लोकतंत्र की खूबसूरती कहीं या सबसे बड़ी ताकत यही है कि यहां नागरिक केवल शासित नहीं होते, बल्कि व्यवस्था से जवाब मांगने का अधिकार भी रखते हैं। संविधान नागरिक को मतदान का अधिकार देने के साथ-साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थाओं से सवाल पूछने का अधिकार भी देता है। लेकिन जब किसी स्कूली छात्र की शिकायत का उत्तर तथ्यों से नहीं, बल्कि उसे “पाकिस्तानी” कहकर दिया जाने लगे, तब यह केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा हमला बन जाता है। हाल में 12वीं के छात्र वेदांत श्रीवास्तव से जुड़ा मामला इसी चिंताजनक प्रवृत्ति को उजागर करता है। वेदांत ने सीबीएसई परीक्षा परिणाम और री-इवैल्यूएशन प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी को लेकर सवाल उठाया था। छात्र और उसके परिवार का आरोप था कि बोर्ड द्वारा उपलब्ध कराई गई उत्तर पुस्तिका उसकी नहीं थी। यह शिकायत किसी राजनीतिक मुद्दे से जुड़ी नहीं थी, बल्कि एक छात्र के भविष्य और उसकी मेहनत के फल से संबंधित थी। लेकिन सोशल मीडिया पर मामला उठने के बाद कुछ लोगों ने इसे तथ्यों के आधार पर समझने के बजाय राष्ट्रवाद की बहस में बदल दिया। एक चर्चित टीवी एंकर द्वारा छात्र के सोशल मीडिया प्रोफाइल का स्क्रीनशॉट साझा करते हुए यह सवाल करना कि “क्या पाकिस्तानियों ने भी सीबीएसई की परीक्षा दी थी?” न केवल गैर-जिम्मेदाराना था, बल्कि यह उस मानसिकता का प्रतीक भी है जिसमें हर असहमति को राष्ट्रविरोध से जोड़ दिया जाता है। सबसे गंभीर बात यह है कि बाद में सीबीएसई ने अपनी गलती स्वीकार भी कर ली। छात्र से संपर्क कर उसे उसकी मूल उत्तर पुस्तिका उपलब्ध कराई गई और अंकों में सुधार का आश्वासन दिया गया। नई कॉपी मिलने के बाद उसके अंक बढ़कर 64 हो गए। लेकिन, अभी भी वे इससे खुश नहीं हैं। उन्होंने कहा कि कई प्रश्नों में उन्हें 0 अंक मिले हैं। बोर्ड ने यह भी माना कि इस प्रकार की गड़बड़ी दो मामलों में हुई थी। यानी जिस छात्र को सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया, उसकी शिकायत निराधार नहीं थी। सवाल यह है कि क्या अब उन लोगों की कोई जवाबदेही तय होगी जिन्होंने बिना तथ्य जाने उसकी देशभक्ति पर सवाल उठाए और उसकी भावनाओं को आहत किया? दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में भारतीय सार्वजनिक विमर्श में एक खतरनाक प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। जो व्यक्ति सरकार, प्रशासन या किसी संस्था पर सवाल उठाए, उसे तुरंत “देशविरोधी”, “टुकड़े-टुकड़े गैंग” या “पाकिस्तानी मानसिकता” वाला घोषित कर दिया जाता है। इससे लोकतंत्र संवाद और बहस की संस्कृति से हटकर भय और ध्रुवीकरण की दिशा में बढ़ने लगता है। लोकतंत्र में आलोचना दुश्मनी नहीं होती, बल्कि सुधार का माध्यम होती है। यदि नागरिक सवाल नहीं पूछेंगे तो संस्थाओं की जवाबदेही भी समाप्त हो जाएगी। शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और निष्पक्षता सबसे महत्वपूर्ण तत्व हैं। एक छात्र वर्षों की मेहनत के बाद परीक्षा देता है। ऐसे में यदि परिणाम में त्रुटि हो और वह उसके खिलाफ आवाज उठाए, तो उसे सम्मानपूर्वक सुना जाना चाहिए। संस्थाओं का दायित्व है कि वे शिकायतों का समाधान संवेदनशीलता और पारदर्शिता के साथ करें। लेकिन यदि शिकायत करने वाले को अपमानित किया जाएगा, तो यह युवाओं के मन में भय और अविश्वास पैदा करेगा। आने वाली पीढ़ियां फिर लोकतंत्र को अधिकारों की नहीं, बल्कि डर की व्यवस्था मानने लगेंगी। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है, क्या डरी और सहमी पीढ़ी राष्ट्रनिर्माण में सहायक साबित हो सकेगी या गुलाम मानसिकता को प्रश्रय देगी? राष्ट्रभक्ति का अर्थ यह नहीं है कि सरकार या संस्थाओं की हर गलती पर चुप्पी साध ली जाए। सच्चा राष्ट्रप्रेम वही है जिसमें नागरिक व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सवाल पूछे और संस्थाएं उन सवालों का जवाब देने के लिए जवाबदेह रहें। किसी छात्र की शिकायत को पाकिस्तान से जोड़ देना केवल अतिरंजना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति को नुकसान पहुंचाने वाली सोच है। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब सत्ता सवाल सुनती है और नागरिक निर्भय होकर अपनी बात कह सकते हैं। लेकिन जब सवाल पूछने वाले को ही दुश्मन की तरह देखा जाने लगे, तब यह समझना चाहिए कि समस्या नागरिक में नहीं, बल्कि व्यवस्था की मानसिकता में पैदा हो चुकी है। ईएमएस / 27 मई 26