वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर अब आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। विशेष रूप से स्वास्थ्य क्षेत्र में इसका प्रभाव चिंताजनक रूप में सामने आया है। दवाओं के निर्माण में उपयोग होने वाले कच्चे माल की कीमतों में तेजी से वृद्धि, समुद्री भाड़े में बढ़ोतरी, पैकेजिंग सामग्री के महंगे होने और परिवहन लागत बढ़ने के कारण दवा कंपनियों ने कई आवश्यक दवाओं के दाम बढ़ा दिए हैं। बाजार में पहुंच रहे नए स्टॉक की दवाएं 8 से 17 प्रतिशत तक महंगी हो चुकी हैं। इसका सीधा असर उन लाखों मरीजों पर पड़ रहा है जो नियमित रूप से दवाओं पर निर्भर हैं। भारत विश्व के प्रमुख दवा उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन दवा निर्माण में उपयोग होने वाले कई महत्वपूर्ण कच्चे पदार्थों और एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट्स की आपूर्ति अब भी बड़े पैमाने पर विदेशों से होती है। हाल के महीनों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़े तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं के कारण इन कच्चे पदार्थों की उपलब्धता प्रभावित हुई है। पेट्रोकेमिकल आधारित कई आवश्यक रसायनों की कीमतों में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। बेंजीन, टोल्यून और एथिलीन जैसे रसायन दवा उद्योग के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इनका उपयोग पैरासिटामोल, पेनिसिलिन, एंटीबायोटिक्स और अन्य कई जीवनरक्षक दवाओं के निर्माण में किया जाता है। जब इनकी कीमत बढ़ती है तो उसका प्रभाव सीधे दवा उत्पादन लागत पर पड़ता है। दवा उद्योग केवल कच्चे रसायनों पर ही निर्भर नहीं होता बल्कि उसकी पैकेजिंग भी बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। टैबलेट की स्ट्रिप, सिरप की बोतल, इंजेक्शन की शीशियां, सिरिंज और मेडिकल उपकरणों में प्लास्टिक तथा एल्युमीनियम का व्यापक उपयोग किया जाता है। इन दोनों सामग्रियों की कीमतों में हाल के समय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके कारण उत्पादन लागत बढ़ी है और कंपनियों को अपने उत्पादों के दाम बढ़ाने पड़े हैं। पैकेजिंग लागत में बढ़ोतरी का असर विशेष रूप से उन दवाओं पर अधिक दिखाई दे रहा है जिनका उपयोग बड़े पैमाने पर होता है। समुद्री परिवहन की लागत में वृद्धि भी दवा उद्योग के लिए बड़ी समस्या बन गई है। अधिकांश कच्चा माल विदेशों से समुद्री मार्ग के जरिए भारत पहुंचता है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण जहाजरानी कंपनियों ने भाड़ा बढ़ा दिया है। साथ ही बीमा और लॉजिस्टिक्स लागत में भी वृद्धि हुई है। इसका असर आयातित कच्चे माल की कीमतों पर पड़ा है। जब उत्पादन की लागत बढ़ती है तो अंततः उसका बोझ उपभोक्ताओं पर ही पड़ता है। यही कारण है कि दवाओं की नई खेप पहले की तुलना में अधिक कीमत पर बाजार में पहुंच रही है। विशेषज्ञों के अनुसार सबसे अधिक असर उन दवाओं पर दिखाई दे रहा है जिनका उपयोग रोजमर्रा के उपचार में किया जाता है। बुखार, दर्द, संक्रमण, एलर्जी और पेट संबंधी बीमारियों की दवाएं पहले की तुलना में महंगी हो गई हैं। पैरासिटामोल जैसे सामान्य उपयोग के साल्ट के कच्चे माल की कीमत में एक महीने के भीतर लगभग 47 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। दर्द निवारक दवाओं में उपयोग होने वाले डाइक्लोफेनाक और डाइक्लोफेनाक पोटेशियम की कीमतों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। एंटीबायोटिक्स के क्षेत्र में अमॉक्सिसिलिन ट्राइहाइड्रेट और सिप्रोफ्लोक्सासिन जैसे प्रमुख साल्ट भी महंगे हो गए हैं। इससे संक्रमण संबंधी उपचार की लागत बढ़ने की आशंका है। दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे अधिक प्रभाव मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ रहा है। ऐसे परिवार जिनमें बुजुर्ग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग या अन्य दीर्घकालिक बीमारियों से पीड़ित सदस्य हैं, उन्हें हर महीने दवाओं पर निश्चित राशि खर्च करनी पड़ती है। जब दवाओं की कीमतों में लगातार वृद्धि होती है तो घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव बनता है। कई बार मरीज आर्थिक कारणों से दवाओं की मात्रा कम कर देते हैं या उपचार बीच में ही छोड़ देते हैं, जिससे उनकी स्वास्थ्य स्थिति और गंभीर हो सकती है। चिंता की बात यह भी है कि बड़ी दवा कंपनियां आमतौर पर तीन से छह महीने तक का कच्चा माल अपने पास संग्रहित रखती हैं, इसलिए उन पर तत्काल असर अपेक्षाकृत कम पड़ता है। लेकिन छोटी और मध्यम स्तर की दवा कंपनियां सीमित मात्रा में ही कच्चा माल खरीद पाती हैं। जब सप्लाई चेन प्रभावित होती है तो इन कंपनियों के उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। कई कंपनियां नए ऑर्डर लेने में भी हिचकिचा रही हैं। इससे बाजार में दवाओं की उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित हो सकती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे माल की कीमतों और परिवहन लागत में इसी तरह बढ़ोतरी जारी रही तो आने वाले महीनों में दवाओं के थोक और खुदरा दामों में और वृद्धि देखने को मिल सकती है। इसका असर केवल सामान्य दवाओं तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि सर्जिकल सामग्री, मेडिकल उपकरण और अस्पतालों में उपयोग होने वाली अन्य आवश्यक वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं। इससे स्वास्थ्य सेवाओं की कुल लागत बढ़ेगी और आम नागरिकों को अधिक आर्थिक बोझ उठाना पड़ेगा। वर्तमान परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि दवा उद्योग को कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में तेजी से काम करना होगा। देश में ही आवश्यक रसायनों और एपीआई के उत्पादन को बढ़ावा देकर भविष्य में ऐसी परिस्थितियों के प्रभाव को कम किया जा सकता है। साथ ही सरकार और उद्योग जगत को मिलकर ऐसी रणनीति तैयार करनी होगी जिससे आवश्यक दवाओं की कीमतें नियंत्रण में रहें और मरीजों को राहत मिल सके। स्वास्थ्य किसी भी समाज की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है। ऐसे में दवाओं की बढ़ती कीमतें केवल आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक चिंता का विषय भी हैं। यदि समय रहते इस दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में लाखों मरीजों के लिए इलाज कराना और अधिक महंगा हो सकता है। इसलिए आवश्यक है कि दवा आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाया जाए, घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन दिया जाए और मरीजों को सस्ती व सुलभ दवाएं उपलब्ध कराने के लिए ठोस प्रयास किए जाएं। तभी स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ते आर्थिक दबाव को कम किया जा सकेगा। (L 103 जलवन्त टाउनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार-स्तम्भकार) ईएमएस / 10 जून 26