लेख
23-May-2026
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भारत ने वर्ष 2047 तक “नशामुक्त भारत” का जो लक्ष्य तय किया है, वह केवल एक सरकारी अभियान नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करने का राष्ट्रीय संकल्प है। देश जब आजादी के 100 वर्ष पूरे करेगा, तब एक ऐसे भारत की कल्पना की जा रही है जो आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत होने के साथ-साथ नशे जैसी घातक बुराई से भी मुक्त हो। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत मादक पदार्थों के प्रति “जीरो टॉलरेंस” की नीति पर काम कर रहा है और अब लक्ष्य केवल ड्रग्स पकड़ना नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क को जड़ से समाप्त करना है। आज ड्रग्स का कारोबार केवल अपराध तक सीमित नहीं रह गया है। यह आतंकवाद, हथियारों की तस्करी, हवाला नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध से गहराई से जुड़ चुका है। यही कारण है कि भारत सरकार ने मादक पदार्थों के खिलाफ लड़ाई को राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे के रूप में देखना शुरू किया है। हाल ही में 182 करोड़ रुपये मूल्य की जिहादी कैप्टागन ड्रग्स की जब्ती ने सुरक्षा एजेंसियों को भी चौंका दिया। “ऑपरेशन रेजपिल” के तहत हुई यह कार्रवाई इस बात का संकेत है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट्स के निशाने पर है और विदेशी नेटवर्क देश को ट्रांजिट रूट तथा बाजार दोनों के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं। कैप्टागन एक एम्फेटामिन आधारित नशीला पदार्थ है, जिसे कई युद्धग्रस्त क्षेत्रों में आतंकी संगठनों द्वारा इस्तेमाल किए जाने के कारण “जिहादी ड्रग” कहा जाता है। माना जाता है कि इसका सेवन करने से व्यक्ति में आक्रामकता बढ़ती है, डर कम होता है और लंबे समय तक जागे रहने की क्षमता पैदा होती है। मध्य पूर्व के संघर्षों में सक्रिय कई आतंकी गुटों के लड़ाकों द्वारा इसका उपयोग किए जाने की खबरें पहले भी सामने आती रही हैं। भारत में इतनी बड़ी मात्रा में इसकी जब्ती ने यह संकेत दिया है कि ड्रग्स का यह खतरनाक नेटवर्क अब एशियाई देशों की ओर तेजी से फैल रहा है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि नशे का यह जाल युवाओं को निशाना बना रहा है। स्कूल, कॉलेज और महानगरों के साथ-साथ छोटे शहर भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने ड्रग्स तस्करों के लिए नए रास्ते खोल दिए हैं। अब नशे का कारोबार केवल सीमाओं पर नहीं होता, बल्कि ऑनलाइन नेटवर्क, डार्क वेब और डिजिटल भुगतान के माध्यम से भी संचालित हो रहा है। तस्कर युवाओं को पहले “फैशन”, “एडवेंचर” या “तनाव से राहत” के नाम पर नशे की ओर आकर्षित करते हैं और बाद में उन्हें इसकी लत में धकेल देते हैं। एक बार जब युवा इसकी गिरफ्त में आ जाता है, तब उसका शारीरिक, मानसिक और सामाजिक जीवन धीरे-धीरे बर्बाद होने लगता है। मादक पदार्थों का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह व्यक्ति से उसकी सोचने-समझने की क्षमता छीन लेता है। नशे की लत केवल शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि परिवारों को तोड़ देती है। कई युवा अपराध, हिंसा और अवसाद की ओर बढ़ जाते हैं। समाज में चोरी, लूट, हत्या और घरेलू हिंसा जैसी घटनाओं में भी वृद्धि होती है। यही कारण है कि गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि मादक पदार्थों की तस्करी केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। भारत की भौगोलिक स्थिति भी इस चुनौती को जटिल बनाती है। देश के आसपास ऐसे क्षेत्र मौजूद हैं जो अंतरराष्ट्रीय ड्रग उत्पादन और तस्करी के लिए कुख्यात रहे हैं। समुद्री रास्तों, सीमावर्ती इलाकों और हवाई मार्गों का उपयोग कर तस्कर भारत में प्रवेश करने की कोशिश करते हैं। कई बार ड्रग्स को वैध व्यापारिक सामान के भीतर छिपाकर भेजा जाता है। सुरक्षा एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वे इन नेटवर्कों की पहचान करें और उन्हें समय रहते नष्ट करें। इसी खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने बहुस्तरीय रणनीति तैयार की है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, सीमा सुरक्षा बल, तटरक्षक बल, राज्य पुलिस, खुफिया एजेंसियां और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संगठन मिलकर संयुक्त अभियान चला रहे हैं। “ऑपरेशन रेजपिल” जैसी कार्रवाई यह दिखाती है कि भारत अब केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि सक्रिय रणनीति अपनाने लगा है। विदेशों से खुफिया जानकारी जुटाने और उसका विश्लेषण करने वाली एजेंसियां अब ड्रग नेटवर्क की आर्थिक और डिजिटल गतिविधियों पर भी नजर रख रही हैं। सरकार की “जीरो टॉलरेंस” नीति का अर्थ है कि किसी भी स्तर पर नरमी नहीं बरती जाएगी। चाहे तस्कर कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। पिछले कुछ वर्षों में बड़ी मात्रा में ड्रग्स की जब्ती, संपत्तियों की कुर्की और अंतरराष्ट्रीय गिरोहों के खिलाफ कार्रवाई इस नीति की गंभीरता को दर्शाती है। लेकिन केवल सरकारी कार्रवाई से समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं है। समाज की भागीदारी भी उतनी ही आवश्यक है। नशामुक्त भारत का सपना तभी साकार होगा जब परिवार, स्कूल, धार्मिक संस्थाएं और सामाजिक संगठन मिलकर युवाओं को जागरूक करेंगे। बच्चों और किशोरों को यह समझाना जरूरी है कि नशा कोई आधुनिकता या स्टेटस सिंबल नहीं, बल्कि विनाश का रास्ता है। माता-पिता को अपने बच्चों के व्यवहार में होने वाले बदलावों पर ध्यान देना चाहिए। यदि कोई युवा अचानक चिड़चिड़ा हो जाए, पढ़ाई से दूरी बनाने लगे या संदिग्ध मित्र मंडली में शामिल हो जाए, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। शिक्षण संस्थानों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्कूलों और कॉलेजों में नियमित रूप से नशा विरोधी अभियान चलाए जाने चाहिए। खेल, योग, सांस्कृतिक गतिविधियां और सकारात्मक वातावरण युवाओं को गलत रास्ते से बचाने में मदद कर सकते हैं। समाज में सफल और प्रेरणादायक व्यक्तित्वों को भी आगे आकर युवाओं को जागरूक करना चाहिए। तकनीक का उपयोग भी इस लड़ाई में प्रभावी हथियार बन सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स और साइबर मॉनिटरिंग के माध्यम से ड्रग नेटवर्क की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। डिजिटल भुगतान और क्रिप्टोकरेंसी के जरिए होने वाले अवैध लेन-देन को ट्रैक करना भी जरूरी है। सरकार यदि आधुनिक तकनीक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को और मजबूत करती है, तो ड्रग्स तस्करी पर बड़ी चोट पहुंचाई जा सकती है। भारत आज जिस तेजी से वैश्विक शक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है, उसमें युवाओं की ऊर्जा सबसे बड़ी ताकत है। यदि यही युवा नशे की गिरफ्त में चले गए, तो देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति पर गंभीर असर पड़ेगा। इसलिए नशे के खिलाफ यह लड़ाई केवल कानून की लड़ाई नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की लड़ाई है। 2047 तक नशामुक्त भारत का लक्ष्य कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। इसके लिए सरकार की कठोर नीति, सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी तीनों का एक साथ चलना जरूरी है। “ऑपरेशन रेजपिल” जैसी सफलताएं यह विश्वास दिलाती हैं कि भारत अब ड्रग्स तस्करी के खिलाफ निर्णायक संघर्ष के लिए तैयार है। आवश्यकता इस बात की है कि हर नागरिक इस अभियान का सहभागी बने और युवाओं को नशे से बचाने के लिए आगे आए। यदि देश की युवा शक्ति सुरक्षित रहेगी, तभी भारत का भविष्य सुरक्षित रहेगा। नशामुक्त भारत केवल एक नारा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वस्थ, सुरक्षित और समृद्ध जीवन की आधारशिला है। (L 103 जलवन्त टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार -स्तम्भकार) ईएमएस / 17 मई 26