एक टॉपर छात्रा की पीड़ा से उठते शिक्षा व्यवस्था पर ज्वलंत सवाल विद्यार्थियों की आवाज़ सुनी जा रही है? भारत की पहचान केवल उसकी प्राचीन सभ्यता,संस्कृति और लोकतांत्रिक परंपराओं से ही नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध शिक्षा व्यवस्था से भी रही है।नालंदा और तक्षशिला जैसी विश्वविख्यात शिक्षण परंपराओं वाले इस देश में शिक्षा को सदैव ज्ञान,विवेक,व्यक्तित्व निर्माण और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना गया।स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शिक्षा क्षेत्र में अनेक सुधार हुए।इसी क्रम में वर्ष 2020 में लागू की गई नई शिक्षा नीति (एनईपी-20) को भी इसी क्रम में एक ऐतिहासिक बदलाव के रूप में प्रस्तुत किया गया।केन्द्रसरकार ने इसे 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप लचीली,बहुविषयक, शोधोन्मुख तथा विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था की आधारशिला बताया।नई शिक्षा नीति में अनेक ऐसे प्रावधान हैं जिनका स्वागत किया जाना चाहिए।पाठ्यक्रम में सुधार,कौशल आधारित शिक्षा,बहुविषयक अध्ययन,शोध को बढ़ावा और भारतीय ज्ञान परंपरा को स्थान देने जैसे प्रयास निश्चित रूप से सकारात्मक हैं। मै स्पष्ट दुँ कि किसी भी नीति की वास्तविक सफलता सरकारी दस्तावेजों से नहीं,बल्कि उससे प्रभावित होने वाले विद्यार्थियों के अनुभवों से तय होती है।आज देश का एक बड़ा विद्यार्थी वर्ग ऐसे ही प्रश्नों से जूझ रहा है।विशेषकर उच्च शिक्षा में प्रवेश लेने वाले छात्र-छात्राओं के सामने ऐसी चुनौतियाँ खड़ी हो रही हैं,जिनकी कल्पना शायद नीति निर्माताओं ने भी नहीं की होगी।वर्ष 2017 में राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) की स्थापना देश की प्रमुख प्रवेश परीक्षाओं को पारदर्शी और मानकीकृत ढंग से आयोजित करने के उद्देश्य से की गई थी।धीरे- धीरे जेईई,नीट,सीयूईटी-यूजी और सीयूईटी-पीजी जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं की जिम्मेदारी एनटीए को सौंप दी गई।आज लाखों विद्यार्थियों का भविष्य कुछ घंटों की परीक्षा और एक केंद्रीकृत मूल्यांकन प्रणाली पर निर्भर है।दुर्भाग्य से जिस संस्था पर युवाओं के भविष्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है,वही संस्था पिछले कुछ वर्षों में लगातार विवादों के घेरे में रही है।वर्ष 2024 की नीट परीक्षा को लेकर उठे प्रश्न, अनियमितताओं के आरोप, न्यायालयों तक पहुँचे मामले तथा बाद के वर्षों में सामने आए पेपर लीक प्रकरणों ने विद्यार्थियों और अभिभावकों के मन में गहरी चिंता पैदा की है।परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं।स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि परीक्षा सामग्री की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए असाधारण स्तर की व्यवस्थाएँ करनी पड़ीं।जब देश के सर्वोच्च स्तर पर हस्तक्षेप आवश्यक हो जाए और सुरक्षा तंत्र को अतिरिक्त जिम्मेदारी उठानी पड़े,तब यह मानना होगा कि व्यवस्था के भीतर कहीं न कहीं गंभीर खामियाँ मौजूद हैं।नई शिक्षा नीति के तहत कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट यानी सीयूईटी को उच्च शिक्षा में प्रवेश का प्रमुख माध्यम बनाया गया।इसके पीछे तर्क यह दिया गया कि विभिन्न बोर्डों और विश्वविद्यालयों की मूल्यांकन पद्धतियों में अंतर होने के कारण एक समान परीक्षा आवश्यक है। सिद्धांत रूप में यह विचार उचित प्रतीत होता है,लेकिन व्यवहार में इसके कई दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं।इसे समझने के लिए किसी बड़े शोध की आवश्यकता नहीं है।एक छात्रा की पीड़ा ही पर्याप्त है।*कल्पना कीजिए एक ऐसी छात्रा की,जिसने मुंबई विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की।वह अपने कॉलेज की मेधावी छात्राओं में रही।उसका सीजीपीए नौ से अधिक है।तीन वर्षों तक उसने निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। उसके शिक्षकों को उसकी क्षमता पर पूरा विश्वास है।स्नातक के दौरान उसने अंग्रेजी साहित्य को प्रमुख विषय तथा इतिहास को माइनर विषय के रूप में पढ़ा।उसका शैक्षणिक रिकॉर्ड किसी भी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के लिए गर्व का विषय हो सकता है,लेकिन अचानक उसके माता-पिता का स्थानांतरण दिल्ली हो जाता है। अब वह दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में एम.ए. करना चाहती है।यहीं से उसकी कठिनाइयों का आरंभ होता है।दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रवेश प्रक्रिया में उसके तीन वर्षों की मेहनत,उसका उत्कृष्ट सीजीपीए और विषयगत योग्यता गौण हो जाती है।निर्णायक बन जाता है केवल सीयूईटी-पीजी का परिणाम। यदि उसने इतिहास विषय में सीयूईटी-पीजी का आवेदन नहीं किया अथवा परीक्षा में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी,तो उसके लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के द्वार लगभग बंद हो जाते हैं।यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या एक दिन की परीक्षा किसी विद्यार्थी की तीन वर्षों की शैक्षणिक यात्रा से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है?क्या किसी छात्र का निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन, उसकी शोध क्षमता,उसकी विषयगत समझ और अकादमिक उपलब्धियाँ एक वस्तुनिष्ठ परीक्षा के कुछ घंटों के सामने महत्वहीन हो जानी चाहिए?मानविकी विषयों के संदर्भ में यह प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है।साहित्य, इतिहास,दर्शन, संस्कृति और भाषाओं जैसे विषय स्वभावतः व्याख्यात्मक, विश्लेषणात्मक और शोधपरक होते हैं।इन विषयों में विद्यार्थी की वास्तविक क्षमता उसके विचार, तर्क,विश्लेषण और अभिव्यक्ति से आँकी जाती है।ऐसे विषयों की योग्यता को चार विकल्पों वाले वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में सीमित कर देना अनेक शिक्षाविदों को भी उचित नहीं लगता।अभियांत्रिकी और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का महत्व समझा जा सकता है,लेकिन साहित्य और इतिहास जैसे विषयों में केवल एमसीक्यू आधारित मूल्यांकन कई बार विषय की मूल प्रकृति के विपरीत प्रतीत होता है।यही कारण है कि अनेक विद्यार्थी स्वयं को इस व्यवस्था में असहज महसूस करते हैं।विडंबना यह है कि नई शिक्षा नीति का मूल उद्देश्य शिक्षा में लचीलापन लाना था,लेकिन अनेक छात्रों को यह व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक जटिल दिखाई दे रही है।क्रेडिट बैंक,मल्टीपल एंट्री-एग्जिट,चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम और क्रेडिट ट्रांसफर जैसी व्यवस्थाएँ सुनने में आकर्षक लगती हैं, लेकिन जब कोई छात्र वास्तव में विश्वविद्यालय बदलना चाहता है,तब उसे तकनीकी, प्रशासनिक और प्रक्रियागत चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।विशेष रूप से उन परिवारों के बच्चों के लिए यह स्थिति अधिक कठिन हो जाती है जिनके माता-पिता स्थानांतरणीय सेवाओं में कार्यरत हैं।केंद्र सरकार, रक्षा सेवाएँ,अर्धसैनिक बल,रेलवे तथा अन्य सार्वजनिक उपक्रमों में कार्यरत कर्मचारियों के बच्चों को अक्सर शहर और विश्वविद्यालय बदलने पड़ते हैं।ऐसे विद्यार्थियों के लिए वर्तमान प्रवेश प्रणाली कई बार अवसर की बजाय बाधा बन जाती है।प्रश्न यह भी है कि यदि किसी विद्यार्थी ने स्नातक स्तर पर किसी विषय का अध्ययन किया है, उसमें उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है और उसके पास उस विषय का प्रमाणित शैक्षणिक रिकॉर्ड है,तो क्या उसे केवल इसलिए उच्च शिक्षा से वंचित कर दिया जाना चाहिए क्योंकि उसने एक विशेष वर्ष में आयोजित एक विशेष प्रवेश परीक्षा में संबंधित विषय नहीं चुना था?यह प्रश्न केवल एक छात्रा का नहीं है।यह उन लाखों विद्यार्थियों का प्रश्न है जो जीवन की अनिश्चित परिस्थितियों के कारण कभी भी स्थानांतरण,आर्थिक कठिनाइयों या अन्य कारणों से शिक्षा के नए अवसर तलाशने को मजबूर हो सकते हैं।आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता का युग है। दुनिया तेजी से बदल रही है। डिग्रियों का स्वरूप बदल रहा है। ऐसे समय में शिक्षा व्यवस्था को और अधिक समावेशी,लचीला तथा विद्यार्थी-केंद्रित होना चाहिए। दुर्भाग्य से कई स्थानों पर व्यवस्था विद्यार्थियों की सुविधा से अधिक अपनी प्रशासनिक सुविधा को प्राथमिकता देती दिखाई देती है।यह भी सच है कि किसी भी परीक्षा प्रणाली का उद्देश्य चयन प्रक्रिया को सरल बनाना होता है।इसके लिए सरलता और गुणवत्ता के बीच संतुलन आवश्यक है। यदि सुविधा के नाम पर विद्यार्थियों की दीर्घकालिक अकादमिक उपलब्धियों को नजरअंदाज कर दिया जाए,तो यह शिक्षा के मूल उद्देश्य के साथ न्याय नहीं होगा।नई शिक्षा नीति के अनेक सकारात्मक पक्ष हैं।इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन किसी भी नीति की सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।यदि जमीनी स्तर पर विद्यार्थी स्वयं को असहाय, उपेक्षित और व्यवस्था का शिकार महसूस करने लगें,तो सुधार की आवश्यकता को स्वीकार करना ही होगा।राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी की विश्वसनीयता को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।प्रवेश परीक्षाओं की सुरक्षा, पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित किए बिना लाखों युवाओं का विश्वास वापस नहीं जीता जा सकता।साथ ही विश्वविद्यालयों को भी यह विचार करना होगा कि क्या केवल एक परीक्षा किसी विद्यार्थी की सम्पूर्ण क्षमता का आकलन कर सकती है।भारत को केवल इंजीनियर, डॉक्टर और तकनीकी विशेषज्ञ ही नहीं चाहिए।उसे इतिहासकार,साहित्यकार,भाषाविद,समाजशास्त्री, दार्शनिक और शोधकर्ता भी चाहिए।राष्ट्र निर्माण में इनकी भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण है।यदि हमारी प्रवेश प्रणाली उनकी प्रतिभा को पहचानने में असफल होती है,तो यह केवल विद्यार्थियों की नहीं, बल्कि राष्ट्र की बौद्धिक क्षति होगी।आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार,विश्वविद्यालय प्रशासन,शिक्षा विशेषज्ञ और एनटीए मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करें जिसमें प्रवेश परीक्षा के साथ-साथ विद्यार्थी के पूर्व शैक्षणिक प्रदर्शन को भी महत्व मिले। निरंतर उत्कृष्टता का मूल्यांकन हो।स्थानांतरणीय परिवारों के बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाए जाएँ।मानविकी विषयों के मूल्यांकन के स्वरूप पर पुनर्विचार किया जाए।शिक्षा का उद्देश्य दरवाजे खोलना है,बंद करना नहीं।यदि मुंबई विश्वविद्यालय की एक मेधावी छात्रा केवल प्रक्रियागत कारणों से देश की राजधानी में अपनी पसंद के विषय में उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पा रही,तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं,बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न है।नई शिक्षा नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों के लिए अवसरों का विस्तार करना था।अब समय आ गया है कि हम ईमानदारी से यह मूल्यांकन करें कि क्या वास्तव में ऐसा हो रहा है।क्योंकि किसी भी शिक्षा नीति की सफलता उसके दस्तावेजों में नहीं,बल्कि उस विद्यार्थी की आँखों में दिखाई देती है जिसके सपनों को वह उड़ान देने का दावा करती है,वही दूसरी देश का विद्यार्थी यही पूछ रहा है - उसकी आवाज़ सचमुच सुनी जा रही है? (स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 4 जून /2026