लेख
01-Jun-2026
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देश में हर साल लाखों लोग सड़क दुर्घटनाओं में घायल होते हैं और हजारों लोग समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण अपनी जान गंवा देते हैं। कई मामलों में हादसे के बाद घायल व्यक्ति लंबे समय तक सड़क पर तड़पता रहता है क्योंकि आसपास मौजूद लोग पुलिस पूछताछ या कानूनी झंझट के डर से मदद करने से बचते हैं। कई बार एम्बुलेंस देर से पहुंचती है और अस्पतालों में समुचित ट्रॉमा सुविधा उपलब्ध नहीं होती। ऐसी गंभीर स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब सख्त रुख अपनाया है और सभी राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों को ट्रॉमा केयर व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने साफ कहा है कि दुर्घटना में घायल व्यक्ति को तत्काल इलाज उपलब्ध कराना नागरिकों के मौलिक अधिकार से जुड़ा विषय है और इसे किसी भी हालत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिया गया यह फैसला देश की स्वास्थ्य और आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकता है। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक नागरिक को जीवन और गरिमा के साथ जीने का अधिकार मिला हुआ है और समय पर चिकित्सा सुविधा इस अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि दुर्घटना के बाद घायल व्यक्ति को तुरंत उपचार नहीं मिलता तो यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल नीति बनाने से काम नहीं चलेगा बल्कि जमीनी स्तर पर उसका प्रभावी क्रियान्वयन भी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि सड़क दुर्घटना के बाद शुरुआती समय जिसे गोल्डन ऑवर कहा जाता है सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान सही इलाज मिल जाए तो घायल व्यक्ति की जान बचाई जा सकती है। लेकिन देश के कई हिस्सों में दुर्घटना के बाद अस्पताल पहुंचने में काफी समय लग जाता है। कहीं एम्बुलेंस समय पर नहीं पहुंचती तो कहीं ट्रॉमा सेंटर दूर होने के कारण मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देता है। अदालत ने माना कि यह स्थिति बेहद चिंताजनक है और इसमें तत्काल सुधार की जरूरत है। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि अलग अलग इमरजेंसी नंबरों के बजाय पूरे देश में एकीकृत हेल्पलाइन नंबर 112 को प्रभावी रूप से लागू किया जाए। अभी कई जगह 100 101 102 108 1033 और 1091 जैसे अलग अलग नंबर मौजूद हैं जिससे लोगों में भ्रम की स्थिति बनी रहती है। अदालत का मानना है कि एक ही हेल्पलाइन नंबर होने से आपातकालीन सेवाओं तक पहुंच आसान होगी और मदद जल्दी मिल सकेगी। राज्यों को इसके लिए तीन महीने की समय सीमा दी गई है। अदालत ने केवल हेल्पलाइन व्यवस्था तक ही अपने निर्देश सीमित नहीं रखे बल्कि ट्रॉमा केयर के पूरे ढांचे को मजबूत बनाने पर जोर दिया है। कोर्ट ने कहा कि केवल नेशनल हाईवे पर ही नहीं बल्कि स्टेट हाईवे प्रमुख जिला सड़कों शहरी और अर्ध शहरी क्षेत्रों में भी ट्रॉमा सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए। इसके लिए अस्पतालों को पहले से चिह्नित किया जाए ताकि दुर्घटना के समय घायल व्यक्ति को तुरंत नजदीकी सक्षम अस्पताल पहुंचाया जा सके। इससे इलाज में देरी कम होगी और जान बचाने की संभावना बढ़ेगी। सुप्रीम कोर्ट ने मददगार लोगों की सुरक्षा को भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना है। अदालत ने कहा कि कई बार लोग घायल व्यक्ति की सहायता इसलिए नहीं करते क्योंकि उन्हें पुलिस की पूछताछ गवाह बनने या कानूनी परेशानियों का डर रहता है। इस डर के कारण कई लोग चाहकर भी मदद नहीं कर पाते। अदालत ने राज्यों को निर्देश दिया कि गुड समेरिटन यानी नेक मददगार कानूनों को प्रभावी तरीके से लागू किया जाए और ऐसा माहौल बनाया जाए जिसमें लोग बिना किसी भय के आगे आकर घायलों की मदद कर सकें। अदालत ने राज्य और जिला स्तर पर शिकायत निवारण तंत्र बनाने को भी कहा है ताकि यदि किसी मददगार को परेशान किया जाए तो उसकी शिकायत तुरंत सुनी जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की कई योजनाओं और नीतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि कागजों पर अच्छी व्यवस्था मौजूद है लेकिन राज्यों में उनका सही तरीके से पालन नहीं हो रहा। अदालत ने प्रधानमंत्री राहत योजना राह वीर योजना राष्ट्रीय एम्बुलेंस संहिता और इमरजेंसी रिस्पॉन्स सपोर्ट सिस्टम जैसी योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि इनके बावजूद जमीन पर स्थिति संतोषजनक नहीं है। कहीं एम्बुलेंस में जरूरी उपकरण नहीं हैं तो कहीं ट्रॉमा सेंटरों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। यही कारण है कि पूरे देश में एक समान और जवाबदेह व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है। अदालत ने एम्बुलेंस सेवाओं को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि सभी एम्बुलेंस में जीपीएस ट्रैकिंग रियल टाइम मॉनिटरिंग हेल्पलाइन 112 से सीधा जुड़ाव और आवश्यक चिकित्सा उपकरण अनिवार्य रूप से होने चाहिए। इसके साथ ही प्रतिक्रिया समय का नियमित ऑडिट किया जाए ताकि यह पता लगाया जा सके कि एम्बुलेंस कितनी तेजी से घटनास्थल तक पहुंच रही हैं। अदालत का मानना है कि तकनीक का बेहतर उपयोग करके आपातकालीन सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। ट्रॉमा रजिस्ट्रियों के निर्माण पर भी सुप्रीम कोर्ट ने विशेष ध्यान दिया है। अदालत ने स्वास्थ्य मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह ट्रॉमा मामलों के डेटा संग्रहण के लिए दिशा निर्देश जारी करे। इसके बाद सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अपनी ट्रॉमा रजिस्ट्रियां स्थापित करनी होंगी। इससे यह जानकारी उपलब्ध होगी कि किन क्षेत्रों में सबसे अधिक दुर्घटनाएं हो रही हैं और किन स्थानों पर ट्रॉमा सुविधाओं की कमी है। इस डेटा के आधार पर भविष्य की नीतियां अधिक प्रभावी बनाई जा सकेंगी। सुप्रीम कोर्ट ने दुर्घटना पीड़ितों के लिए नकद रहित उपचार व्यवस्था लागू करने पर भी जोर दिया है। अदालत ने कहा कि कई बार गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार अस्पताल का खर्च तुरंत नहीं उठा पाते जिससे इलाज में देरी होती है। इसलिए पीएम राहत जैसी नकद रहित उपचार योजनाओं को सभी राज्यों में लागू किया जाए ताकि दुर्घटना के बाद बिना पैसों की चिंता किए तुरंत इलाज शुरू हो सके। राज्यों को अस्पतालों और भुगतान प्रबंधन प्रणाली को भी तय करने का निर्देश दिया गया है। यह फैसला केवल कानूनी आदेश नहीं बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सड़क सुरक्षा केवल ट्रैफिक नियमों तक सीमित विषय नहीं है बल्कि दुर्घटना के बाद जीवन बचाने की जिम्मेदारी भी सरकारों की है। यदि समय पर एम्बुलेंस अस्पताल और प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मचारी उपलब्ध हों तो हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है। भारत जैसे विशाल देश में जहां हर दिन हजारों सड़क दुर्घटनाएं होती हैं वहां ट्रॉमा केयर व्यवस्था का मजबूत होना बेहद जरूरी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टों में भी यह बात सामने आ चुकी है कि दुर्घटना के बाद शुरुआती एक घंटे के भीतर इलाज मिलने पर मृत्यु दर में बड़ी कमी लाई जा सकती है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आम लोगों के जीवन की सुरक्षा की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। अब सबसे बड़ी चुनौती इन निर्देशों को जमीन पर लागू करने की होगी। राज्यों को स्वास्थ्य ढांचे में निवेश बढ़ाना होगा। ट्रॉमा सेंटरों की संख्या बढ़ानी होगी और एम्बुलेंस नेटवर्क को आधुनिक बनाना होगा। साथ ही लोगों में जागरूकता फैलानी होगी कि दुर्घटना पीड़ित की मदद करना सामाजिक जिम्मेदारी है और कानून उनकी सुरक्षा करता है। यदि सरकारें अदालत के निर्देशों का गंभीरता से पालन करती हैं तो आने वाले समय में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह संदेश देता है कि किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह संकट में फंसे व्यक्ति की कितनी जल्दी और संवेदनशीलता से मदद करता है। दुर्घटना में घायल व्यक्ति के लिए हर मिनट कीमती होता है और समय पर मिली सहायता ही उसके लिए सबसे बड़ी दवा बन सकती है। यही सोच अब देश की ट्रॉमा केयर व्यवस्था का आधार बनने जा रही है। (L 103 जलवन्त टाउनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 01 जून 26