राष्ट्रीय
27-May-2026
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नई दिल्ली,(ईएमएस)। हाल ही में नई दिल्ली के भारत मंडपम में अमेरिकी स्वतंत्रता के 250वें स्थापना दिवस समारोह में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि भारत उन पर 100 प्रतिशत भरोसा कर सकता है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की भारत यात्रा को दोनों देशों के बीच पिछले एक साल में उपजे अविश्वास को कम करने की कूटनीतिक कोशिश बताया जा रहा है। इस दौरान अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी मंच से ट्रंप को फोन मिलाकर भारतीय आवाम को सीधे संदेश दिलवाया। ट्रंप के मीठे बोल सुनने में भले ही अच्छे लगें, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में उन्हें संदेह की नजर से देख रहे है। विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि ट्रंप का रवैया हमेशा विशुद्ध रूप से कारोबारी मुनाफे वाला रहा है और उनकी अमेरिका फर्स्ट नीतियां अक्सर भारत के रणनीतिक हितों से टकराती रही हैं। अमेरिका अब भारत को सिर्फ एक रणनीतिक साझेदार के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य के एक आर्थिक प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देख रहा है। इसी सोच के तहत 2025 के मध्य में ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50 प्रतिशत का भारी-भरकम टैरिफ थोप दिया था, जिसमें 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ और 25 प्रतिशत पेनल्टी भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने को लेकर लगी थी। हालांकि, फरवरी 2026 में एक अंतरिम व्यापार समझौते के तहत इन टैरिफ को घटाने पर बात बनी है, लेकिन यह अमेरिका के सख्त लेन-देन वाले रवैये को स्पष्ट रूप से दिखाता है। इतना ही नहीं, मई 2026 में ट्रंप प्रशासन ने एच1-बी वीजा नियमों और फीस में भारी सख्ती कर दी, जिससे अमेरिका में काम करने वाले हजारों भारतीय आईटी पेशेवरों को सीधा नुकसान हुआ। उसी महीने, ट्रंप का चीन दौरा और वहां हुआ कूटनीतिक समझौता भी भारत के लिए अलार्म था। यदि अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव कम होता है, तब उन भारतीय उद्योगों (विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स) को भारी झटका लग सकता है, जिन्होंने अमेरिकी टैरिफ के कारण चीन के विकल्प के रूप में अपनी जगह बनानी शुरू की थी। भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा सीधे तौर पर उसके पड़ोस से जुड़ी है, लेकिन यहां अमेरिका और नई दिल्ली के हितों में गहरा टकराव है। ट्रंप प्रशासन लगातार पाकिस्तान को रियायतें दे रहा है और अपनी मध्य-पूर्व की नीति के तहत कंगाल पाकिस्तान को अब्राहम समझौते में शामिल करने पर जोर दे रहा है। भारत के लिए यह स्वीकार्य नहीं है कि जो देश उसकी धरती पर आतंकवाद को बढ़ावा देता है, अमेरिका उस देश को अपनी सहूलियत के लिए कूटनीतिक रूप से मजबूत करे। इसी तरह, ट्रंप प्रशासन ने जो बाइडेन के दौर की उन नीतियों को काफी हद तक जारी रखा है, जिन्होंने बांग्लादेश में अस्थिरता को जन्म दिया। भारत के ठीक पड़ोस में अमेरिका की ऐसी नीतियां भारत की आंतरिक और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा पैदा करती हैं। भारत हमेशा से यह स्पष्ट करता आया है कि अपनी विशाल आबादी की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विविध स्रोतों और सस्ते रूसी तेल की जरूरत है। ट्रंप ने रूसी तेल खरीदने पर भारत की कड़ी आलोचना की थी और टैरिफ भी लगाए, हालांकि ईरान-इजरायल युद्ध के कारण पैदा हुए वैश्विक तेल संकट के चलते अमेरिका को हाल ही में भारत को रूसी तेल खरीदने की कुछ छूट देनी पड़ी है, लेकिन यह छूट भारत की जरूरत को समझकर नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सप्लाई की मजबूरी के कारण दी गई है। राजनीतिक टिप्पणीकार डॉ. आनंद रंगनाथन ने कहा कि ट्रंप पर भरोसा करना वैसा ही है जैसे किसी ब्लड डोनेशन कैंप में ड्रैकुला पर भरोसा करना। उन्होंने कहा कि हमें ट्रंप को दोस्त नहीं, बल्कि पूरी तरह से ट्रांसएक्शनल मानना चाहिए। माइकल कुगेलमैन जैसे अमेरिकी विशेषज्ञों ने भी स्वीकार किया कि दोनों देशों के बीच एक गहरा ट्रस्ट गैप बना हुआ है, जिसे केवल एक कूटनीतिक यात्रा से नहीं भरा जा सकता। आशीष/ईएमएस 27 मई 2026