नई दिल्ली (ईएमएस)। कच्चे कपास की सभी किस्मों पर लागू 11 प्रतिशत आयात शुल्क को अस्थायी रूप से हटाने की तैयारियां जोर पकड़ रही हैं। सूत्रों के अनुसार सरकार 1 जुलाई से 31 अक्टूबर 2026 तक चार महीने की अवधि के लिए यह शुल्क हटाने पर विचार कर रही है, जिसका उद्देश्य वस्त्र उद्योग को तत्काल राहत प्रदान करना है। हालांकि, इस कदम के संभावित प्रभावों को लेकर सरकारी मंत्रालयों और हितधारकों के बीच मंथन जारी है, जहाँ टेक्सटाइल क्षेत्र राहत की उम्मीद कर रहा है, वहीं किसानों के हितों की रक्षा को लेकर चिंताएं भी उठाई जा रही हैं। वस्त्र उद्योग लंबे समय से इस शुल्क को हटाने की वकालत कर रहा है। उनका कहना है कि घरेलू कपास की कम पैदावार और पश्चिम एशिया संकट के कारण बढ़ी कीमतों के मद्देनजर यह कदम क्षेत्र को तत्काल राहत देगा और वैश्विक बाजारों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाएगा। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय जैसे नेताओं ने भी नौकरियों के नुकसान और घरेलू उद्योग की सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री से इसे रद्द करने का आग्रह किया है। उद्योग का मानना है कि मौजूदा शुल्क उत्पादन लागत बढ़ाता है और सिंथेटिक फाइबर की ओर अनावश्यक झुकाव पैदा करता है, क्योंकि उस पर शुल्क छूट मिलती है। वहीं सरकार के कुछ अधिकारियों और कपास व्यापार से जुड़े वर्गों का तर्क है कि सीमित समय के लिए शुल्क हटाने से किसानों पर कोई बड़ा नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। उनका यह भी कहना है कि निर्यातक एडवांस लाइसेंस स्कीम के तहत शून्य शुल्क पर आयात कर सकते हैं, इसलिए निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बाधित होने का तर्क निराधार है। इन वर्गों को पिछली बार शुल्क हटाने के अनुभव से डॉलर के बहिर्वाह (1.1-1.2 अरब डॉलर) और खरीफ बुवाई से ठीक पहले किसानों के हितों को नुकसान पहुंचने का डर है, खासकर उन किसानों के लिए जिन्होंने बेहतर कीमतों की उम्मीद में लगभग 40 लाख गांठें रोक रखी हैं। वर्तमान में, यह 11 फीसदी शुल्क 1 जनवरी 2026 से लागू है, जबकि लंबे रेशे वाले कपास पर अभी भी शून्य शुल्क है। सतीश मोरे/23मई ---