नई दिल्ली,(ईएमएस)। 5 मई 2024 को नीट-यूजी परीक्षा के दौरान पेपर लीक की खबर ने शिक्षा जगत में हड़कंप मचाया था। पटना को मुख्य केंद्र बताया गया, जहाँ सॉल्वर गैंग ने परीक्षा से एक रात पहले छात्रों को सवाल-जवाब रटवाए। राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) ने तब ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए एक फुल-प्रूफ सिस्टम और एक कमेटी बनाने का दावा किया था। लेकिन, हाल ही में 2026 में फिर से पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने की घटना ने उन दावों की पोल खोल दी है। 2024 के नीट पेपर लीक से जुड़े केस रिकॉर्ड, सीबीआई चार्जशीट और पटना हाईकोर्ट के आदेशों की छानबीन यह स्पष्ट करती है कि यह पुनरावृत्ति पहले से ही तय थी। 2024 के मामले में बिहार ईओडब्ल्यू और बाद में सीबीआई ने कुल 46 लोगों को गिरफ्तार किया। इसमें से 45 के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि 44 आरोपी फिलहाल जमानत पर बाहर हैं। मीडिया में मास्टरमाइंड बताए गए संजीव मुखिया के खिलाफ सीबीआई पर्याप्त सबूत नहीं जुटा पाई, जिसके कारण उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं हुई और उन्हें डिफ़ॉल्ट बेल मिल गई। केवल अमित प्रसाद महाराणा को ही जमानत नहीं मिली है, जबकि मामले का ट्रायल अभी शुरू भी नहीं हुआ है। विश्लेषण से पता चलता है कि आरोपियों के नाम भले ही बदलें, लेकिन पेपर लीक का मॉडल और कोचिंग नेटवर्क का तरीका वहीं रहा। 2024 की जांच में सामने आए कुछ आरोपी जमानत मिलने के बाद फिर से शिक्षा और काउंसलिंग के व्यवसाय में सक्रिय पाए गए। 2024 का लीक नेटवर्क पाँच महीने पहले से ही झारखंड के एक सेंटर से पेपर हासिल करने का भरोसा रखता था, जिसके लिए सॉल्वर गैंग तैयार किए गए, डमी उम्मीदवार खोजे गए और अग्रिम टिकट तक बुक किए गए थे। यह पैटर्न 2026 के मामले में भी दोहराया गया है। 2024 के पूरे घटनाक्रम और जमानत के त्वरित सिलसिले से स्पष्ट होता है कि 2026 के आरोपियों को भी ज्यादा समय तक जेल में रखना मुश्किल होगा। पेपर के रटकर लीक होने की स्थिति में आईपीसी की धारा 409 के तहत पेपर की रिकवरी साबित करना मुश्किल होता है, जिससे कोर्ट में आरोपियों को दोषी ठहराना और भी जटिल हो जाता है। इस तरह, कमजोर कानूनी प्रक्रिया और न्यायिक ढिलाई ने एक बार फिर पेपर लीक के चक्र को जारी रखने की अनुमति दे दी है। आशीष दुबे / 31 मई 2026