भिवंडी, (ईएमएस)। करीब 15 वर्षों तक चले एक चर्चित मामले में भिवंडी की एक अदालत ने एक डॉक्टर को फर्जी स्तन कैंसर (ब्रेस्ट कैंसर) रिपोर्ट तैयार करने के आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि आरोपी डॉक्टर ने महिला के ट्यूमर की पैथोलॉजिकल जांच की थी या आर्थिक लाभ के लिए फर्जी मेडिकल रिपोर्ट तैयार की थी। यह मामला वर्ष 2009 का है, जब देवकी पुजारी नामक महिला का एक ट्यूमर ऑपरेशन के जरिए निकाला गया था। इसके बाद जांच के लिए टिश्यू सैंपल भेजा गया। बाद में एक पैथोलॉजी रिपोर्ट सामने आई, जिसमें महिला को गंभीर स्तन कैंसर से पीड़ित बताया गया। इस रिपोर्ट के आधार पर महिला और उसका इलाज कर रहे डॉक्टरों ने माना कि वह कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही है। हालांकि कुछ महीनों बाद जब महिला को रेडिएशन थेरेपी के लिए मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल भेजा गया, तब वहां के डॉक्टरों को रिपोर्ट पर संदेह हुआ। अस्पताल में जांच के दौरान पता चला कि रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए केस नंबर और अन्य विवरण वास्तव में दो अन्य मरीजों से संबंधित थे। साथ ही अस्पताल के रिकॉर्ड में देवकी पुजारी के नाम से कोई वैध दस्तावेज मौजूद नहीं था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी डॉक्टर अरशद शेख, जो कल्याण स्थित मैक्सिम लैब के मालिक हैं, ने ट्यूमर की वास्तविक जांच किए बिना जांच शुल्क रख लिया और 12 सितंबर 2009 की एक फर्जी कैंसर रिपोर्ट तैयार कर दी। आरोप था कि उन्होंने टाटा मेमोरियल अस्पताल के लेटरहेड को स्कैन कर कंप्यूटर के जरिए नकली रिपोर्ट बनाई और उसमें अन्य मरीजों के डेटा का इस्तेमाल किया। पुलिस के अनुसार, वर्ष 2010 में अस्पताल के सतर्कता विभाग द्वारा पूछताछ किए जाने पर डॉक्टर ने कथित रूप से स्वीकार किया था कि रिपोर्ट कंप्यूटर पर तैयार की गई थी। इसके बाद भोईवाड़ा पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई और जांच शुरू हुई। मुकदमे के दौरान देवकी पुजारी के बेटे राजेश पुजारी ने गवाही दी। उन्होंने बताया कि उनकी मां का इलाज पहले पारिवारिक डॉक्टर द्वारा किया गया था, जिसके बाद उन्हें आगे के उपचार के लिए दूसरे अस्पताल भेजा गया। वहां ट्यूमर निकालकर जांच के लिए आरोपी की लैब में भेजा गया था। लेकिन जिरह के दौरान उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उन्होंने आरोपी डॉक्टर को पहले कभी नहीं देखा था और रिपोर्ट अस्पताल को किसी अन्य डॉक्टर द्वारा भेजी गई थी। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी पी. एस. शिंदे ने अपने 13 पृष्ठों के फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष ने मामले की महत्वपूर्ण कड़ियों को साबित नहीं किया। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर सवाल उठाया कि जिस डॉक्टर ने ट्यूमर निकाला था, उसका बयान जांच अधिकारी ने रिकॉर्ड ही नहीं किया। इससे यह संदेह पैदा होता है कि क्या वास्तव में महिला का ट्यूमर आरोपी की प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा गया था। अदालत ने पुलिस जांच में कई गंभीर खामियों की ओर भी ध्यान दिलाया। फैसले में कहा गया कि जिस महिला को कथित तौर पर कैंसर का डर दिखाया गया, उसका बयान तक दर्ज नहीं किया गया। इसके अलावा अस्पताल जांच के दौरान बरामद स्लाइड्स को डीएनए परीक्षण के लिए नहीं भेजा गया, जिससे यह साबित हो सकता था कि वे वास्तव में महिला के ट्यूमर से संबंधित थीं या नहीं। मजिस्ट्रेट ने यह भी कहा कि कथित जालसाजी और धोखाधड़ी को साबित करने के लिए आवश्यक डिजिटल साक्ष्य भी जुटाए नहीं गए। जांच अधिकारी ने उन कंप्यूटरों को जब्त नहीं किया, जिनका इस्तेमाल कथित रूप से अस्पताल के लेटरहेड और रिपोर्ट में हेरफेर करने के लिए किया गया था। इन सभी कमियों और पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में अदालत ने कहा कि आरोपी के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित नहीं हो सके। इसलिए न्यायालय ने आरोपी डॉक्टर अरशद शेख को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया। संतोष झा- ३१ मई/२०२६/ईएमएस