जब किसी का शिकार करना होता है तो शिकारी शिकार को हाका लगाकर ऐसी जगह ले जाते हैं जहां पहले से ही कोई बड़ा गड्ढा खुदा होता है। घबराहट में शिकार भागता हुआ जाता है और उसी गड्ढे में गिर जाता है। उसके बाद शिकार को पिंजरे में बंद करके रख लिया जाता है। कुछ इसी तरह का शिकार पश्चिम बंगाल में भाजपा ने ममता बनर्जी की टीएमसी का किया है। ममता बनर्जी की 28 साल पुरानी पार्टी का शिकार परंपरागत तरीके से कर लिया है। पार्टी के 58 विधायकों को ममता बनर्जी से दूर करने का जो जाल फैलाया गया था, उसी जाल में ममता फंस चुकी हैं। इस जाल को तोड़कर बाहर निकलना शायद ममता बनर्जी और टीएमसी के लिए अब संभव नहीं रहा। विधानसभा के चुनाव में जैसे-तैसे 80 सीटों पर टीएमसी के विधायक जीते थे। टीएमसी की ओर से विधानसभा अध्यक्ष रविंद्र बोस को पत्र भेजा गया था, जिसमें शोभनदेव चट्टोपाध्याय को टीएमसी के विधायक दल का नेता और सचेतक इत्यादि की जानकारी दी गई थी। नामों वाला संबंधित पत्र विधानसभा अध्यक्ष को भेजकर नियुक्ति का अनुरोध किया गया था। विधानसभा अध्यक्ष ने उस पत्र पर कोई कार्यवाही नहीं की। इसी बीच ऋतुवत बनर्जी ने जो टीएमसी के विधायक हैं और उनके एक साथी विधायक ने अपने हस्ताक्षर जाली बताकर विधानसभा अध्यक्ष के यहां आपत्ति जताई। मामला पुलिस और सीआईडी तक पहुंचा। टीएमसी के पत्र पर नियुक्ति रोक दी गई। उसके बाद ऋतुवत बनर्जी को भाजपा और विधानसभा अध्यक्ष का संरक्षण मिला। एक सूची 58 विधायकों की ऋतुवत बनर्जी ने विधानसभा अध्यक्ष को सौंपी। विधानसभा अध्यक्ष ने ताबड़तोड़ ऋतुवत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिया। उन्होंने सचेतक के रूप में जो नाम दिया था उसे स्वीकार कर लिया। जिसके कारण विधानसभा अध्यक्ष द्वारा निश्चित रूप से संसदीय परंपराओं में जिस तरह की कार्रवाई की जानी चाहिए थी वह नहीं की गई। जिस तरह से सांसद अभिषेक बैनर्जी और सांसद कल्याण बनर्जी की सड़क पर पिटाई की गई थी, उसके वीडियो वायरल किए गए, विधायकों को बैठक में नहीं पहुंचने दिया गया। विधायकों के बीच यह संदेश पहुंचाया गया वह ममता बनर्जी का साथ छोड़ दें और ऋतुवत बनर्जी के साथ आ जाएं। तभी वह सुरक्षित रहेंगे अन्यथा उनके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी। अभिषेक बनर्जी के घर ईड़ी ने दस्तक दे दी है। जिस तरह से पश्चिम बंगाल की सरकार टीएमसी के विधायकों और नेताओं के ऊपर कार्यवाही कर रही है, 2 लाख से अधिक केंद्र सरकार के अर्धसैनिक बल के जवान तैनात हैं। हाईकोर्ट और विधानसभा अध्यक्ष से भी कोई सहायता ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी को मिलती हुई दिख नहीं रही है। ऐसी स्थिति में टीएमसी के विधायकों में भगदड़ की स्थिति देखने को मिल रही है। उनके सामने दो ही विकल्प हैं यदि वह सुरक्षित रहना चाहते हैं तो ममता बनर्जी को छोड़कर ऋतुवत बनर्जी के साथ आ जाएं अन्यथा उनके ऊपर सख्त कार्रवाई की जाएगी, उनके ऊपर आपराधिक मुकदमे चलेंगे और सड़क में उनके ऊपर हमले भी हो सकते हैं। अभी तक अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी जैसे ताकतवर नेताओं के ऊपर जो हमले हुए हैं उस पर कोई कार्रवाई नहीं होने से टीएमसी में भय का वातावरण बन गया है। पश्चिम बंगाल में जो हो रहा है कुछ इसी तरह से महाराष्ट्र में भी हुआ था। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया। समय निकल जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि राज्यपाल ने जो फैसला लिया था वह गलत था। असंवैधानिक रूप से महाराष्ट्र की सरकार बनी। चुनाव आयोग ने जो फैसला दिया वह बगावती विधायकों के पक्ष में था। कुल मिलाकर समय निकलता चला गया और समय पर कोई निर्णय किसी भी संवैधानिक संस्था द्वारा नहीं दिया गया। जिसके कारण अवैध रूप से बनी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया। कुछ इसी तरह की स्थिति अब पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रही है। ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और टीएमसी के नेताओं के ऊपर हांका लगाया जा रहा है। जिस तरह की स्थितियां अभी देश में बनी हुई है़ं पश्चिम बंगाल की सरकार, विधानसभा अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की हाईकोर्ट से कोई राहत ममता बनर्जी और टीएमसी के नेताओं को मिलेगी यह दिखता नहीं है। ऐसी स्थिति में पश्चिम बंगाल में जो हो रहा है उसको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि अब संविधान और लोकतंत्र की बात करना एक तरह से बेमानी हो गया है। जिस तरह से राजतंत्र में एक दूसरे के ऊपर हमला करके जो वजनदार होता था वह दूसरे के राज्य को छीन लेता था, कुछ इसी तरह की स्थिति अब पश्चिम बंगाल में भी देखने को मिल रही है। लोकतंत्र, संवैधानिक व्यवस्थाएं सब कागजों तक अस्तित्व में हैं। परिणाम के रूप में यहां से कुछ मिलता नहीं है। ऐसा लगता है कि संवैधानिक संस्थाएं भी राजतंत्र की इशारे पर काम करने के लिए विवश हैं। संविधान की शपथ लेना एक अलग बात है। संविधान और कानून के अनुसार काम करना एक अलग बात है। पश्चिम बंगाल में 15 साल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जिस तरह से घेरकर उन्हें और उनकी पार्टी को नेस्तनाबूत किया जा रहा है, इसका असर पश्चिम बंगाल की राजनीति में हो रहा है। इसका असर राष्ट्रीय स्तर पर भी अब होने लगा है। एनडीए के जो सहयोगी दल हैं उनमें भी एक घबराहट देखने को मिल रही है। महाराष्ट्र में इसकी शुगबुगी शुरू हो चुकी है। अन्य राज्यों में भी इसको लेकर क्रिया प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। जिस तरह से महंगाई, बेरोजगारी, पेपर लीक, सीबीएसई-12वीं के परीक्षाफल को लेकर केंद्र सरकार और भाजपा के खिलाफ एक वातावरण बन रहा है। जिस तरह का आर्थिक संकट बढ़ता चला जा रहा है पश्चिम बंगाल में एक करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए हैं। लगभग 28 लाख मतदाता ट्रिब्यूनल में लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसी स्थिति में इसके दूरगामी परिणाम देखने को भारतीय राजनीति में मिल सकते हैं। जिस तरह से घटनाक्रम हो रहे हैं, उसको लेकर सबसे बड़ी चिंता संवैधानिक संस्थाओं द्वारा अपनी जिम्मेदारी का पालन नहीं करना तथा दलीय आधार पर संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोग यदि काम करते हैं ऐसी स्थिति में भारतीय संविधान और लोकतंत्र दोनों ही खतरे में नजर आते हैं। ईएमएस / 04 जून 26