लेख
08-Jun-2026
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-लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह रही है कि सत्ता परिवर्तन चुनावों के माध्यम से होता है, न कि भय, हिंसा या दबाव के जरिए। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों में राजनीतिक हिंसा, दलगत संघर्ष, जांच एजेंसियों के उपयोग को लेकर उठते सवाल और मीडिया की भूमिका पर बढ़ती बहस ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर चिंताएं पैदा की हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीति इन चर्चाओं के केंद्र में रही है। पश्चिम बंगाल लंबे समय से राजनीतिक हिंसा का गढ़ माना जाता रहा है। पहले वामपंथी दलों और तृणमूल कांग्रेस के बीच संघर्ष की घटनाएं सामने आती थीं, जबकि हाल के वर्षों में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच टकराव लगातार सुर्खियों में रहा है। चुनावों के दौरान और उसके बाद हिंसा, पार्टी कार्यालयों पर हमले, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्याओं तथा विरोधी दलों के नेताओं के साथ दुर्व्यवहार की अनेक घटनाएं दर्ज की गई हैं। इन घटनाओं पर समय-समय पर अदालतों और चुनाव आयोग ने भी चिंता व्यक्त की है। राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि जब किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्षी दलों को लगातार दबाव, भय या हिंसा का सामना करना पड़ता है, तब राजनीति का चरित्र लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा से हटकर शक्ति प्रदर्शन की ओर बढ़ने लगता है। इसी संदर्भ में कुछ आलोचक वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों की तुलना संगठित गिरोहों की कार्यप्रणाली से करते हैं। हालांकि यह तुलना एक राजनीतिक राय है और इसे तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता। दाऊद इब्राहिम भारत का एक कुख्यात अपराधी रहा है, जिस पर संगठित अपराध, तस्करी, वसूली और आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े गंभीर आरोप लगे। उसकी कार्यप्रणाली भय, दबाव और नेटवर्क आधारित नियंत्रण पर आधारित बताई जाती रही है। दूसरी ओर राजनीतिक दल लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं, जिन्हें जनता के मतों से वैधता प्राप्त होती है। इसलिए किसी राजनीतिक दल की सीधे किसी आपराधिक गिरोह से तुलना करना एक गंभीर राजनीतिक आरोप है, जिसके समर्थन में ठोस न्यायिक या कानूनी निष्कर्ष आवश्यक होते हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हमलों तथा पार्टी कार्यालयों को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं को लेकर कई बार आरोप-प्रत्यारोप हुए हैं। वहीं भारतीय जनता पार्टी भी लंबे समय से आरोप लगाती रही है कि उसके कार्यकर्ता राज्य में राजनीतिक हिंसा के शिकार हुए हैं। विभिन्न मानवाधिकार संगठनों और मीडिया रिपोर्टों में भी राजनीतिक हिंसा को राज्य की गंभीर समस्या बताया गया है। इसका अर्थ यह है कि हिंसा का मुद्दा केवल एक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक राजनीतिक संस्कृति की चुनौती बन चुका है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका भी बहस का विषय बनी हुई है। सरकार समर्थक और सरकार विरोधी मीडिया जैसे शब्द अब आम राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं। कुछ आलोचक मीडिया के एक हिस्से को सुपारी मीडिया कहकर संबोधित करते हैं, जबकि दूसरी ओर मीडिया संस्थान अपने काम को पत्रकारिता और जनहित से प्रेरित बताते हैं। यह बहस लोकतंत्र में मीडिया की स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों से जुड़ी हुई है। लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि राजनीतिक संघर्ष संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर रहे। यदि किसी भी दल, संगठन या समूह द्वारा हिंसा, धमकी या दमन का सहारा लिया जाता है, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान लोकतांत्रिक व्यवस्था को होता है। राजनीतिक असहमति का समाधान चुनाव, न्यायपालिका, संसद, विधानसभा और सार्वजनिक संवाद के माध्यम से होना चाहिए, न कि सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन या हिंसा के जरिए। पश्चिम बंगाल की घटनाएं इस बात की याद दिलाती हैं कि लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब सत्ता और विपक्ष दोनों कानून के शासन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के अधिकार का सम्मान करें। लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और राजनीतिक दलों की जवाबदेही ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि भारत की राजनीति किसी भी प्रकार की भय या हिंसा आधारित संस्कृति से दूर रहे। ईएमएस / 08 जून 26