(5 जून पर्यावरण दिवस पर विशेष) पर्यावरण शब्द परि और आवरण की सन्धि से बना है। पृथ्वी पर रहने वाले सारे जीव इसी आवरण में उत्पन्न होते हैं, फलते-फूलते हैं, तथा मृत्यु के पश्चात् इसी में विलीन हो जाते हैं। जीवों का शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। माता पूज्यनीय होती है और पृथ्वी तो माता की भी माता है अतः वह भी पूज्यनीय है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने पृथ्वी की पूजा के लिए सभी वेदों में अनेकों मन्त्र बनाये हैं और पृथ्वी के लिए हमें अपना जीवन तक बलिदान करने की शिक्षा दिया है। हमारे ऋषि वायु की शुद्धता की महिमा से भी परिचित थे। इसीलिए उन्होंने पवन को देवता माना और ऑक्सीजन को प्राण वायु कहा है। उन्होंने वायु की शुद्धता बनाये रखने के लिए कई प्रकार के यज्ञों का विधान भी बनाया था। इसी प्रकार अग्नि को भी देवता माना गया है। ऋग्वेद में अग्नि की पूजा बार-बार की गयी है। अग्नि ही नहीं प्रकृति के हर घटक से, जो कि हमें जीवन और आरोग्य प्रदान करते हैं, देवता मान कर उन्हें पूजा गया है। हमारे ऋषियों ने हमें पर्वतों, ग्रहों, सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, पत्थर, पेड़, वायु, जल सभी को पूजने और आदर करने की शिक्षा दिया है। कालान्तर में मानव ने अपने विज्ञान का दुरुपयोग करते हुए अपने पोषण के अतिरिक्त अपने निहित स्वार्थ, अहंकार और अपने को प्रभावशाली सिद्ध करने के लिए प्रकृति का दोहन आरम्भ कर दिया। अधिक से अधिक विलासिता पूर्ण जीवन की इच्छा ने उसे हिन्सक बना दिया। उसने घर, वस्त्र, वाहन इत्यादि के लिए जंगलों, पर्वतों, भूगर्भ-स्थित खनिजों, जल इत्यादि का दुरुपयोग इतना अधिक कर दिया कि सन्सार के पेड़ों की संख्या अरबों गुना कम हो गयी। पर्वतों को तोड़ डाला, भूगर्भ-स्थित खनिजों का इतना दोहन किया कि आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा।जनसंख्या विस्फोट, औद्योगीकरण, शहरीकरण, वनविनाश, अत्यधिक चराई, झूम कृषि तथा खनन गतिविधियाँ भूमि संसाधनों के क्षरण के प्रमुख कारण हैं। इनके अतिरिक्त रासायनिक उर्वरकों एवं पेस्टीसाइड्स पर आधारित पारम्परिक कृषि भी भूमि क्षरण का एक प्रमुख कारण है। हरित क्रान्ति के आगमन से कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए रासायनिक खादों, कीटनाशकों तथा शाकनाशकों के अंधाधुन्ध प्रयोग से न केवल वातावरण प्रदूषित हुआ है, अपितु भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने वाले सूक्ष्मजीवों की जनसंख्या में भी लगातार गिरावट दर्ज की गयी है जिससे मृदा की पैदावार शक्ति में कमी आयी है। अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों विशेषकर यूरिया के प्रयोग से भूमि अम्लीय हो जाती है। अम्लीय मृदा में सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे कापर तथा जिंक पौधों को उपलब्ध नही हो पाते हैं। इसके अतिरिक्त इस प्रकार की मृदा में आमतौर से कैल्शियम तथा पोटैशियम तत्वों का अभाव होता है। इसलिए इस प्रकार की मृदा में फसल की पैदावार में गिरावट आ जाती है। खेती के लिए मृदा का नैसर्गिक स्रोत पृथ्वी की सतह भूमि है। हमारे देश में सामान्यतः कृषि भूमि से अनुमन्य भूक्षरण की दर लगभग 7.5 टन प्रति हैक्टेयर प्रति वर्ष है, परन्तु वर्तमान दर लगभग 20-30 टन प्रति हैक्टेयर प्रति वर्ष तक पहुँच गयी है, जिसमें अधिकतम योगदान पर्वतीय क्षेत्रों का है। यह एक चिन्ता का विषय है जिसके लिए तुरन्त मृदा संरक्षण के उपयुक्त उपाय प्रयोग करना अत्यावश्यक है। मृदा पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत है जो कि जीवन बनाये रखने में सक्षम है| किसानों के लिए मृदा का बहुत अधिक महत्व होता है, क्योंकि किसान इसी मृदा से प्रत्येक वर्ष स्वस्थ व अच्छी फसल की पैदावार पर आश्रित होते हैं| बहते हुए जल या वायु के प्रवाह द्वारा मृदा के पृथक्कीकरण तथा एक स्थान से दूसर स्थान तक स्थानान्तरण को ही मृदा अपरदन से प्रभावित लगभग 150 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्रफल है जिसमें से 69 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्रफल अपरदन की गंभीर स्थिति की श्रेणी में रखा गया है| मृदा की ऊपरी सतह का प्रत्येक वर्ष अपरदन द्वारा लगभग 5334 मिलियन टन से भी अधिक क्षय हो रहा| देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 57% भाग मृदा ह्रास के विभिन्न प्रक्ररों से ग्रस्त है| जिसका 45% जल अपरदन से तथा शेष 12% भाग वायु अपरदन से प्रभावित है भारत एक कृषि प्रधान देश है,| भोजन हमारी मूलभूत आवश्यकता है। देश में ‘हरित क्रांति’ के माध्यम से कृषि उत्पादन में आशातीत वृद्धि हुई, किन्तु ‘जनसंख्या विस्फोट’ के कारण भोजन की समस्या आज भी बनी हुई है। खाद्यान्न पूरी तरह से उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। भूमि एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन जो हमें अच्छा भोजन प्रदान करती है। कुपोषण से निजात के लिए सभी पौष्टिक तत्व से युक्त अच्छा आहार बहूत ज़रूरी है अच्छा आहार अच्छी फसल, तथा सुरक्षित मिट्टी व उपजाऊ भूमि से मिलता है। मिट्टी का कटाव ऊपरी मिट्टी को हटा देता है जो कार्बनिक पदार्थ, पोषक तत्वों, सूक्ष्म जीवों के लिए जरूरी होता है, जिनके लिए पौधों को बढ़ने और उगने में मदद करता है। संरक्षण एक ऐसा कदम है जो मिटटी की शक्ति को नष्ट होने से बचाता है। मृदा प्रदूषण कृषि भूमि पर कीटनाशकों और उर्वरकों की अधिकता के कारण फैलता है। पौधों के विकास और पनपने के लिए स्वस्थ मिट्टी महत्वपूर्ण है। मिट्टी के संरक्षण के लिए कई तरीके हैं जो कि आप कृषि पद्धतियों या उपायों के माध्यम से किया जा सकता है। अनुकूली क्षमता के निर्माण में योजनाबद्ध अनुकूलन का व्यापक महत्त्व है। आवासीय और वाणिज्यिक भवनों के लिये पैसिव कूलिंग प्रौद्योगिकी ‘अर्बन हीट आइलैंड’ की समस्या को कम करने हेतु एक व्यवहार्य विकल्प प्रदान करती है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल की एक रिपोर्ट में इस प्रौद्योगिकी का उपयोग करने वाले प्राचीन भारतीय भवन डिज़ाइनों का हवाला दिया गया है, जिनका उपयोग आधुनिक भवनों में भी किया जा सकता है। आपदा प्रत्यास्थी अवसंरचना के अंतर्गत आश्रय गृहों, तटीय तटबंधों और बाढ़ प्रतिरोधी इमारतों एवं सड़कों के निर्माण के माध्यम से आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना का विकास करना शामिल है। इसके साथ ही, उपयुक्त और कुशल मौसम पूर्वानुमान एवं पूर्व चेतावनी प्रणाली का विकास करना भी आवश्यक है इस प्रकार, जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूल होने के सीमित साधन रखने वाले लोगों के कल्याण के लिये किये जाने वाले प्रयासों के परिणामस्वरूप सीमित बजट और निम्न आर्थिक विकास जैसे परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं।स्वच्छ और हरित ऊर्जा का विकास जीवाश्म ईंधन के बोझ को दूर करने और वायु प्रदूषण को कम करने में मदद कर सकता है। नई पारगमन प्रणालियों का विकास और मौजूदा प्रणालियों के विस्तार से भी रोज़गार में तेज़ी आ सकती है।भारत की राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान रिपोर्ट वर्ष 2030 तक स्वच्छ ऊर्जा से 35 प्रतिशत ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखती है। आबादी के बढ़ने के कारण जंगल के पेड़-पौधें, चारे और मकान आदि के लिए काटे जा रहे हैं। खेती के योग्य भूमि धीरे-धीरे बंजर और रेगिस्तान में बदलती जा रही है। बढ़ती हुई जनंसख्या के लिए अधिक अन्न एवं अधिक अन्नोत्पादन के लिए नए-नए तरीके, रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाओं का अधिक प्रयोग किए जाने से फसल तो बढ़ती है परन्तु इनके बार-बार प्रयोग किये जाने के कारण प्रदूषण भी बढ़ता है। वातावरण में विभिन्न प्रकार के प्रदूषकों को जोड़कर जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देता है।अपशिष्ट गैसीकरण जैसे अपशिष्ट-चयनात्मक प्रबंधन संयंत्रों का विकास इस समस्या का समाधान कर सकेगा।इन संयंत्रों की अवसंरचना का निर्माण और उनका भविष्य का रखरखाव कुशल श्रमिकों के लिये रोज़गार के नए अवसर प्रदान करेगा। इस समस्या के समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने जून 1972 में स्टाकहोम में एक सम्मेलन आयोजित किया था। भारत सहित विश्व के सभी प्रमुख देशों ने इसमें भाग लिया था। इस सम्मेलन में यह निश्चित किया गया था कि पर्यावरण संरक्षण और सुधार के लिए सभी देशों को समुचित कदम उठाना चाहिए। इसके अन्तर्गत भारत सरकार ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 पारित किया था। इस अधिनियम का उद्देश्य था कि पर्यावरण का संरक्षण तथा सुधार किया जाए। इसके लिए इस अधिनियम में अनेकों बार सुधार करके इसे और भी शक्तिशाली बनाया गया। इस अधिनियम में पर्यावरण के घटकों को प्रदूषित करने वालों को दंडित करने का प्रावधान भी किया गया है। सभी कारणों से आज प्रकृति का सन्तुलन इतना बिगड़ गया है कि यदि यही क्रम कुछ और वर्षों तक चलता रहा तो इस पृथ्वी से मानव के विलुप्त होने की आशंका दृष्टिगोचर होने लगेगी। जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवों का स्वास्थ्य और अस्तित्व आज संकट में आ गया है। इस समस्या के समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने जून 1972 में स्टाकहोम में एक सम्मेलन आयोजित किया था। भारत सहित विश्व के सभी प्रमुख देशों ने इसमें भाग लिया था। इस सम्मेलन में यह निश्चित किया गया था कि पर्यावरण संरक्षण और सुधार के लिए सभी देशों को समुचित कदम उठाना चाहिए। इसके अन्तर्गत भारत सरकार ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 पारित किया था। इस अधिनियम का उद्देश्य था कि पर्यावरण का संरक्षण तथा सुधार किया जाए। इसके लिए इस अधिनियम में अनेकों बार सुधार करके इसे और भी शक्तिशाली बनाया गया। इस अधिनियम में पर्यावरण के घटकों को प्रदूषित करने वालों को दंडित करने का प्रावधान भी किया गया है। वर्तमान परिदृश्य में यह आवश्यक हो गया है कि आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण पर भी ध्यान देना चाहिए एवं आर्थिक विकास का उद्देश्य पर्यावरण के विकास की धारणा होनी चाहिए, जिससे विकास की गति भी न रुके और प्राकृतिक सन्तुलन को भी बनाए रखा जा सके और यह तभी सम्भव हो सकेगा जब मनुष्य खुद इसके प्रति जागरूक हो एवं पर्यावरण की महत्ता को समझे। पर्यावरण प्रदूषण के कारण पूरे विश्व की जलवायु भी परिवर्तित हो। ईएमएस / 04 जून 26