नई दिल्ली,(ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में साफ किया हैं कि वेश्यावृत्ति में संलग्न हर महिला को केवल मजबूर मानकर पुनर्वास केंद्र में भेज देना गलत है। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि कई महिलाएं स्वेच्छा से यौनकृमि का काम कर रही हैं, और यदि कोई वयस्क महिला अपनी मर्जी से ऐसा कर रही है, तब उसकी इच्छा जाने बिना पुनर्वास केंद्र में भर्ती करना गलत होगा। जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और आर. महादेवन की बेंच ने प्रज्वला बनाम भारत सरकार मामले में आवेदन का निपटारा कर यह महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया, जिसका उद्देश्य यौनकर्मियों के पुनर्वास की व्यवस्था को बेहतर बनाना था। सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा इम्मोरल ट्रैफिक प्रीवेंशन एक्ट, 1956 (आईटीपीए) की धारा 17 को अव्यावहारिक और पुरुषवादी सोच से ग्रस्त बताया। न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह कानून सभी सेक्स वर्कर महिलाओं को एक ही नजरिए से देखता है, बिना इस बात का भेद किए कि क्या उन्हें जबरन इस काम में धकेला गया है या वे अपनी इच्छा से इसमें हैं। यह प्रवृत्ति मजिस्ट्रेट के सामने ऐसी महिलाओं को पेश करते समय उनकी वास्तविक स्थिति की अनदेखी करती है। फैसले में कहा गया है कि यह पूरा विषय महिला के जीवन, स्वतंत्रता और भविष्य से जुड़ा है, और उसकी इच्छा की अनदेखी नहीं हो सकती। मजिस्ट्रेट को महिला से उसकी इच्छा के बारे में अनिवार्य रूप से जानकारी लेनी चाहिए। यदि कोई महिला स्वेच्छा से वेश्यावृत्ति कर रही है और जारी रखना चाहती है, तथा स्थायी संरक्षण या पुनर्वास केंद्र में दाखिल नहीं होना चाहती, तब उस महिला को जाने देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने साफ किया कि महिला से पूछताछ के दौरान मजिस्ट्रेट को अत्यधिक सावधानी बरतनी होगी। उन्हें इस बात से संतुष्ट होना चाहिए कि महिला जो भी कह रही है, वह अपनी मर्जी से कह रही है और उसके बयान के पीछे कोई दबाव या जोर-जबरदस्ती नहीं है। यदि मजिस्ट्रेट संतुष्ट होते हैं कि महिला अपनी इच्छा से वेश्यावृत्ति के काम में है और पुनर्वास नहीं चाहती, तब उस महिला को पुनर्वास केंद्र में नहीं भेजा जाना चाहिए। आशीष दुबे / 31 मई 2026