लेख
27-May-2026
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दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी इलाकों से सामने आ रही तस्वीरें केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरी नहीं दिखातीं बल्कि यह हमारे सामाजिक ढांचे आर्थिक असमानता और जागरूकता की कमी का भी आईना हैं। बांसवाड़ा डूंगरपुर प्रतापगढ़ और उदयपुर जैसे जिलों में बड़ी संख्या में बच्चे कम वजन कमजोर शरीर और कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं के साथ जन्म ले रहे हैं। जन्म के तुरंत बाद नवजातों को अस्पतालों के गहन चिकित्सा वार्डों में भर्ती करना पड़ रहा है। कई बच्चों को जीवन के शुरुआती दिनों में ही बीमारी और कमजोरी से संघर्ष करना पड़ता है। यह स्थिति तब और अधिक चिंता पैदा करती है जब सरकार गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए मुफ्त राशन पोषण आहार और स्वास्थ्य योजनाओं पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। किसी भी समाज की असली ताकत उसके स्वस्थ बच्चे होते हैं। यदि नवजात जीवन की शुरुआत ही कमजोरी और बीमारी से करे तो इसका असर केवल उसके शरीर तक सीमित नहीं रहता बल्कि उसके मानसिक विकास शिक्षा और भविष्य की उत्पादकता पर भी पड़ता है। दक्षिणी राजस्थान के कई इलाकों में बच्चों में बौनेपन दुबलापन और कम वजन की समस्या राज्य औसत से कहीं अधिक है। इसका सीधा मतलब है कि आने वाली पीढ़ी का स्वास्थ्य खतरे में है। यह केवल चिकित्सा का विषय नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास का भी बड़ा सवाल है। कुपोषण की सबसे बड़ी वजह गरीबी और भोजन की गुणवत्ता है। आज भी कई परिवार ऐसे हैं जिनकी थाली में पेट भरने लायक भोजन तो है लेकिन शरीर को जरूरी पोषण देने वाला आहार नहीं है। केवल गेहूं चावल या मक्का खाने से शरीर को पूरा पोषण नहीं मिलता। शरीर को दाल दूध हरी सब्जियां फल अंडे और प्रोटीन की भी जरूरत होती है। गरीब परिवार अक्सर महंगे पौष्टिक खाद्य पदार्थ खरीद नहीं पाते और इसका सबसे ज्यादा असर गर्भवती महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है। जब मां खुद कमजोर और एनीमिक होगी तो बच्चा भी कमजोर पैदा होगा। गर्भवती महिलाओं में एनीमिया आज सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। खून की कमी के कारण मां का शरीर पर्याप्त पोषण बच्चे तक नहीं पहुंचा पाता। इसका परिणाम कम वजन वाले नवजात के रूप में सामने आता है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं नियमित स्वास्थ्य जांच नहीं करवातीं। कई महिलाएं गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त भोजन नहीं लेतीं क्योंकि परिवार में जागरूकता की कमी होती है। कई बार महिलाओं को सबसे आखिर में भोजन मिलता है जिससे उनके शरीर को जरूरी पोषण नहीं मिल पाता। यह सामाजिक सोच बदलना बेहद जरूरी है। कम उम्र में विवाह और जल्दी मातृत्व भी कुपोषण की बड़ी वजह है। जब किशोर उम्र की लड़की मां बनती है तब उसका खुद का शरीर पूरी तरह विकसित नहीं होता। ऐसे में वह स्वस्थ बच्चे को जन्म देने में कठिनाई महसूस करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कम उम्र में विवाह की परंपरा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इसके कारण मां और बच्चे दोनों का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। जरूरी है कि लड़कियों की शिक्षा को प्राथमिकता दी जाए और विवाह की सही उम्र को लेकर समाज में गंभीर जागरूकता लाई जाए। स्तनपान को लेकर भी कई भ्रम और जानकारी की कमी देखने को मिलती है। जन्म के तुरंत बाद मां का पहला दूध बच्चे के लिए अमृत माना जाता है लेकिन कई जगह आज भी इसे सही नहीं माना जाता। छह महीने तक केवल मां का दूध बच्चे को कई बीमारियों से बचाता है और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करता है। इसके बाद पूरक आहार भी सही समय पर शुरू होना जरूरी है। यदि बच्चे को शुरुआती वर्षों में सही पोषण नहीं मिलता तो उसका शारीरिक और मानसिक विकास हमेशा के लिए प्रभावित हो सकता है। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच भी बड़ी चुनौती है। दक्षिणी राजस्थान के कई गांव दूरदराज और पहाड़ी क्षेत्रों में बसे हैं जहां समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं पहुंच पाती। कई गर्भवती महिलाओं की जांच नियमित नहीं हो पाती। कई बार प्रसव घरों में हो जाते हैं और जटिल स्थिति होने पर अस्पताल पहुंचने में देर हो जाती है। इससे मां और बच्चे दोनों की जान खतरे में पड़ जाती है। सरकार को ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे को और मजबूत करना होगा। गांव स्तर पर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं आंगनबाड़ी और आशा सहयोगिनियों को आधुनिक प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराने होंगे। कुपोषण के खिलाफ लड़ाई केवल अस्पतालों में नहीं जीती जा सकती। इसके लिए समाज और परिवार दोनों को जिम्मेदारी उठानी होगी। सबसे पहले लोगों की सोच बदलनी होगी। यह समझना जरूरी है कि पौष्टिक भोजन कोई विलासिता नहीं बल्कि जीवन की बुनियादी जरूरत है। यदि परिवार मोबाइल टीवी और अन्य चीजों पर खर्च कर सकता है तो बच्चों और गर्भवती महिलाओं के भोजन पर भी प्राथमिकता देनी होगी। स्थानीय स्तर पर पौष्टिक भोजन की परंपराओं को बढ़ावा देना चाहिए। बाजरा मक्का दाल मूंगफली तिल गुड़ दूध और हरी सब्जियां सस्ते और पोषण से भरपूर विकल्प हो सकते हैं। स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों की भूमिका भी बेहद अहम है। बच्चों को मिड डे मील और पोषण आहार केवल औपचारिकता बनकर नहीं रहना चाहिए। भोजन की गुणवत्ता और नियमित निगरानी जरूरी है। गांवों में पोषण शिक्षा अभियान चलाने होंगे ताकि लोग समझ सकें कि संतुलित भोजन क्या होता है और बच्चों को किस उम्र में क्या खिलाना चाहिए। महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना भी कुपोषण कम करने का बड़ा उपाय है। जब महिलाओं के हाथ में आय होगी तो परिवार के भोजन और स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर दिखाई देगा। स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण रोजगार योजनाओं के जरिए महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना जरूरी है। सरकार की योजनाओं का सही क्रियान्वयन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कई बार योजनाएं कागजों में सफल दिखाई देती हैं लेकिन जमीनी स्तर पर लाभ लोगों तक पूरी तरह नहीं पहुंचता। नियमित निगरानी जवाबदेही और स्थानीय समुदाय की भागीदारी से ही हालात सुधर सकते हैं। पोषण अभियान को केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि जन आंदोलन बनाना होगा। आज सबसे बड़ी जरूरत यह समझने की है कि कुपोषण केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं बल्कि भविष्य की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती है। यदि बच्चे जन्म से ही कमजोर होंगे तो देश की आने वाली पीढ़ी भी कमजोर होगी। स्वस्थ मां और स्वस्थ बच्चा ही मजबूत समाज की नींव हैं। इसलिए हर परिवार हर गांव और हर संस्था को इस लड़ाई में अपनी भूमिका निभानी होगी। जब समाज जागरूक होगा महिलाएं पोषण को प्राथमिकता देंगी स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत होंगी और योजनाएं ईमानदारी से लागू होंगी तभी कुपोषण के खिलाफ यह निर्णायक जंग जीती जा सकेगी। (L 103 जलवन्त टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार-स्तम्भकार) ईएमएस / 27 मई 26