राज्य
25-May-2026


- सुरंग से निकलकर किया ‘पुनर्जन्म’ का प्रतीकात्मक संस्कार - सुरंग को माना जाता है मां के गर्भ का प्रतीक भुवनेश्वर (ईएमएस)। ओडिशा के मयूरभंज जिले से आदिवासी आस्था और परंपरा से जुड़ा एक अनूठा मामला सामने आया है। यहां एक परिवार ने दूसरे धर्म को छोड़कर अपने मूल सारना धर्म में वापसी की। इस दौरान ऐसी पारंपरिक रस्में निभाई गईं, जिसने पूरे क्षेत्र का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। यह मामला मयूरभंज जिले के खुंटा ब्लॉक स्थित डुंगुरुडीहि गांव का है। गांव निवासी लेम्बु हांसदा और उनका परिवार लंबे समय से विभिन्न परेशानियों और बीमारियों का सामना कर रहा था। परिवार का आरोप है कि इसी दौरान कुछ लोगों ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि धर्म परिवर्तन करने से उनकी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। इसके बाद उन्होंने अपना पारंपरिक सारना धर्म छोड़कर दूसरे धर्म को अपना लिया। हालांकि समय बीतने के बाद भी परिवार की समस्याएं कम नहीं हुईं। इसके बाद लेम्बु हांसदा ने अपने मूल धर्म में लौटने की इच्छा जताई। इस संबंध में गांव के बुजुर्गों और समुदाय के लोगों की बैठक बुलाई गई, जिसमें पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार धर्म वापसी की प्रक्रिया पूरी करने का निर्णय लिया गया। अनुष्ठान के तहत गांव के निकट एक खेत की मेड़ को काटकर विशेष सुरंग तैयार की गई। धार्मिक विधि-विधान और पारंपरिक पूजा-पाठ के बीच लेम्बु हांसदा समेत परिवार के पांच सदस्य एक-एक कर सुरंग के भीतर प्रवेश किए। कुछ समय बाद सभी सदस्य रोते हुए बाहर निकले। ग्रामीणों के अनुसार यह प्रक्रिया “पुनर्जन्म” का प्रतीक मानी जाती है। समुदाय के लोगों का कहना है कि सुरंग को मां के गर्भ का प्रतीक माना जाता है। जिस प्रकार शिशु जन्म के समय रोता है, उसी प्रकार सुरंग से बाहर निकलते समय रोना नए जीवन की शुरुआत और मूल धर्म में पुनः प्रवेश का संकेत माना जाता है। अनुष्ठान के दौरान प्रतीकात्मक रूप से “नाल काटने” की रस्म भी निभाई गई। इसके साथ ही नवजात शिशु के जन्म के बाद होने वाले इक्कीसवें दिन के संस्कार जैसी परंपराएं भी पूरी की गईं। सभी धार्मिक प्रक्रियाएं संपन्न होने के बाद परिवार की ओर से ग्रामीणों के लिए सामूहिक भोज का आयोजन किया गया तथा परंपरा के अनुसार हांडिया भी अर्पित किया गया। आदिवासी समाज के लोगों का मानना है कि यह परंपरा पुनर्जन्म और अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ाव का प्रतीक है। डुंगुरुडीहि गांव में संपन्न हुई यह अनोखी रस्म अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है। रामयश/ईएमएस 25 मई 2026