लेख
03-Jun-2026
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भारत में परीक्षा अब केवल योग्यता का आकलन नहीं रह गई है बल्कि यह करोड़ों सपनों की निर्णायक कसौटी बन चुकी है लेकिन जब यही कसौटी बार-बार संदिग्ध हो जाए, जब मेहनत और ईमानदारी की जगह ‘जुगाड़’ और ‘माफिया नेटवर्क’ हावी हो जाएं, तब यह केवल परीक्षा का संकट नहीं बल्कि राष्ट्र के भविष्य का संकट बन जाता है। पेपर लीक के चलते नीट-यूजी 2026 परीक्षा का रद्द होना, सीबीएसई की ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली पर उठे गंभीर सवाल और एसएससी जीडी परीक्षा में धांधली, ये घटनाएं मिलकर यह साबित करती हैं कि भारत की परीक्षा प्रणाली अब गहरे संस्थागत संकट में फंस चुकी है और भारत की परीक्षा प्रणाली अब वेंटिलेटर पर है। नीट-यूजी 2026 का घटनाक्रम तो इस विफलता की सबसे भयावह तस्वीर पेश करता है। लगभग 22.79 लाख छात्रों की मेहनत, उनके परिवारों के त्याग और वर्षों की तैयारी एक झटके में शून्य हो गई। यह केवल एक परीक्षा का रद्द होना नहीं था बल्कि उस विश्वास का टूटना था, जिस पर पूरी शिक्षा व्यवस्था टिकी हुई है। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि इस बार मामला केवल बाहरी गिरोहों तक सीमित नहीं रहा बल्कि जांच में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) के भीतर तक मिलीभगत के आरोप सामने आए। सीबीआई की जांच और संसदीय समिति की पूछताछ में यह संकेत मिले हैं कि प्रश्नपत्र तैयार करने और परीक्षा प्रबंधन से जुड़े कुछ अधिकारियों ने मोटी रकम लेकर चुनिंदा छात्रों तक प्रश्नपत्र पहुंचाने का काम किया। यदि ये आरोप सही हैं तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं बल्कि संस्थागत विश्वासघात है। जिस संस्था को निष्पक्षता की गारंटी देनी थी, वही यदि धांधली का हिस्सा बन जाए तो पूरी व्यवस्था का नैतिक आधार ही खत्म हो जाता है। नीट पेपर लीक की प्रकृति भी सामान्य नहीं थी। ‘गेस पेपर’ के नाम पर लगभग 150 से अधिक प्रश्नों का हूबहू मिल जाना, परीक्षा से पहले 600 अंकों तक के सवालों का प्रसार, व्हाट्सएप और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर खुलेआम प्रश्नपत्र का घूमना, ये सब किसी संयोग का परिणाम नहीं हो सकते। यह एक संगठित, बहुस्तरीय और तकनीकी रूप से सक्षम नेटवर्क का संकेत है, जो परीक्षा प्रणाली की हर कमजोर कड़ी को भेद चुका है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2024 में पेपर लीक के बाद भी कोई ठोस सुधार क्यों नहीं हुआ? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों, जांच समितियों और सिफारिशों के बावजूद 2026 में स्थिति और बदतर कैसे हो गई? इसका सीधा अर्थ है कि समस्या तकनीकी कम और इच्छाशक्ति की अधिक है। भारत की परीक्षा प्रणाली का ढ़ांचा ही कई स्तरों पर कमजोर है। प्रश्नपत्रों की छपाई से लेकर वितरण तक की प्रक्रिया में निजी एजेंसियों और आउटसोर्स कर्मचारियों की बड़ी भूमिका रहती है। यही वह जगह है, जहां से माफिया नेटवर्क अपनी जड़ें जमाता है। जब प्रश्नपत्र परीक्षा केंद्र तक पहुंचने से पहले ही स्कैन होकर डिजिटल रूप में फैल सकता है तो यह स्पष्ट संकेत है कि सुरक्षा तंत्र केवल कागजों पर मजबूत है, जमीन पर नहीं। दूसरी ओर, कोचिंग उद्योग का अनियंत्रित विस्तार इस संकट को और गहरा कर रहा है। मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाएं अब हजारों करोड़ रुपये का बाजार बन चुकी हैं। इस बाजार में ‘सफलता’ एक उत्पाद है, जिसे खरीदने के लिए छात्र और अभिभावक किसी भी हद तक जाने को मजबूर हैं। इसी मानसिकता का फायदा उठाकर एजुकेशन माफिया ‘सीक्रेट पेपर’, ‘100 प्रतिशत सलेक्शन गारंटी’ और ‘इनसाइडर एक्सेस’ जैसे झूठे वादों के जरिए पूरे सिस्टम को खोखला कर रहा है। यदि नीट प्रकरण परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा पर सवाल खड़ा करता है तो सीबीएसई का ओएसएम विवाद मूल्यांकन प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर चोट करता है। डिजिटल मूल्यांकन को पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने के उद्देश्य से लागू किया गया था लेकिन इसके परिणाम उलटे दिखाई दिए। पास प्रतिशत में गिरावट, मेधावी छात्रों को अपेक्षा से कम अंक मिलना और स्कैन की गई कॉपियों में भारी गड़बड़ियां, ये सब इस बात के संकेत हैं कि तकनीक को बिना पर्याप्त तैयारी और परीक्षण के लागू किया गया। कई छात्रों ने शिकायत की कि उनकी कॉपियां धुंधली थी, कुछ को गलत उत्तर पुस्तिकाएं मिली और कुछ मामलों में तो पूरी कॉपी ही किसी और की थी। यह स्थिति केवल तकनीकी त्रुटि नहीं मानी जा सकती बल्कि यह सरासर गंभीर प्रशासनिक लापरवाही है। यदि एक छात्र की मेहनत को किसी दूसरे की कॉपी से बदल दिया जाए तो यह केवल गलती नहीं है बल्कि उस छात्र के भविष्य के साथ सीधा खिलवाड़ है। शिक्षा मंत्रालय और बोर्ड भले ही इन खामियों को सीमित मामलों तक बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश करें लेकिन छात्रों में बढ़ता असंतोष इस बात का प्रमाण है कि समस्या व्यापक है। तीसरी बड़ी घटना, एसएससी कांस्टेबल जीडी परीक्षा में धांधली, इस बात को और स्पष्ट करती है कि यह संकट किसी एक परीक्षा या संस्था तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में पेपर लीक, तकनीकी खराबी और प्रशासनिक अव्यवस्था के कारण परीक्षा रद्द करनी पड़ी। ग्रेटर नोएडा में यूपी एसटीएफ द्वारा पकड़े गए रैकेट ने इस धांधली के आधुनिक रूप को उजागर किया। प्रॉक्सी सर्वर, स्क्रीन शेयरिंग ऐप्स और डमी कैंडिडेट्स के जरिए परीक्षा में हेरफेर किया जा रहा था। यह पारंपरिक नकल या पेपर लीक से कहीं अधिक खतरनाक है क्योंकि इसमें तकनीक का इस्तेमाल कर पूरी प्रणाली को भीतर से हैक किया जा रहा है। इन तीनों घटनाओं को एक साथ देखें तो एक भयावह तस्वीर उभरती है, एक ऐसी व्यवस्था, जहां प्रश्नपत्र सुरक्षित नहीं, मूल्यांकन विश्वसनीय नहीं और परीक्षा प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। सबसे अधिक पीड़ित वह छात्र है, जो ईमानदारी से मेहनत करता है। ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों छात्र, जिनके माता-पिता ने कर्ज लेकर या जमीन गिरवी रखकर उन्हें कोचिंग दिलाई, आज सबसे ज्यादा निराश हैं। एक परीक्षा रद्द होने का मतलब केवल दोबारा परीक्षा देना नहीं होता बल्कि यह मानसिक तनाव, आर्थिक बोझ और आत्मविश्वास के टूटने का कारण बनता है। इस पूरे संकट का एक और खतरनाक पहलू है व्यवस्था के प्रति बढ़ता अविश्वास। जब छात्र यह मानने लगें कि सफलता मेहनत से नहीं बल्कि ‘सेटिंग’ से मिलती है तो यह केवल शिक्षा का नहीं बल्कि सामाजिक नैतिकता का भी पतन है। अब सवाल यह है कि समाधान क्या है? क्या हर बार जांच, गिरफ्तारी और बयानबाजी से काम चल जाएगा? स्पष्ट है कि नहीं। सबसे पहले परीक्षा प्रणाली में पूर्ण डिजिटल और एन्क्रिप्टेड मॉडल लागू करना होगा। प्रश्नपत्रों को परीक्षा से कुछ मिनट पहले तक सुरक्षित सर्वर में रखा जाए और सीधे केंद्रों पर डिजिटल रूप में उपलब्ध कराया जाए। इससे छपाई और परिवहन से जुड़ी कमजोरियां समाप्त होंगी। दूसरा, आउटसोर्सिंग व्यवस्था को सीमित करना होगा। संवेदनशील कार्यों में केवल प्रशिक्षित और जवाबदेह सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति होनी चाहिए। तीसरा, पेपर लीक को संगठित आर्थिक अपराध घोषित कर इसके लिए गैर-जमानती कठोर कानून बनाए जाएं। जब तक अपराधियों को कठोर सजा नहीं मिलेगी, तब तक यह धंधा बंद नहीं होगा। चौथा, साइबर निगरानी को मजबूत करना होगा। टेलीग्राम, डार्क वेब और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय नेटवर्क को ट्रैक करने के लिए विशेष एजेंसियां बनाई जानी चाहिए। पांचवां, तकनीक को लागू करने से पहले उसका व्यापक परीक्षण और प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाए। सीबीएसई ओएसएम विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिना तैयारी के लागू की गई तकनीक समाधान नहीं बल्कि नई समस्या बन सकती है। सबसे महत्वपूर्ण है राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति। जब तक सरकार इस समस्या को ‘राष्ट्रीय आपदा’ की तरह नहीं देखेगी, तब तक आधे-अधूरे समाधान ही सामने आएंगे। नीट-यूजी 2026, सीबीएसई ओएसएम विवाद और एसएससी परीक्षा धांधली, ये घटनाएं चेतावनी हैं। यदि अब भी कठोर और स्थायी सुधार नहीं किए गए तो आने वाले समय में हर परीक्षा संदेह के घेरे में होगी। तब सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं होगी कि पेपर लीक हुआ बल्कि यह होगी कि देश के युवाओं का विश्वास पूरी तरह टूट जाएगा। और जिस राष्ट्र के युवा ही अपनी व्यवस्था पर विश्वास खो दें, उसके भविष्य की नींव कितनी कमजोर हो जाती है, यह समझना मुश्किल नहीं है। (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं) ईएमएस / 14 जून 26