विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया हालिया फैसला चुनाव आयोग के अधिकारों की पुष्टि करता है। इसके साथ ही इस फैसले से कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अदालत ने चुनाव आयोग की कार्रवाई को वैधानिक अधिकारों के दायरे में माना, परंतु सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाई गई उन आशंकाओं और दस्तावेजी आपत्तियों पर फैसला स्पष्ट नहीं है, जिनका सीधा संबंध करोड़ों मतदाताओं के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है। यही कारण है, यह विवाद समाप्त होने के बजाय और अधिक गहराने की आशंका पैदा होने लगी है। एसआईआर प्रक्रिया का मूल उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध और सही करना बताया गया था। लेकिन व्यवहार में अनेक ऐसे मामले सामने आए हैँ, जिनमें वैध दस्तावेज रखने वाले नागरिकों के नाम भी मतदाता सूची से हटा दिए गए हैँ। बीएलओ रिटर्निंग अधिकारी के अधिकार भी चुनाव आयोग ने स्वयं इस्तेमाल करना शुरू कर दिए हैं। मतदाता शुद्धिकरण के लिए केंद्रीय चुनाव आयोग के पोर्टल से बिना बीएलओ, बिना रिटर्निंग अधिकारी की जानकारी के बिना भौतिक सत्यापन के करोड़ों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से अलग कर दिए गए। जिनके नाम 2003 की मतदाता सूची में मौजूद थे। उनके माता-पिता के नाम भी 2003 की मतदाता सूची में थे। उन्हें भी विभिन्न तकनीकी कारणों के आधार पर सूची से बाहर कर दिया गया। इससे प्रश्न उठना स्वाभाविक है, वर्षों से मतदान कर रहे नागरिकों की वैधता पर अचानक संदेह कर उनका नाम कैसे मतदाता सूची से हटाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में जन्मस्थली नागरिकता और मतदाता सूची की स्थिरता और विश्वसनीयता का आधार क्या रहेगा? स्थिति की गंभीरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब तक लगभग 5.50 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने की बात सामने आ रही है। अकेले पश्चिम बंगाल में लगभग एक करोड नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं, जबकि करीब 28 लाख लोगों ने दस्तावेजों के साथ ट्रिब्यूनल में अपील कर रखी है। यह केवल चुनाव आयोग के अधिकारों से जुड़ा हुआ मामला नहीं है। एसआईआर की प्रक्रिया में जिन मतदाताओं के नाम काटे गए हैं उनके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ मामला भी है। इतनी बड़ी संख्या मतदाता सूची से नाम काटना प्रशासनिक त्रुटि का संकेत नहीं है। बल्कि यह संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े नागरिकों के अधिकार का प्रश्न है। एसआईआर की प्रक्रिया में यदि करोड़ों लोगों के संवैधानिक अधिकार खत्म हो रहे हैं। इस बारे में भी सुप्रीम कोर्ट का निर्णय स्पष्ट नहीं है। विधि विशेषज्ञों का कहना है सुप्रीम कोर्ट के आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया, जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनके अधिकारों की सुरक्षा किस प्रकार सुनिश्चित होगी। बिहार और पश्चिम बंगाल की राज्य सरकारों ने जिन लोगों के नाम मतदाता सूची में नहीं है उन्हें अभी तक जो सरकारी सुविधा मिल रही थी, वह बंद करने का निर्णय लिया है। इसमें जो मुसलमान मतदाता थे, उन्हें बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमान बताकर उनके लिए अलग से डिटेंशन सेंटर बनाकर रखने की बात की जा रही है। असम, पश्चिम बंगाल और बिहार की सरकार उन्हें अपना नागरिक मानने को तैयार नहीं है। इसको लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है जो धार्मिक धुव्रीकरण की ओर बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। चुनाव आयोग को लेकर कई गंभीर किस्म के आरोप लगाए जा रहे हैं। चुनाव आयोग की नियुक्ति कानून की सुनवाई भी सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। एसआईआर के जो नियम ज्ञानेश कुमार के चुनाव आयोग ने तैयार किये, हर राज्य में अलग-अलग तरह के नियम बनाए गए। इसको लेकर यह विवाद सुप्रीम कोर्ट में गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कई महीने तक प्रक्रिया को लेकर सुनवाई की, लेकिन इस संबंध में कोई भी स्पष्टता वाला आदेश नहीं आया है। यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटता है। उसके बाद उसे धार्मिक आधार पर संदेह की दृष्टि से भेदभाव किया जाता है, तो यह केवल चुनावी प्रक्रिया का विषय नहीं रह जाता। सामाजिक और संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न बन जाता है। लोकतंत्र केवल मतदान कराने की व्यवस्था नहीं है। नागरिकों के संवैधानिक अधिकार और लोकतंत्र के विश्वास पर टिका है। जब करोड़ों लोगों को अपने जन्म और अस्तित्व तथा नागरिक अधिकारों के लिए दस्तावेजों के होते हुए भी प्रमाण देने पड़ें। तब स्वाभाविक रूप से नागरिकों में असुरक्षा और असंतोष बढ़ना तय है। यही कारण है कि विभिन्न सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों द्वारा आशंका व्यक्त की जा रही है। आने वाले समय में यह मुद्दा एक बड़े आंदोलन और राजनीतिक टकराव का कारण बन सकता है। कानून व्यवस्था पर भी इसका प्रभाव पड़ने की आशंका व्यक्त की जाने लगी है। जिस तरह से देश में स्थितियां बदल रही हैं, ऐसे समय पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दूरगामी परिणाम देने वाला बन गया है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कानूनी दृष्टि से चुनाव आयोग की शक्तियों को मजबूत करता है। लोकतांत्रिक दृष्टि से इस फैसले में अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं। आवश्यकता इस बात की है, केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, न्यायपालिका मिलकर ऐसी पारदर्शी व्यवस्था विकसित करे, जिसमें किसी भी वैध नागरिक को तकनीकी कारणों से अपने मताधिकार और नागरिक अधिकारों से वंचित न होना पड़े। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है, कानून का पालन तभी तक संभव है जब तक लोगों को उस पर विश्वास हो। उस विश्वास को बनाए रखने की जिम्मेदारी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की है। सभी संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज से जनता के बीच में यह विश्वास पैदा होता है। तभी नागरिक कानून और नियमों का पालन करते हैं। यदि विश्वास खत्म हो जाता है। जो स्थिति अभी बनी है उसमें एक भीड खड़ी होती है। जो स्वयं न्याय करने लगती है। तब नियम कानून और शासन व्यवस्था का कोई महत्व नहीं रह जाता है। भीड़ में असाधारण शक्ति होती है। एसजे/ 27 मई /2026