लेख
12-Jun-2026
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क्या चुनाव लड़ने का अधिकार प्रशासनिक विवेक पर निर्भर हो सकता है? भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है, सरकारें बनाती है और उन्हें बदलती भी है। किंतु लोकतांत्रिक प्रक्रिया का यह मूल सिद्धांत तब प्रश्नों के घेरे में आ जाता है जब किसी उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से पहले ही नामांकन निरस्त कर प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है। हाल के वर्षों में नामांकन पत्रों और शपथपत्रों (फार्म 26) से जुड़े विवादों ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न खड़ा किया है—क्या चुनाव लड़ने का अधिकार स्पष्ट कानूनी मानकों से संचालित हो रहा है, या फिर यह अधिकारियों की व्याख्या और विवेक पर निर्भर होता जा रहा है? यह प्रश्न किसी एक दल या व्यक्ति का नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की निष्पक्षता और विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न है। कानून का उद्देश्य क्या है? जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 36 नामांकन पत्रों की जांच की प्रक्रिया निर्धारित करती है। इस धारा का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल वही उम्मीदवार चुनाव लड़ें जो कानून द्वारा निर्धारित योग्यता रखते हों और जिनके नामांकन में कोई गंभीर कानूनी दोष न हो। साथ ही यह धारा स्पष्ट रूप से यह भी संकेत देती है कि तकनीकी या मामूली त्रुटियों के आधार पर उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। लोकतंत्र की भावना भी यही कहती है कि जहाँ संदेह हो, वहाँ निर्णय चुनाव के पक्ष में होना चाहिए, न कि बहिष्कार के पक्ष में। यही कारण है कि न्यायालयों ने समय-समय पर रिटर्निंग आफीसर की भूमिका को सीमित बताया है। रिटर्निंग आफीसर कोई न्यायालय नहीं है और न ही वह विस्तृत तथ्यात्मक जांच करने वाली एजेंसी है। उसका कार्य प्रारंभिक परीक्षण करना है, न कि जटिल कानूनी विवादों का अंतिम निपटारा करना। *शपथपत्र और मतदाता का अधिकार* सर्वोच्च न्यायालय ने एडीआर तथा बाद के अनेक निर्णयों में मतदाता के जानने के अधिकार को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अंग माना है। इसी सोच के आधार पर उम्मीदवारों के लिए संपत्ति, देनदारियों, आपराधिक मामलों और शैक्षणिक योग्यता का खुलासा अनिवार्य किया गया। फार्म 26 इसी पारदर्शिता का साधन है। लेकिन यहीं से एक जटिल प्रश्न उत्पन्न होता है। यदि कोई उम्मीदवार शपथपत्र प्रस्तुत करता है, किंतु उसके खुलासों की पर्याप्तता या पूर्णता पर विवाद उठता है, तो क्या रिटर्निंग अधिकारी उसी समय यह तय कर सकता है कि जानकारी पर्याप्त है या नहीं? सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों का संकेत यही रहा है कि शपथपत्र की सत्यता और पर्याप्तता का अंतिम परीक्षण न्यायिक मंच पर होना चाहिए, न कि स्क्रूटनी की सीमित प्रक्रिया में। *परिमल नाथवानी और मीनाक्षी नटराजन के प्रकरण* इसी संदर्भ में दो चर्चित प्रकरण विशेष महत्व रखते हैं—झारखंड में परिमल नाथवानी का मामला और मीनाक्षी नटराजन से जुड़ा विवाद। परिमल नाथवानी के मामले में आरोप लगाया गया कि कुछ जानकारियों का पूरा खुलासा नहीं किया गया। इसके बावजूद नामांकन को वैध माना गया। इसके पीछे प्रमुख तर्क यह था कि शपथपत्र दाखिल किया जा चुका है और उसकी पर्याप्तता अथवा सत्यता का विस्तृत परीक्षण स्क्रूटनी के दौरान नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर मीनाक्षी नटराजन के मामले में शपथपत्र संबंधी आपत्तियों के आधार पर नामांकन निरस्तीकरण का प्रश्न सामने आया। यहाँ मूल प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा उम्मीदवार सही था और कौन-सा गलत। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या दोनों मामलों में समान कानूनी सिद्धांत लागू किए गए? यदि एक मामले में कथित अपूर्ण खुलासे को नामांकन निरस्तीकरण का आधार नहीं माना जाता और दूसरे मामले में समान प्रकृति की कमी को गंभीर दोष मान लिया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से विधिक समानता और न्यायिक स्थिरता पर प्रश्न उठेंगे। कानून की विश्वसनीयता केवल उसके अस्तित्व से नहीं बनती। उसकी विश्वसनीयता इस बात से बनती है कि वह समान परिस्थितियों में समान रूप से लागू हो। *लोकतंत्र के लिए वास्तविक खतरा* बहस का केंद्र किसी विशेष उम्मीदवार का भाग्य नहीं होना चाहिए। वास्तविक चिंता इससे कहीं बड़ी है। यदि अपूर्ण खुलासा, अपर्याप्त जानकारी और सारभूत दोष की स्पष्ट परिभाषा नहीं होगी, तो भविष्य में कोई भी उम्मीदवार विवादों और व्याख्याओं के आधार पर चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है। लोकतंत्र में चुनाव लड़ने का अधिकार केवल उम्मीदवार का व्यक्तिगत अधिकार नहीं है। यह मतदाताओं का भी अधिकार है कि वे अधिकतम विकल्पों में से अपना प्रतिनिधि चुन सकें। जब किसी उम्मीदवार का नामांकन निरस्त किया जाता है, तब केवल एक व्यक्ति प्रक्रिया से बाहर नहीं होता बल्कि मतदाताओं के सामने उपलब्ध एक विकल्प भी समाप्त हो जाता है। इसलिए नामांकन निरस्तीकरण की शक्ति को अत्यंत सावधानी से प्रयोग किया जाना चाहिए। क्या झूठी जानकारी को अनदेखा किया जाए? इस तर्क का यह अर्थ नहीं है कि उम्मीदवारों को गलत जानकारी देने की छूट मिल जानी चाहिए। यदि कोई उम्मीदवार जानबूझकर तथ्य छिपाता है या झूठा शपथपत्र देता है, तो उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। चुनावी पारदर्शिता लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है। लेकिन प्रश्न यह है कि उस कार्रवाई का मंच कौन-सा होना चाहिए? क्या सीमित समय में कार्यरत रिटर्निंग अधिकारी जटिल तथ्यों की जांच कर अंतिम निष्कर्ष निकाले, या फिर न्यायालय साक्ष्यों और विस्तृत सुनवाई के आधार पर निर्णय करे? लोकतांत्रिक न्यायशास्त्र का सामान्य झुकाव दूसरे विकल्प की ओर रहा है। इसका कारण यह है कि गलत जानकारी देने वाले उम्मीदवार के विरुद्ध बाद में कार्रवाई की जा सकती है, किंतु अनुचित रूप से निरस्त किए गए नामांकन की क्षति अक्सर अपूरणीय होती है। इसीलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका मिलकर स्पष्ट दिशानिर्देश विकसित करें। यह स्पष्ट होना चाहिए कि— कौन-सी त्रुटि केवल तकनीकी त्रुटि है, कौन-सी कमी अपूर्ण खुलासा मानी जाएगी, कौन-सी स्थिति सारभूत दोष होगी, और किन परिस्थितियों में नामांकन निरस्त किया जा सकता है। जब तक यह स्पष्टता नहीं आएगी, तब तक विभिन्न राज्यों और विभिन्न मामलों में अलग-अलग व्याख्याएँ सामने आती रहेंगी। परिमल नाथवानी और मीनाक्षी नटराजन के प्रकरण हमें एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रश्न की ओर ले जाते हैं। क्या भारत में चुनाव लड़ने का अधिकार पर्याप्त रूप से संरक्षित है, या वह अभी भी प्रशासनिक विवेक और कानूनी अस्पष्टता के बीच झूल रहा है? लोकतंत्र में सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि कोई विवादित उम्मीदवार चुनाव लड़ ले। सबसे बड़ा खतरा यह है कि कोई वैध उम्मीदवार अस्पष्ट नियमों और असंगत व्याख्याओं के कारण चुनाव लड़ने से ही वंचित कर दिया जाए। आख़िरकार लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यही है कि उम्मीदवारों का अंतिम निर्णय जनता करे। कानून का उद्देश्य चुनावी प्रतिस्पर्धा को सीमित करना नहीं, बल्कि उसे निष्पक्ष, पारदर्शी और समान अवसरों पर आधारित बनाना है। यदि यह सिद्धांत कमजोर पड़ता है, तो केवल किसी एक उम्मीदवार का अधिकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा भी संकट में पड़ जाती है।एक ही परिस्थिति में एक पुरुस्कृत और दूसरा तिरस्कृत हो यह न्याय चेतना को अपाहिज बनाता है। (लेखक स्वतंत्र विश्लेषक हैं) ईएमएस/12/06/2026