ग्वालियर ( ईएमएस ) । मुरार स्थित जिला अस्पताल ग्वालियर में स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी खजाने के साथ बड़े खिलवाड़ का मामला सामने आया है। वर्ष 2025 में स्वीकृत हुआ आउटसोर्स कर्मचारियों का टेंडर बीती 31 मार्च को समाप्त होने के बाद, अस्पताल प्रशासन ने नई निविदा जारी करने या नियमसंगत सरकारी संस्था सेडमैप की मदद लेने के बजाय, चहेती निजी एजेंसियों को उपकृत करने का खेल रच दिया। सिविल सर्जन डॉ. आर. के. शर्मा द्वारा समय पर एक्सटेंशन न दिए जाने और मनमर्जी से सीधे दो नई एजेंसियों को कार्यादेश सौंपने के इस फैसले ने वित्तीय एवं प्रशासनिक नियमों को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है। चेतावनी पत्र और ब्लैकलिस्टिंग का डर: सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, जिला अस्पताल में आउटसोर्स कर्मचारियों की आपूर्ति का जिम्मा राज सिक्योरिटी फोर्स के पास था। इस एजेंसी का कार्यकाल 31 मार्च को समाप्त हो रहा था। नियमानुसार सिविल सर्जन को समय रहते एक्सटेंशन या नए टेंडर की प्रक्रिया पूरी करनी थी। परंतु, सिविल सर्जन डॉ. आर. के. शर्मा द्वारा एजेंसी को समय पर एक्सटेंशन नहीं दिया गया। उल्टा, इसी नाजुक अवधि के दौरान सिविल सर्जन कार्यालय द्वारा राज सिक्योरिटी फोर्स को ब्लैकलिस्ट करने का एक चेतावनी पत्र जारी कर दिया गया। विभागीय जानकारों का कहना है कि ब्लैकलिस्ट होने के कलंक और कानूनी दांवपेच से बचने के लिए राज सिक्योरिटी फोर्स ने आगे काम जारी रखने में अपनी असमर्थता जताते हुए हाथ खड़े कर दिए। *नियमों की धज्जियां* बिना टेंडर CMHO की एजेंसियों से सीधा अनुबंध पुरानी एजेंसी के हटते ही अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाएं और आउटसोर्स कर्मचारियों का वेतन संकट में पड़ गया। इस आपात स्थिति का लाभ उठाते हुए सिविल सर्जन डॉ. आर. के. शर्मा ने मप्र शासन के भंडार क्रय नियमों की अनिवार्य गाइडलाइन को पूरी तरह दरकिनार कर दिया। कर्मचारियों के वेतन भुगतान का हवाला देते हुए सिविल सर्जन ने बिना कोई नया टेंडर या कोटेशन जारी किए, सीधे मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय ग्वालियर में पहले से कार्यरत दो चहेती एजेंसियों—शर्मा सिक्योरिटी फोर्स और सनशाइन सिक्योरिटी फोर्स के साथ सीधे कार्य अनुबंध पर हस्ताक्षर कर दिए। *कलेक्टर और रोगी कल्याण समिति को रखा अंधेरे में?* मप्र शासन के नियमानुसार, यदि कोई आउटसोर्स एजेंसी अचानक काम बंद करती है, तो वैकल्पिक व्यवस्था के लिए जिला अस्पताल प्रबंधन को जिले के कलेक्टर (जो रोगी कल्याण समिति के अध्यक्ष होते हैं) तथा संचालनालय स्वास्थ्य सेवाएं, भोपाल से अनिवार्य वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वीकृति लेनी होती है। आपातकाल में सरकारी संस्था सेडमैप (CEDMAP) को आमंत्रित किया जा सकता था। परंतु, ग्वालियर जिला अस्पताल प्रबंधन ने बिना किसी उच्च अनुमति के सीधे निजी कंपनियों को करोड़ों रुपये के वेतन भुगतान का अधिकार सौंप दिया, जो सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितता के दायरे में आता है। इन सवालों के घेरे में हैं सिविल सर्जन:जब टेंडर 31 मार्च को खत्म हो रहा था, तो जनवरी या फरवरी में नए टेंडर (MP Tenders) की प्रक्रिया शुरू क्यों नहीं की गई?पुरानी एजेंसी को ठीक टेंडर समाप्ति के वक्त ही ब्लैकलिस्टिंग का नोटिस देने के पीछे क्या मंशा थी? क्या यह नई एजेंसियों को बैकडोर एंट्री दिलाने का सुनियोजित रास्ता था?आपातकालीन व्यवस्था के लिए शासन द्वारा मान्यता प्राप्त सेडमैप (CEDMAP) से संपर्क क्यों नहीं किया गया?बिना ओपन टेंडर , सीधे दो चुनिंदा निजी एजेंसियों (शर्मा और सनशाइन सिक्योरिटी) को ही सीधा वित्तीय लाभ पहुंचाने का फैसला किस नियम के तहत लिया गया? जबकि पूर्व में दोनों के विरुद्ध वेतन अनियमितता एवं ईपीएफ एवं ईएसआई जमा नहीं करने के आरोप लगे हुए हैं और दोनों का टेंडर पूर्व में ही CMHO कार्यालय से समाप्त हो चुका है इस पूरे मामले में अब जिला प्रशासन और स्वास्थ्य संचालनालय भोपाल की भूमिका पर नजरें टिकी हैं कि क्या इस सीधे नियमों के उल्लंघन पर सिविल सर्जन के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच बैठाई जाती है या नहीं।