भारत ब्रिक्स में भी अपनी ताकतवर मौजूदगी दिखा रहा नई दिल्ली,(ईएमएस)। भारत की विदेश नीति इन दिनों जटिल मल्टी-अलाइनमेंट का शानदार उदाहरण पेश कर रही है, जहां वह एक ओर क्वाड और दूसरी ओर ब्रिक्स जैसे प्रतिद्वंद्वी मंचों पर समान रूप से सक्रिय है। नई दिल्ली में हालिया क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक तब हुई जब पश्चिम एशिया में उथल-पुथल है और सबसे महत्वपूर्ण, भारत-चीन के बीच रिश्तों की बर्फ पिघल रही है। एक ओर क्वाड हिंद-प्रशांत में चीन की चुनौतियों का सामना करने पर केंद्रित है, वहीं ब्रिक्स चीन और रूस के साथ आर्थिक व राजनीतिक सहयोग का मंच है। भारत इन दोनों मंचों के बीच बढ़ती दूरी के बावजूद अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रख रहा है। हालिया घटनाक्रमों ने क्वाड की प्रासंगिकता पर सवाल उठा दिए हैं। अप्रैल 2026 में किर्गिस्तान में एससीओ रक्षा मंत्रियों की बैठक के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और चीनी रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जुन की मुलाकात गलवान के बाद तनाव कम करने की दिशा में बड़ा कदम थी। इसके अतिरिक्त, सितंबर 2026 में भारत की अध्यक्षता में नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का संभावित दौरा एक बड़ा रणनीतिक विकास माना जा रहा है, इस चीन ने भी समर्थन दिया है। हालांकि, वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर पूर्ण विश्वास-बहाली अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। क्वाड को शुरुआत में चीन की सैन्य-आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के खिलाफ एक अनौपचारिक सुरक्षा ढांचे के रूप में दिखाया गया था, लेकिन 2026 तक इसका चीन-विरोधी स्वरूप फीका पड़ता दिख रहा है। डोनाल्ड ट्रंप के संभावित दूसरे कार्यकाल की बदलाव वाली नीतियों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जैसे भारत पर टैरिफ, रूस से तेल खरीद पर दबाव, और पाकिस्तान के साथ सुधरते रिश्ते। ट्रंप ने पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व की सराहना की है, जबकि भारत के साथ व्यापार और सुरक्षा सहयोग में कुछ ठंडापन दिखाया है। इसके बाद भारत क्वाड को खुले तौर पर चीन-विरोधी मंच बनाने से बचना चाहता है, क्योंकि वह ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंचों पर भी सक्रिय है। भारत की मल्टी-अलाइनमेंट रणनीति उसकी स्वतंत्र विदेश नीति का प्रमाण है। उसने रूस से तेल खरीद बंद करने के अमेरिकी दबाव का भी विरोध किया। वह न पूरी तरह अमेरिका के गुट में जाना चाहता है और न ही चीन-रूस ब्लॉक में फंसना चाहता है। ब्रिक्स में चीन के साथ सहयोग से भारत को ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने, आर्थिक मौके हासिल करने और डॉलर-प्रभुत्व वाली विश्व व्यवस्था को चुनौती देने का मौका मिलता है, वहीं क्वाड भारत को हिंद-प्रशांत में समुद्री सुरक्षा, तकनीकी सहयोग और आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण का मंच प्रदान करता है। क्वाड का अस्तित्व बना रहेगा, लेकिन उसकी गति और महत्व कम हो सकता है, खासकर अगर ट्रंप प्रशासन अपनी अकड़ नहीं ढीली करता खासकर व्यापार, टैरिफ और पाकिस्तान नीति को लेकर। इसके बाद भारत ब्रिक्स को अधिक महत्व देगा। शी जिनपिंग का सितंबर में प्रस्तावित दिल्ली दौरा और ब्रिक्स में रूस-चीन-भारत का साथ एक बड़ा परीक्षण होगा। अगर दोनों देश एलएसी पर तनाव कम करते हैं, व्यापार बढ़ाते हैं और विश्वास बहाल करते हैं, तब क्वाड का रणनीतिक संतुलन बदल सकता है। भारत दोनों मंचों से अधिकतम लाभ उठाना चाहता है क्वाड से सुरक्षा और तकनीक, ब्रिक्स से आर्थिक और राजनीतिक लाभ। इस संतुलन को बनाए रखना आसान नहीं है। आशीष/ईएमएस 27 मई 2026