लेख
31-May-2026
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‘‘ विवादित निर्णयों की सूची में एक और ‘सुप्रीम’ फैसला? ’’ भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा कराए गए ‘‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’’ (SIR) अर्थात ‘‘विशेष गहन पुनरीक्षण’’ को लेकर देशभर में राजनैतिक और संवैधानिक बहस छिड़ी, तब सबकी निगाहें उच्चतम न्यायालय पर टिक गई, जहां मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत एवं जस्टिस बागची की पीठ ने 27 मई 2026 को निर्वाचन आयोग की इस प्रक्रिया को संवैधानिक एवं वैधानिक रूप से वैध ठहराया। 1 साल से SIR पर मचे घमासान को देखते हुए यह फैसला कई हलकों में ‘‘दूध का दूध पानी का पानी करने के बजाय ‘‘आग में घी डालने जैसा लगा। इलेक्ट्रोल बॉन्ड, महाराष्ट्र का सत्ता संग्राम, (फण्डवीस सरकार व शिवसेना का विभाजन) अनुच्छेद 370, (वैध) लेकिन उसे पूर्ण दर्जा अभी तक नहीं, ईडब्ल्यूएस आरक्षण, NJAC (जजों की नियुक्ति) ट्रिपल तलाक, समलैंगिक संबंध जैसे विवादित निणर्यो की फेहरिस्त में, अब SIR पर आया यह निर्णय भी जुड़ गया। अंतिम न्यायिक निर्णय द्वारा एक विवाद सुलझाने की कवायद कहीं यह विवादों की खेती न बन जाए, यह चिंता इस फैसले के बाद और गहरा गई है। निर्णय का मूल आधार : धारा 21(3) की व्याख्या उच्चतम न्यायालय ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) तथा संविधान के अनुच्छेद 324 का व्यापक अर्थ ग्रहण करते हुए निर्वाचन आयोग को विशेष गहन पुनरीक्षण कराने की शक्ति व कार्रवाई न्यायालय ने SIR को संवैधानिक रूप से पूर्णतः वैध माना है। न्यायालय ने कहां SIR शब्द नियम 25 से आता है। उसी की मिला-जुला रूप ‘सर’ है। इसलिए कानून से परे नहीं है। यद्यपि कई याचिकाकर्ताओं जैसे एक याचिकाकर्ता के वकील कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य अभिषेक मनु सिंघवी, वरिष्ठ पत्रकार सतीश के सिंह का यह कथन है कि हमारा जोर ‘‘प्रक्रिया पर था, वैधता पर नहीं। धारा 21(3) क्या कहती है । निर्वाचन आयोग किसी भी समय कारण दर्ज करते हुए किसी निर्वाचन क्षेत्र अथवा उसके किसी भाग की मतदाता सूची का ‘‘विशेष पुनरीक्षण’’ (special revision) ऐसे तरीके से कराने का निर्देश दे सकता है, जैसा वह उचित समझे। परंतु इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों के अधीन, किसी ऐसे निर्देश के जारी होने के समय लागू मतदाता सूची, विशेष पुनरीक्षण पूरा होने तक लागू बनी रहेगी। मतदाता सूची पुनरीक्षण / कितनी तरह से? लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 21 सहपठित नियम 25 एवं निर्वाचक पंजीकरण नियम 1960 के अधीन चुनाव आयोग 2025 के पूर्व तक, निम्न तरह से मतदाता सूची का पुनरीक्षण करता रहा। 1.सामान्य पुनरीक्षण, 2.संक्षिप्त पुनरीक्षण, 3.विशेष पुनरीक्षण, 4.गहन पुनरीक्षण, 5. आंशिक गहन एवं संक्षिप्त पुनरीक्षण। जैसी प्रक्रिया अपनाई जाती रही हैं। किंतु ‘‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’’ (SIR) शब्दावली का स्पष्ट उल्लेख धारा 21 के प्रावधान में कहीं नहीं मिलता है। चुनाव आयोग ने पहली बार बिहार में आम चुनाव के पूर्व मतदाता सूची बनाने के लिए SIR शब्द का प्रयोग किया। वस्तुतः SIR चुनाव आयोग द्वारा विकसित एक प्रशासनिक अवधारणा है, जिसे एक Legal Fiction बतलाया । जबकि न्यायालय ने इसे धारा 21(3) के अंतर्गत आने वाली व्यापक पुनरीक्षण शक्ति का हिस्सा मान लिया है। यही वह बिन्दु है, जहां विधि की शब्दिक व्याख्या और उद्देश्य पत्रक व्याख्या आमने सामने खड़ी दिखाई देती है। धारा 21(3) का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू धारा 21(3) का दूसरा भाग कहता है कि विशेष पुनरीक्षण पूरा होने तक पूर्ववर्ती मतदाता सूची प्रभावी बनी रहेगी। इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना प्रतीत होता है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया के दौरान मताधिकार का शून्यकाल (vacuum) उत्पन्न न हो। किन्तु व्यवहार में यदि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाएँ, उनकी अपीलें लंबित रहें अथवा मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया समय पर पूरी न हो, तब लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की निष्पक्षता को लेकर प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है। कानून का उद्देश्य केवल सूची को शुद्ध बनाना नहीं, बल्कि वैध मतदाता को मतदान से वंचित होने से बचाना भी है। निर्णय का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ! नागरिकता ? न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम निर्णय नहीं कर सकता है । किंतु मतदाता सूची में नाम बनाए रखने, जोड़ने अथवा हटाने के सीमित उद्देश्य से वह प्रारंभिक स्तर पर नागरिकता संबंधी संदेह की जांच कर सकता है। यदि अंतिम निर्णय का अधिकार नागरिकता अधिनियम, 1955 के अंतर्गत सक्षम प्राधिकारी के पास है, तो केवल संदेह के आधार पर समक्ष अधिकारी के आदेश के बिना मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया किस सीमा तक उचित मानी जाए? न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची से नाम हटाया जाना किसी व्यक्ति को गैर-नागरिक घोषित करने के समान नहीं माना जाएगा। यह तो वही बात हुई कि हम परीक्षा लेगें, पेपरों की जांच करके पास-फेल होने पर तदनुसार कार्रवाई करेंगे, लेकिन पास-फेल का प्रमाण पत्र जारी नहीं करेगें। ‘‘ सर की प्रक्रिया का परसेप्शन उतना ही निष्पक्ष दिखा? जितना न्यायालय को प्रतीत हुआ? उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में मतदाता सूची की शुद्धता, सटीकता और विश्वसनीयता को लोकतंत्र की आधारशिला बताया जो चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है। इस सिद्धांत से शायद ही कोई असहमत होगा। परन्तु न्याय का यह सिद्धांत है कि न केवल न्याय होना चाहिए बल्कि वह मिलते हुए दिखना भी चाहिए। यह सिद्धांत चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची बनाने के लिए बनाई गई प्रक्रिया पर भी लागू होता है, जिसमें न केवल चुनाव आयोग असफल होता हुआ साफ दिख रहा है, बल्कि पूरा चुनाव आयोग ही शंका व आलोचना के कटघरे में आ गया। हटाये गये मतदाता का लोकसभा चुनाव पर प्रभाव? विपक्ष द्वारा उठाए गए प्रश्नों का माकूल जवाब नहीं दिया, बल्कि बिना किसी कानूनी आधार के यह कहा गया कि शपथ पत्र दीजिए। डिलीटेड मतदाता सूची प्रकाशित नहीं की गई, जिसके निर्देश न्यायालय ने चुनाव आयोग को दिये। लगभग 68.66 लाख मतदाता मृत्यु, पलायन, पता नहीं व डुप्लीकेट नाम की वजह से हटाये गये लेकिन एक ही विदेशी/घुसपैठिया रिपोर्ट नहीं हुआ जिसका आधार बताकर ‘सर’ की कार्रवाई की गई थी। उच्चतम न्यायालय ने इस बात पर भी कोई ध्यान नहीं दिया कि 68.66 लाख 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदाता थे। मृतकों को छोड़कर सिर्फ बचे लगभग 39 लाख मतदाता ने 56.28 ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। क्या यह स्थिति बिहार के लोकसभा चुनाव के परिणाम पर प्रश्नवाचक चिन्ह नहीं लगाती है? कहीं दाल में कुछ तो काला नहीं? SIR समावेशी से बहिष्कारी । यदि बड़ी संख्या में नागरिकों को दस्तावेजी जटिलताओं, प्रशासनिक त्रुटियों अथवा लंबित अपीलों के कारण मतदान अधिकार से वंचित किया गया है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि शुद्धता और समावेशिता (Inclusiveness) के बीच संतुलन कहाँ स्थापित होगा। यदि शुद्धता की खोज में समावेशिता कमजोर पड़ जाए, तो लोकतंत्र की आत्मा आहत हो सकती है। चुनाव आयोग की पारंपरिक पुनरीक्षण प्रक्रिया का मूल भाव ‘‘समावेश’’ रहा है—अर्थात् पात्र नागरिक को सूची में जोड़ना। लेकिन SIR की प्रक्रिया में ‘‘अपवर्जन’’ (exclusion) का तत्व अपेक्षाकृत अधिक दिखाई दिया। वस्तुतः न्यायालय ने चुनाव आयोग के लगभग समस्त तर्को को निर्णय में समाहित कर सही ठहरा दिया, जो भी एक शंका का कारण बना। निष्कर्ष : सर का यह अध्याय अभी इति नहीं अथ है। (लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास) ईएमएस/31/05/2026