01-Jun-2026
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- कान्हा बफर जोन में आवारा कुत्तों का होगा टीकाकरण - दो माह में 8 बाघों की मौत के बाद से मचा है हडक़ंप - कैनाइन डिस्टेंपर वायरस से हुई अधिकांश बाघों की मौत बालाघाट (ईएमएस).कान्हा नेशनल पार्क में बाघों की लगातार हो रही मौतों ने आखिरकार प्रशासन को कार्रवाई के लिए मजबूर कर दिया है। दो माह में 8 बाघों की मौत और संक्रमण के बढ़ते खतरे के बीच अब बफर जोन में आवारा कुत्तों के टीकाकरण का फैसला लिया गया है। कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले दो माह में 8 बाघों की मौत ने पूरे वन महकमे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इन मौतों के पीछे कुत्तों से फैलने वाला खतरनाक कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) प्रमुख वजह बनकर सामने आया है। अब देखना होगा कि प्रशासन की यह नई पहल जमीनी स्तर पर कितना असर दिखा पाती है, या फिर यह भी महज कागजी कार्रवाई बनकर रह जाएगी। कलेक्टर ने दिए टीकाकरण के निर्देश स्थिति गंभीर होने के बावजूद लंबे समय तक कोई ठोस रणनीति नजर नहीं आई, लेकिन अब जब हालात बेकाबू होते दिखे तो प्रशासन हरकत में आया है। कलेक्टर मृणाल मीना ने उपसंचालक पशु चिकित्सा सेवाओं को सख्त निर्देश देते हुए कहा है कि कान्हा के बफर जोन में आवारा कुत्तों का टीकाकरण अभियान प्राथमिकता से और तय समय सीमा में पूरा किया जाए। सरही और किसली रेंज सहित कई इलाकों में बाघों के शव मिलने से हालात की भयावहता साफ झलक रही है। हाल ही में मृत बाघ ‘महावीर’ की मौत भी इसी संक्रमण से जुड़ी बताई जा रही है। इसके बावजूद पहले कोई ठोस कदम न उठाया जाना कई सवाल खड़े कर रहा है। प्रदेश में पांच माह में 33 बाघों की हो चुकी है मौत प्रदेश स्तर पर भी तस्वीर चिंताजनक है। मध्यप्रदेश में बीते पांच माह में 33 बाघों की मौत हो चुकी है। इनमें कई मौतें शिकार से जुड़ी घटनाओं के कारण हुईं, तो कई प्राकृतिक कारणों से। खासतौर पर बिजली के करंट से हो रही मौतें वन्यजीव सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल रही हैं। पिछली बाघ गणना के अनुसार प्रदेश में 785 बाघ हैं, जिनमें से 35 प्रतिशत संरक्षित क्षेत्रों से बाहर हैं। ऐसे में संक्रमण और शिकार दोनों ही खतरे बाघों के अस्तित्व पर गंभीर संकट बनते जा रहे हैं।