क्षेत्रीय
02-Jun-2026
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- करोड़ों की जमीन के नामांतरण पर उठे सवाल - हक त्याग प्रक्रिया, साझेदारी फर्म और संभावित राजस्व शुल्क को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म सारंगपुर (ईएमएस) । शहर की करोड़ों रुपये मूल्य की 1.618 हेक्टेयर भूमि के नामांतरण को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। आकोदिया रोड स्थित बालाजी इंडस्ट्रीज ( पुरानी शुगर मिल ) की भूमि से जुड़े इस मामले में तहसीलदार न्यायालय द्वारा साक्ष्यों के अभाव में निरस्त किए गए नामांतरण प्रकरण को एसडीएम न्यायालय ने अपील में पलटते हुए नामांतरण के आदेश पारित कर दिए हैं। इसके बाद पूरे मामले में हक त्याग प्रक्रिया, साझेदारी फर्म की संपत्ति के स्वामित्व हस्तांतरण तथा संभावित राजस्व शुल्क को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। विवादित भूमि आकोदिया रोड पर रानी रूपमती के ऐतिहासिक मकबरे, आवासीय क्षेत्र और एबी रोड नेशनल हाईवे के निकट स्थित है। क्षेत्र में भूमि के बढ़ते बाजार मूल्य को देखते हुए इसकी कीमत करोड़ों रुपये आंकी जा रही है। स्थानीय जानकारों के अनुसार रोड साइड भूमि के दाम करीब एक करोड़ रुपये प्रति बीघा तक बताए जा रहे हैं। पहले तहसीलदार न्यायालय ने किया था निरस्त जानकारी के अनुसार मामला सर्वे नंबर 2119/2, 2120/3, 300 एवं 2124/2/3 की कुल 1.618 हेक्टेयर भूमि से संबंधित है। राजस्व अभिलेखों में यह भूमि बालाजी इंडस्ट्रीज साझेदारी फर्म के नाम दर्ज रही है। इस मामले में सुरेशचंद्र मंगल द्वारा तहसीलदार न्यायालय में नामांतरण का दावा प्रस्तुत किया गया था। प्रकरण क्रमांक 0379/अ-6/2024-25 में तत्कालीन तहसीलदार ने उपलब्ध साक्ष्यों और दस्तावेजों के परीक्षण के बाद साक्ष्यों के अभाव का हवाला देते हुए नामांतरण का दावा निरस्त कर दिया था। अपील में एसडीएम न्यायालय ने बदला फैसला तहसीलदार न्यायालय के आदेश के विरुद्ध एसडीएम न्यायालय सारंगपुर में अपील दायर की गई। प्रकरण क्रमांक 0092/अपील/2024-25 में एसडीएम न्यायालय ने तहसीलदार का आदेश निरस्त करते हुए रामनिवास मंगल के नाम नामांतरण दर्ज करने के आदेश पारित किए। एसडीएम न्यायालय के आदेश में साझेदारी फर्म के गठन और विघटन, पुराने अभिलेखों तथा राजस्व रिकॉर्ड का उल्लेख किया गया है। आदेश के अनुसार वर्ष 1979 से साझेदारी फर्म को विघटित माना गया तथा फर्म की संपत्ति का स्वामित्व बाद में रामनिवास मंगल के हिस्से में आने का आधार स्वीकार किया गया। अब उठ रहे हैं कई अहम सवाल एसडीएम न्यायालय के फैसले के बाद पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है। स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहे हैं कि जिस प्रकरण को तहसीलदार न्यायालय ने साक्ष्यों के अभाव में निरस्त किया था, उसी मामले में अपीलीय न्यायालय ने किन दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर नामांतरण स्वीकार किया। इसके अलावा यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि नामांतरण आदेश जिस व्यक्ति के पक्ष में पारित हुआ, उसके संबंध में प्रस्तुत दस्तावेजों और स्वामित्व दावे की वैधानिक प्रक्रिया पूरी तरह स्पष्ट है या नहीं। हिस्सेदारी परिवर्तन में सहमति और प्रक्रिया महत्वपूर्ण राजस्व मामलों के जानकारों का कहना है कि यदि किसी खाते में एक से अधिक खातेदार दर्ज हों तो हिस्सेदारी परिवर्तन अथवा नामांतरण की प्रक्रिया में सभी संबंधित पक्षों की दस्तावेजी सहमति, अधिकार त्याग संबंधी अभिलेख तथा अन्य राजस्व औपचारिकताएं महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। ऐसे मामलों में यह भी देखा जाता है कि स्वामित्व परिवर्तन किन आधारों पर किया गया तथा राजस्व अभिलेखों में परिवर्तन के लिए आवश्यक प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं। हक त्याग की रजिस्ट्री को लेकर भी चर्चा सारंगपुर न्यायालय के अधिवक्ता एवं कानूनी जानकार दिलीप जाधव के अनुसार यदि किसी खाते में एक से अधिक खातेदार दर्ज हों और सम्पूर्ण स्वामित्व किसी एक व्यक्ति के नाम दर्ज किया जाना हो, तो सामान्यतः हक त्याग की रजिस्ट्री अथवा सक्षम न्यायालय की डिग्री आवश्यक मानी जाती है। उन्होंने बताया कि साझेदारी फर्म की भूमि यदि किसी एक व्यक्ति के नाम हस्तांतरित की जाती है और हक त्याग संबंधी रजिस्ट्री नहीं कराई जाती, तो ऐसी स्थिति में प्रकरण की प्रकृति सिविल विवाद की श्रेणी में भी आ सकती है तथा सिविल न्यायालय की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। करोड़ों की जमीन पर सबकी नजर शहर के प्रमुख क्षेत्र में स्थित इस बेशकीमती भूखंड के नामांतरण के बाद अब राजस्व और कानूनी प्रक्रिया को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। मामले में आगे कोई पक्ष उच्च स्तर पर अपील करता है या नहीं, इस पर भी सभी की नजर बनी हुई है। यह न्यायिक प्रक्रिया है। अपील का प्रावधान है। यह न्यायिक प्रक्रिया है। अपील का प्रावधान है। यदि कोई पक्ष असंतुष्ट है तो वह नियमानुसार अपील कर सकता है। — डॉ. गिरीश कुमार मिश्रा, कलेक्टर, राजगढ़ - 02 जून 26