 मिलियन डॉलर से लेकर 150 मिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब 200 करोड़ रुपये से लेकर 1,250 करोड़ रुपये तक बैठती है। हालांकि इतनी बड़ी कीमत होने के बावजूद यह किताब बाजार में लगभग कभी बिकने के लिए उपलब्ध नहीं होती। इसकी ज्यादातर बची हुई प्रतियां दुनिया की प्रतिष्ठित लाइब्रेरी, संग्रहालयों और विश्वविद्यालयों में सुरक्षित रखी गई हैं। गूटेनबर्ग बाइबिल की सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती है कि यह पश्चिमी दुनिया की पहली बड़ी किताब थी, जिसे मूवेबल टाइप प्रिंटिंग तकनीक से छापा गया था। इससे पहले किताबें हाथ से लिखी जाती थीं, जिनमें बहुत समय और मेहनत लगती थी। योहानेस गूटेनबर्ग ने अपनी नई प्रिंटिंग तकनीक के जरिए किताबों को बड़े पैमाने पर छापना संभव बनाया, जिसने यूरोप में शिक्षा और ज्ञान के प्रसार को नई गति दी। इतिहासकारों के अनुसार इस किताब की कुल 180 प्रतियां छापी गई थीं, लेकिन समय के साथ इनमें से अधिकांश नष्ट हो गईं। आज दुनिया में केवल 49 प्रतियां ही पूरी या आंशिक रूप से बची हुई हैं। यही इसकी सबसे बड़ी दुर्लभता मानी जाती है। इस किताब का हर पृष्ठ बेहद खूबसूरती से तैयार किया गया था। इसमें हाथ से बनाई गई रंगीन सजावट, विशेष अक्षर और उच्च गुणवत्ता वाले कागज का इस्तेमाल किया गया था, जो इसे मध्यकालीन कला का शानदार नमूना बनाता है। आज इसके मूल्य का अनुमान 100 मिलियन डॉलर से भी अधिक लगाया जाता है। यही कारण है कि गूटेनबर्ग बाइबिल को दुनिया की सबसे अनमोल और ऐतिहासिक किताबों में शामिल किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि गूटेनबर्ग बाइबिल ने यूरोप में पुनर्जागरण और धार्मिक सुधार आंदोलनों को भी मजबूती दी। 1978 में इसकी एक पूरी प्रति लगभग 2.4 मिलियन डॉलर में बिकी थी, जो उस समय बहुत बड़ी रकम मानी गई थी। सुदामा/ईएमएस 22 मई 2026