सीजेआई बोले- आधुनिक सुविधाएं केवल शहरों में ही उपलब्ध हैं इस सोच को बदलना है नई दिल्ली,(ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एक लेख में लिखा- भारत के विकास की चर्चा महानगरों, उद्योगों, तकनीक और आधुनिक संरचना के संदर्भ में की जाती है। ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें और तीव्र आर्थिक गतिविधियां प्रगति का प्रतीक मानी जाती हैं, किंतु इस विकास यात्रा के बीच अहम सवाल हमारे सामने खड़ा है- क्या हम अनजाने में गांवों की मूल आत्मा खो रहे हैं? क्या विकास का अर्थ यह होना चाहिए कि गांव धीरे-धीरे शहर का रूप ले लें? अथवा हमें ऐसा भारत निर्मित करना चाहिए, जहां गांव अपनी सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक आत्मीयता और जीवन मूल्यों को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक सुविधाओं से भी सम्पन्न हों? यह पूरे भारत के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है, लेकिन हरियाणा के गांवों का उल्लेख इसलिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि वहां आज भी सामुदायिक जीवन, श्रम संस्कृति आत्मसम्मान और सामाजिक सहभागिता की परंपरा जीवंत है। उन्होंने कहा कि यही स्थिति देश के अनेक राज्यों के गांवों में भी दिखाई देती है। भारत की वास्तविक शक्ति गांवों में बसती है। यदि गांवों का चरित्र ही बदल गया तो भारत की आत्मा भी प्रभावित होगी। असली चुनौती यह है कि विकास पहुंचाते समय गांवों को ‘शहर’ बनने से कैसे बचाया जाए। गांवों में सड़कें हों, आधुनिक विद्यालय, उत्तम स्वास्थ्य सेवाएं, डिजिटल सुविधाएं, रोजगार के अवसर हों, यह जरूरी है लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि गांवों की सामाजिक संरचना, सामूहिकता, पर्यावरणीय संतुलन व मानवीय निकटता सुरक्षित रहे। वर्तमान समय में बड़ी संख्या में ग्रामीण युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसका प्रमुख कारण केवल आर्थिक नहीं है। कई बार यह स्वाभाविक धारणा भी होती है कि सम्मानजनक जीवन, अवसर और आधुनिक सुविधाएं केवल शहरों में ही उपलब्ध हैं। यदि हमें गांवों को सशक्त बनाना है और इस सोच को बदलना है, तो हमें इस पलायन को हतोत्साहित करना होगा। जब युवाओं को यह अनुभव होगा कि वे अपने गांव में रहकर भी सम्मान, अवसर और प्रगति हासिल कर सकते हैं, तभी पलायन की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से कम होगी। सीजेआई ने कहा कि ग्रामीण जीवन को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। गांवों की सबसे बड़ी शक्ति उनका सामाजिक ताना-बाना है। शहरों में व्यक्ति अक्सर भीड़ के बीच भी अकेला हो जाता है, जबकि गांवों में समुदाय अभी भी जीवन का केंद्र बना हुआ है। परिवार, पड़ोस, सामूहिक सहयोग, पारस्परिक उत्तरदायित्व...ये वे मूल्य हैं, जो भारतीय समाज को स्थिरता प्रदान करते हैं। यदि गांवों का भी अत्यधिक नगरीकरण हो गया तो केवल भौतिक संरचना ही नहीं बदलेगी, हमारे सामाजिक संबंधों की प्रकृति भी बदल जाएगी। भारत के गांव केवल अतीत की स्मृति नहीं हैं, वे भविष्य की संभावना भी हैं। आज विश्वभर में सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण व सामुदायिक जीवन के महत्व पर फिर बल दिया जा रहा है। भारतीय गांव इन मूल्यों के स्वाभाविक केंद्र रहे हैं। हम संतुलित दृष्टिकोण अपनाएं तो गांव आधुनिक सुविधाओं व पारंपरिक सामाजिक शक्ति का उत्कृष्ट संगम बन सकते हैं। भारत की प्रगति का सही मापदंड सिर्फ यह नहीं होगा कि शहर कितने विकसित हुए, बल्कि यह होगा कि गांव कितने आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर, सम्मानपूर्ण बने। यदि गांवों का युवा अपने भविष्य को गांव से जोड़कर देखे, किसान अपने श्रम पर गर्व अनुभव करे, महिलाओं को समान अवसर व सुरक्षा मिले और हर ग्रामीण परिवार को यह महसूस हो कि संविधान की शक्ति जीवन को स्पर्श कर रही है, तभी विकास वास्तव में समावेशी व सार्थक कहलाएगा। सिराज/ईएमएस 04जून26